
बंद हॉल में गूंजता हाइ-पावर म्यूजिक, रंग-बिरंगी रोशनी के बीच मस्ती में डूबे लोग, कानों को चीरता शोर, मानो इस शोर का अपना ही एक उन्माद हो। भले ही आज के दौर में ये सब सामान्य लगे, लेकिन इसके पीछे छिपे खतरों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता क्योंकि यह कई लोगों में कानों में सीटी और घंटी जैसी आवाज (टिनिटस) और कुछ मामलों में अचानक कान से सुनना बंद जैसी परेशानी का सबब बन जाता है । एक खतरनाक सच्चाई, जो इन दिनों देखने को मिल रही है ।
यह केवल एक पार्टी या इवेंट की बात नहीं, बल्कि हमारी बदलती जीवनशैली की तरफ इशारा है, जहां तेज शोर हमारे स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है।
आज शोर केवल डीजे या म्यूजिक कॉन्सर्ट तक सीमित नहीं रहा। हर तरफ तेज शोर है- सडक़ों पर बढ़ता ट्रैफिक, शादी-ब्याह के बैंड-बाजे, सूतली बम जैसे तेज पटाखे और बंद हॉल तक में ही आयोजित हो रहे हाइ पॉवर म्यूजिकल इवेंट्स। इसके साथ ही मोबाइल और इयरफोन के बढ़ते उपयोग ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है।
क्षणिक मनोरंजन के लिए हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि तेज ध्वनि हमारी श्रवण क्षमता को स्थायी नुकसान पहुंचा सकती है। 85 डेसिबल से अधिक का शोर कान के लिए सुरक्षित नहीं होता है। डिस्को और नाइट क्लबों में यह स्तर 100-105 डेसिबल तक, जबकि रॉक कॉन्सर्ट में 110-120 डेसिबल या उससे अधिक पहुंच जाता है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनियाभर में लगभग एक अरब युवा शोर-जनित श्रवण हानि के खतरे में हैं और वर्ष 2050 तक 70 करोड़ से अधिक लोगों को श्रवण पुनर्वास की आवश्यकता पड़ सकती है। स्पष्ट है कि यह केवल स्वास्थ्य का ही नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक चुनौती का भी विषय बन चुका है।
हर वर्ष अप्रेल के अंतिम बुधवार को मनाया जाने वाला अंतरराष्ट्रीय शोर जागरूकता दिवस हमें इस खतरे के प्रति सचेत करता है। जिसकी शुरुआत 1996 में 'सेंटर फॉर हियरिंग एंड कम्युनिकेशन' द्वारा की गई थी। लेकिन केवल एक दिन की जागरूकता पर्याप्त नहीं है, अब ठोस और प्रभावी नीतिगत हस्तक्षेप आवश्यक है।
आवश्यक है कि सार्वजनिक आयोजनों में ध्वनि की अधिकतम तय सीमा का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाए। विशेष रूप से इनडोर कार्यक्रमों में साउंड मीटर अनिवार्य हों। संगीत उपकरण और पटाखे बनाने वाली कंपनियों को केवल सुरक्षित डेसिबल स्तर वाले उत्पाद बनाने की अनुमति दी जाए। डीजे नाइट और म्यूजिकल कॉन्सर्ट के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश बनाए जाएं और जहां ध्वनि स्तर पर नियंत्रण संभव न हो, वहां इन पर प्रतिबंध लगे। साथ ही स्कूलों, कॉलेजों और सार्वजनिक स्थलों पर निरंतर जागरूकता अभियान चलाए जाएं।
व्यक्तिगत स्तर पर भी जिम्मेदारी उतनी ही महत्वपूर्ण है। मोबाइल और हेडफोन का उपयोग सीमित समय और सुरक्षित वॉल्यूम पर किया जाए, तेज शोर वाले वातावरण में अधिक देर तक रहने से बचा जाए। संगीत और उत्सव हमारी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं, लेकिन अब समय आ गया है हम सभी मिलकर एक ऐसी दुनिया बनाएं जहां संगीत दिल को सुकून दे, न कि कानों से उनकी श्रवण शक्ति ही छीन ले ।
Updated on:
28 Apr 2026 05:15 pm
Published on:
28 Apr 2026 05:13 pm
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