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नश्तर में आज : हो गई पीर पर्वत सी…

कहने को तो लोकतंत्र की परिभाषा-जनता का, जनता के लिए और जनता के द्वारा है। देखने-सुनने में यह भावार्थ जनता को उसकी ताकत का अंदाजा कराने वाला होता है।

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हरीश पाराशर
कहने को तो लोकतंत्र की परिभाषा-जनता का, जनता के लिए और जनता के द्वारा है। देखने-सुनने में यह भावार्थ जनता को उसकी ताकत का अंदाजा कराने वाला होता है। लेकिन जब जनता की परेशाानियां वीवीआईपी के स्वागत के धूम-धड़ाके में न तो किसी को सुनाई दे और न ही दिखाई दे तो लोकतंत्र का यह भावार्थ मुंह चिढ़ाता नजर आता है। अपने नेता के स्वागत में जुटे जनप्रतिनिधि जब इसे अपने शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बनाने लगें तो जनता का तो पिसना तय है ही।

सड़कें जनता की, मंच सत्ता के। पिछले कई बरसों से यही सब कुछ हो रहा है। कभी चुनाव की रैलियां तो कभी वीवीआईपी के स्वागत में सजे तोरण द्वार व वाहनों के लम्बे काफिले। एम्बुलेंस में गंभीर मरीज हो या फिर किसी को जरूरी काम से कहीं समय पर पहुंचना हो। फायर ब्रिगेड को आग बुझाने जाना हो या फिर स्कूली बच्चों को स्कूल से लाने-ले जाने का वक्त। सत्ता के मंच जब सजने लगते हैं तो इन सबकी परवाह भला कौन करने लगे। आम आदमी तो बस उस घड़ी को कोसकर रह जाता है जब वह इन ‘स्वागत मार्गों’ का रुख करता है।

सोमवार को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के जयपुर आगमन पर हुए रोड शो के दौरान ट्रेफिक जाम में फंसा आम आदमी मन मसोस कर ही रह गया। चालीस डिग्री के पार तापमान में आग उगलते सूरज के बीच घंटों खड़े रहने की पीड़ा इसे भोगने वाला ही महसूस कर सकता है। देश के शीर्ष कोर्ट से लेकर राज्यों के हाईकोर्ट तक कई बार ‘वीवीआईपी कल्चर’ के नाम पर घंटों रास्ता रोककर यातायात अवरुद्ध करने पर चिंता जता चुके हैं। समय-समय पर ये निर्देश भी दिए हैं कि किसी भी वीवीआईपी मूवमेंट के दौरान जनता को सुगम वैकल्पिक रूट उपलब्ध कराया जाना चाहिए। सोमवार को रोड शो के दौरान यातायात जिस तरह से बाधित हुआ वह तो इन प्रबंधों से जुड़ा तो नजर आया ही नहीं।

बड़े शहरों में खास तौर पर राजधानी मुख्यालयों पर वीवीआईपी मूवमेंट के कारण यातायात आए दिन बाधित रहता है। सडक़ों पर अचानक बैरिकेड्स खड़े हो जाते हैं। ट्रैफिक घंटों पहले रोक दिया जाता है और आम जनता को बिना सूचना के जाम की यातना झेलनी पड़ती है। जनता तो भुगतने की आदी हो गई है यह मानते हुए वीवीआईपी के स्वागत के नाम पर बड़े-बड़े मंच बीच सडक़ पर सजा दिए जाते हैं।

सबको पता है कि यातायात सुधार के नाम पर राजधानी के प्रमुख मार्गों पर पिछले दिनों थड़ी-ठेले हटाकर लोगों की रोजी-रोटी पर भी वार खूब हुआ है। कहीं कोई बीच सडक़ पर दो घड़ी रास्ता रोककर तो देखे-सरकारी लाव-लश्कर तत्काल धमक जाएगा उसे हटाने के लिए। लेकिन बीच सडक़ बड़े-बड़े मंच सज जाएं तो कोई कुछ नहीं कहता। सत्ता का साथ जो मिल जाता है।

राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री तथा संवैधानिक पदों पर बैठे विशिष्टजनों की सुरक्षा की दृष्टि से उनके आवागमन पर यातायात बाधित करना अनिवार्य कहा जा सकता है। लेकिन जरूरत इस बात की है कि ऐसे आवागमन का रूट व समय भी ऐसा ही तय किया जाना चाहिए जिसमें लोगों को परेशानियां कम झेलनी पड़े। अभी तो हो यह रहा है कि व्यस्त मार्गों से मिलने वाले रास्तों पर भी घंटों पहले रस्से बांधकर अवरोध लगा दिए जाते हैं।

लोगों का समय तो अनावश्यक खराब होता ही है वाहन चालकों के ईंधन की भी खपत ज्यादा होती है। वाहनों की धुआं से पर्यावरण प्रदूषित होता है सो अलग। वीवीआईपी मूवमेंट घंटों पहले वाहनों की ही नहीं, राहगीरों तक की आवाजाही रोक देने वाली पुलिस को कम से कम इतना प्रशिक्षण जरूर दिया जाना चाहिए कि अतिआवश्यक हो तब ही एक निश्चित अवधि से अधिक समय तक यातायात बाधित किया जाए।

जनता के लिए तो यह समस्या अब कवि दुष्यंत की काव्य पंक्ति - हो गई पीर पर्वत सी…की माफिक हो गई है जिसे दूर उन्हें ही करना होगा जो सत्ता के मंच सजाने को उतावले रहते हैं।