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असमानताओं के बीच कैंसर से जूझती दुनिया का संघर्ष

इस संकट का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वैश्विक स्तर पर बचपन के कैंसर से होने वाली मौतों में 1990 के मुकाबले लगभग 27 प्रतिशत की कमी आई है। यह प्रगति चिकित्सा विज्ञान की उपलब्धियों, जागरूकता और बेहतर उपचार पद्धतियों का परिणाम है।

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नृपेंद्र अभिषेक नृप स्वतंत्र लेखक एवं स्तंभकार- बचपन, जिसे जीवन का सबसे उजला, निष्कलुष और संभावनाओं से भरा काल कहा जाता है, आज दुनिया के कई हिस्सों में एक अदृश्य भय से घिरा हुआ है। यह भय है कैंसर का, जो न केवल बच्चों के जीवन को छीन रहा है, बल्कि उनके परिवारों, समाज और पूरी मानवता के भविष्य पर भी गहरा प्रश्नचिह्न खड़ा कर रहा है। हालिया वैश्विक शोध यह चौंकाने वाला तथ्य सामने लाते हैं कि बचपन में कैंसर से होने वाली लगभग 94 प्रतिशत मौतें कम और मध्यम आय वाले देशों में होती हैं। यह आंकड़ा केवल एक सांख्यिकीय सूचना नहीं, बल्कि वैश्विक स्वास्थ्य असमानता की एक करुण गाथा है, जो बताती है कि जन्मस्थान किस तरह जीवन और मृत्यु के बीच की दूरी तय कर देता है। यदि हम इस समस्या की जड़ों में उतरें, तो सबसे पहले स्वास्थ्य सेवाओं की असमान उपलब्धता का प्रश्न सामने आता है। विकसित देशों में जहां अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाएं, प्रशिक्षित डॉक्टर, समय पर जांच और महंगे इलाज की पहुंच अपेक्षाकृत आसान है, वहीं कम और मध्यम आय वाले देशों में ये सुविधाएं या तो सीमित हैं या आम लोगों की पहुंच से बाहर हैं। परिणामस्वरूप, वहां कैंसर का निदान अक्सर देर से होता है, जब बीमारी गंभीर अवस्था में पहुंच चुकी होती है। यह देरी बच्चों के जीवन की संभावनाओं को लगभग समाप्त कर देती है।

साल 2023 के आंकड़ों पर नजर डालें, तो दुनियाभर में बचपन के कैंसर के लगभग 3,77,000 नए मामले सामने आए और करीब 1,44,000 बच्चों की मौत हो गई। इन मौतों का बड़ा हिस्सा उन्हीं देशों में हुआ, जहां संसाधनों की कमी, स्वास्थ्य सेवाओं की कमजोर संरचना और सामाजिक-आर्थिक विषमताएं गहरी जड़ें जमाए हुए हैं। भारत में ही इस वर्ष लगभग 17,000 बच्चों की मौत का अनुमान लगाया गया, जबकि चीन में 16,000 और नाइजीरिया तथा पाकिस्तान जैसे देशों में करीब 9,000-9,000 बच्चों ने अपनी जान गंवाई। ये आंकड़े केवल संख्याएं नहीं हैं, बल्कि उन असंख्य परिवारों की त्रासदी हैं, जिनकी दुनिया उनके बच्चों के साथ ही उजड़ जाती है। इस संकट का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वैश्विक स्तर पर बचपन के कैंसर से होने वाली मौतों में 1990 के मुकाबले लगभग 27 प्रतिशत की कमी आई है। यह प्रगति चिकित्सा विज्ञान की उपलब्धियों, जागरूकता और बेहतर उपचार पद्धतियों का परिणाम है। लेकिन यह तस्वीर पूरी तरह आश्वस्त करने वाली नहीं है, क्योंकि अफ्रीका जैसे क्षेत्रों में इन मौतों में 55.6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। इसका अर्थ यह है कि जहां एक ओर दुनिया का एक हिस्सा प्रगति की ओर बढ़ रहा है, वहीं दूसरा हिस्सा पिछड़ता जा रहा है। यह असंतुलन ही इस वैश्विक संकट का सबसे दुखद और चिंताजनक पक्ष है।

इस समस्या का वैश्विक बोझ केवल मृत्यु दर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह 'डिसएबिलिटी एडजस्टेड लाइफ ईयर्स' के रूप में भी सामने आता है। इसका अर्थ है कि कैंसर के कारण न केवल जीवन की हानि होती है, बल्कि स्वस्थ जीवन के वर्षों का भी नुकसान होता है। 2023 में यह पाया गया कि बचपन का कैंसर इस वैश्विक बोझ में एक प्रमुख योगदानकर्ता है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां स्वास्थ्य संसाधनों की कमी है। यह स्थिति इस बात को रेखांकित करती है कि यह केवल एक चिकित्सा समस्या नहीं, बल्कि मानव विकास और सामाजिक न्याय का भी प्रश्न है। इसके समाधान के लिए वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं में निवेश बढ़ाने की आवश्यकता है, विशेषकर उन देशों में जहां संसाधनों की कमी है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को मजबूत करना, कैंसर की जांच और उपचार के लिए उपकरण उपलब्ध कराना और प्रशिक्षित चिकित्सा कर्मियों की संख्या बढ़ाना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।

इसके साथ ही, जागरूकता अभियान चलाना भी बेहद जरूरी है। सरकारों को भी इस दिशा में ठोस नीतियां बनानी होंगी, ताकि गरीब और वंचित वर्ग के लोगों को सस्ता और सुलभ इलाज मिल सके। स्वास्थ्य बीमा योजनाओं का विस्तार, मुफ्त या सब्सिडी वाले इलाज की व्यवस्था और ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सहयोग की जरूरत है। हम शोध और नवाचार को केवल विकसित देशों तक सीमित न रहने दें, बल्कि उसे वैश्विक स्तर पर साझा संपदा के रूप में विकसित करें। यह समझना होगा कि बचपन का कैंसर केवल एक बीमारी नहीं, बल्कि मानवता की एक साझा चुनौती है। जब तक दुनिया का हर बच्चा सुरक्षित और स्वस्थ नहीं होगा, तब तक हमारी प्रगति अधूरी रहेगी।