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संपादकीय: नशामुक्ति सरकारी मिशन के साथ जन-आंदोलन बने

आए दिन भारत पहुंचती मादक द्रव्यों की खेप इस संकट की भयावहता की पुष्टि करती है। अकेले वर्ष 2025 में ही 1980 करोड़ रुपए से अधिक मूल्य के नशीले पदार्थ जब्त किए गए।

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देश को नशा मुक्त बनाने के लिए 'नक्सलमुक्त भारत' की तर्ज पर केंद्र सरकार ने जिस नई रणनीति का खाका तैयार किया है, वह राष्ट्रीय सुरक्षा व सामाजिक स्वास्थ्य के प्रति साहसी दृष्टिकोण ही कहा जाएगा। गृह मंत्रालय व नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो की ओर से संचालित 'ऑपरेशन वाइप' इस कटु सत्य की स्वीकारोक्ति है कि नशे के विरुद्ध युद्ध केवल छोटे पेडलर्स को पकडऩे से नहीं जीता जा सकता। असली चुनौती उन अंतरराष्ट्रीय कार्टेल्स को ध्वस्त करने की है, जो भारत की सीमाओं के बाहर बैठकर इस अवैध व्यापार की डोर थामे हुए हैं।

भौगोलिक दृष्टि से भारत 'डेथ क्रेसेंट' यानी अफगानिस्तान-पाकिस्तान-ईरान और 'डेथ ट्रायंगल' मसलन-म्यांमार-लाओस-थाईलैंड जैसे कुख्यात नार्को-गलियारों के बीच स्थित है। इसके अलावा अब मेक्सिको-चीन नार्को-रूट भी भारतीय समुद्री मार्ग का उपयोग कर रहे हैं। आए दिन भारत पहुंचती मादक द्रव्यों की खेप इस संकट की भयावहता की पुष्टि करती है। अकेले वर्ष 2025 में ही 1980 करोड़ रुपए से अधिक मूल्य के नशीले पदार्थ जब्त किए गए। इसलिए यह सच है कि जब तक आपूर्ति के इन वैश्विक स्रोतों को जड़ से नहीं काटा जाता, घरेलू कार्रवाई महज तात्कालिक उपचार बनकर रह जाएगी। एक चिंता यह भी है कि देश में सख्त कानूनों और एजेंसियों की मुस्तैदी के बावजूद तस्करी न रुकने का बड़ा कारण इसमें लिप्त तंत्र का डिजिटलीकरण और आधुनिकीकरण है। वैश्विक परिदृश्य पर नजर डालें तो सिंगापुर जैसे देशों ने जीरो टॉलरेंस नीति और कठोर मृत्युदंड से अंतरराष्ट्रीय सप्लायरों के हौसले पस्त किए हैं। वहीं, आइसलैंड ने मांग पक्ष पर प्रहार करते हुए युवाओं को रचनात्मक और खेल गतिविधियों में इस तरह व्यस्त किया है कि समाज में नशे की चाहत ही न्यूनतम हो गई है। भारत में पंजाब हेरोइन का प्रमुख केंद्र है, गुजरात के समुद्री मार्ग नशे के प्रवेश द्वार हैं और महाराष्ट्र-कर्नाटक इसके ट्रांजिट हब हैं।

पूर्वोत्तर के कुछ राज्य इस युद्ध के मुख्य मोर्चे बन गए हैं। इन प्रदेशों में सख्त निगरानी की जरूरत है। आधुनिक तस्कर अब डार्कनेट, क्रिप्टो करेंसी और ड्रोन तकनीक का उपयोग कर रहे हैं। इससे निपटने की कारगर रणनीति बनानी होगी। ड्रग कार्टेल को खत्म करने की यह पहल तभी सार्थक होगी जब इसे 'द्वि-स्तरीय युद्ध' के रूप में लड़ा जाए। पहले स्तर पर अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर कूटनीति व इंटरनेशनल नारकोटिक्स कंट्रोल बोर्ड के साथ खुफिया समन्वय हो और दूसरे स्तर पर देश में नशे की मांग को समाप्त करने के लिए जन-आंदोलन खड़ा किया जाए।अंतरराष्ट्रीय सप्लायरों के इस चक्रव्यूह को केवल तकनीक, कठोर कानून और अटूट सामाजिक इच्छाशक्ति के समन्वय से ही भेदा जा सकता है। जाहिर है पूर्ण नशामुक्ति तभी संभव है जब यह केवल सरकारी मिशन नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय स्तर का जन-आंदोलन बने।