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जानलेवा गर्मी: जलवायु परिवर्तन का सख्त संकेत

फरवरी के अंतिम सप्ताह और मार्च की शुरुआत में ही कई इलाकों में तापमान ने सामान्य सीमाएं लांघ दी थी। उसके बाद पश्चिमी विक्षोभ के चलते लगातार बारिश होने से कई दिनों तक तापमान काफी कम रहा।

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योगेश कुमार गोयल पर्यावरण विषयों के जानकार- भारत इस समय ऋतु परिवर्तन के बिगड़ते संतुलन का केवल गवाह ही नहीं बन रहा बल्कि एक ऐसी जलवायु विभीषिका के मुहाने पर खड़ा है, जहां धूप अब जीवनदायी नहीं, जानलेवा साबित हो रही है। अप्रेल की दहलीज पार करते ही जब उत्तर भारत के शहरों में पारा 40 डिग्री के ऊपर स्थिर होने लगे, जब दिल्ली 43 डिग्री की झुलसती सांसें लेने लगे और राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार से लेकर मध्य भारत तक धरती आग उगलती प्रतीत हो तो ये संकेत साधारण नहीं होते। यह उस बदलते जलवायु परिवर्तन की तीखी चेतावनी है, जो अब हमारे दैनिक जीवन की लय को भी तोडऩे लगी है। इस वर्ष की गर्मी ने अपनी शुरुआत ही असामान्य तरीके से की। फरवरी के अंतिम सप्ताह और मार्च की शुरुआत में ही कई इलाकों में तापमान ने सामान्य सीमाएं लांघ दी थी। उसके बाद पश्चिमी विक्षोभ के चलते लगातार बारिश होने से कई दिनों तक तापमान काफी कम रहा। अब राजस्थान के बाड़मेर से लेकर दिल्ली की गलियों और विदर्भ के मैदानों तक पारा 43 डिग्री सेल्सियस के स्तर को पार कर चुका है। यह केवल बढ़ते तापमान का आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह एक गहराता सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट और आर्थिक चेतावनी है।

संकेत स्पष्ट हैं कि इस वर्ष लू का प्रकोप अधिक लंबा, ज्यादा तीव्र और बहुत व्यापक होगा। मौसम विभाग और पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के ताजा आंकड़ों ने एक डरावनी तस्वीर पेश की है। अध्ययन बताते हैं कि 1981 से 2000 के बीच लू की औसत अवधि जहां 2.5 से 5.5 दिन थी, वहीं 2001 से 2020 के बीच यह बढ़कर 8.5 दिन तक पहुंच गई। लू का भौगोलिक दायरा भी 11.9 लाख वर्ग किलोमीटर से फैलकर 18.1 लाख वर्ग किलोमीटर हो चुका है। यह विस्तार बताता है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की आशंका नहीं, वर्तमान की कड़वी हकीकत है। हमारे शहर आज कंक्रीट के जंगलों में तब्दील हो चुके हैं, जो दिनभर गर्मी सोखते हैं और रात में उसे मुक्त करते हैं, जिससे 'अर्बन हीट आइलैंड' का प्रभाव पैदा होता है। भारत में मई का महीना गर्म हवाओं (लू) का चरम समय होता है और लू की घटनाओं को भी मौसम में दिन-प्रतिदिन बदलाव का स्वाभाविक हिस्सा माना जाता है लेकिन चिंता की बात यही है कि लू की तीव्रता लगातार वर्ष दर वर्ष बढ़ रही है। पिछले करीब डेढ़ दशकों में 2009, 2010, 2016, 2017 और 2022 भारत में रिकॉर्ड किए गए पांच सबसे गर्म वर्ष रहे।

विश्व मौसम विज्ञान संगठन के मुताबिक लू से अर्थव्यवस्था को चौतरफा नुकसान होता है। डब्ल्यूएमओ का कहना है कि बढ़ते तापमान का अर्थ हीट वेव का बढऩा, बहुत ज्यादा मात्रा में बर्फ का पिघलना, समुद्र जलस्तर का बढऩा तथा मौसम की चरम घटनाओं का और ज्यादा विनाशकारी होना है, जिसका प्रभाव पर्यावरण, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा और सतत विकास पर पड़ेगा। बहरहाल, अत्यधिक तापमान से जहां सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों में प्राथमिक व माध्यमिक स्तर की स्वास्थ्य प्रणालियों की चिंता बढ़ जाती है, वहीं हीट वेव का श्रमिकों की उत्पादकता पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है। जलवायु विज्ञान के सीनियर लेक्चरर डॉ. फ्रेडरिक औटो कहते हैं कि भारत में मौजूदा गर्म हवाओं का एक बड़ा कारण कोयला तथा अन्य जीवाश्म ईंधन का जलाया जाना है और जब तक ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन बंद नहीं होगा, तब तक भारत तथा अन्य स्थानों पर हीट वेव और भी गर्म व खतरनाक होती जाएगी। इन घातक स्थितियों से बचने के लिए जलवायु संकट से निपटने के अन्य उपायों के अलावा प्राकृतिक जंगलों के संरक्षण व आवासीय इलाकों में भी हरियाली बढ़ाने के लिए पौधरोपण अभियान को भी बढ़ावा देना होगा।