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युद्धों से उभरती नई स्वास्थ्य चुनौतियां, परवाह किसे?

स्वास्थ्य की दृष्टि से देखा जाए तो जमीनी लड़ाई की परिणिति में सामान्यतया जख्म और मृत्यु अथवा शवों और जख्मी सैनिकों से उत्पन्न संक्रमण के चलते होने वाली बीमारियां ही होती थी, जबकि अब परिदृश्य पूर्णतया परिवर्तित हो गया है। आमने-सामने के युद्ध की जगह लंबी दूरी तक हमला करने वाले आयुध से भरपूर शस्त्रों ने ले ली है।

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डॉ. विवेक एस. अग्रवाल, स्वास्थ्य व पर्यावरण विशेषज्ञ

अमरीका-इजराइल तथा ईरान के बीच सैन्य संघर्ष ने अनेकानेक अपरिवर्तनीय विकारों को पृष्ठभूमि में छोड़ दिया है। इनमें सर्वाधिक चिंतनीय है स्वास्थ्य संबंधी विकार। द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात आहत राष्ट्रों में बीमारियों और मृत्यु के पैटर्न में भारी बदलाव आया था। तत्पश्चात लंबे अरसे तक तुलनात्मक रूप से व्यतीत शांति काल में उत्पन्न गंभीर व्याधियों से निजात पाने के लिए भरसक प्रयत्नों के फलस्वरूप लगभग उबरने की स्थिति समीप थी कि फिर एक बार युद्ध की विकृतियां सिर उठा चुनौतियों के लिए खड़ी हो गईं। वर्तमान कालखंड में लड़े जा रहे युद्ध पूर्व की अपेक्षा स्वास्थ्य के लिए अधिक गंभीर होंगे, यह आशंका निर्मूल नहीं है। जापान पर हुए परमाणु हमले को हटा दिया जाए तो युद्ध प्रमुखतया जमीनी होते थे जबकि इन वर्षों में लड़ाई प्रमुखतया हवाई या कुछेक परिस्थितियों में समुद्रीय स्तर पर लड़ी जा रही हैं।
स्वास्थ्य की दृष्टि से देखा जाए तो जमीनी लड़ाई की परिणिति में सामान्यतया जख्म और मृत्यु अथवा शवों और जख्मी सैनिकों से उत्पन्न संक्रमण के चलते होने वाली बीमारियां ही होती थी, जबकि अब परिदृश्य पूर्णतया परिवर्तित हो गया है। आमने-सामने के युद्ध की जगह लंबी दूरी तक हमला करने वाले आयुध से भरपूर शस्त्रों ने ले ली है। हथियारों एवं मारक साधनों में उपयोग ली जा रही सामग्री भारी तबाही के साथ-साथ वातावरण प्रदूषण का भी अहम कारक बन जाती है। इसी क्रम में मारक हथियारों का समुद्र या जलस्रोतों पर गिरना जैव विविधता को भी नुकसान पहुंचाता है। युद्ध के परिणामस्वरूप स्वास्थ्य संबंधी व्याधियां परोक्ष एवं अपरोक्ष रूप से मानवता के साथ पशु एवं वानस्पतिक के लिए भी घातक होती हैं। हमलों के कारण आधारभूत संरचना की क्षति के कारण जलजनित बीमारियों में भी काफी अभिवृद्धि होती है। इन असामान्य परिस्थितियों के कारण प्रभावित राष्ट्रों का चिकित्सा एवं स्वास्थ्य का ढांचा भी चरमरा जाता है, जिसके चलते न बचाव संबंधी टीकाकरण, मातृ -शिशु, वरिष्ठजन, विशेष योग्यजन संबंधी देखभाल में भी व्यापक व्यवधान उत्पन्न होते हैं। इलाज ना मिलने के कारण लंबी बीमारियों के मरीजों की अपेक्षाकृत रूप से जल्दी मृत्यु होना भी इन राष्ट्रों में पाया जाता है। परोक्ष रूप से स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव छोडऩे हेतु भारी मात्रा में विस्फोटक आयुध एवं भारी धातुओं से संपन्न इन अतिरिक्त दूरी तक मार करने वाले अस्त्रों में जीवाश्म ईंधन का भी भरपूर उपयोग होता है। हालांकि तीव्र रेडियोएक्टिव पदार्थों का अस्त्रों में उपयोग नहीं होता किंतु क्षीण यूरेनियम को सुरक्षित ठहराते हुए काफी उपयोग किया जाता है। वैसे परमाणु अस्त्रों के मुख्य अवयवों में से एक यूरेनियम ही होता है। अतएव क्षीण होने के पश्चात भी उसके विकिरण प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता। हिरोशिमा नागासाकी में परमाणु विस्फोट के पश्चात भी दशकों तक उसके जैव विविधता पर सक्रिय प्रभाव को संपूर्ण विश्व ने त्रासदी के रूप में सम्मुख देखा है। इसके मायने यह है कि परमाणु विस्फोट के अलावा भी वातावरण में विकिरण की प्रबल संभावनाएं रहती हैं।
अस्त्र एवं विस्फोटक सामग्री में उपयोग किए जा रहे विषैले पदार्थों के अतिरिक्त उन्हें जोडऩे वाले रसायन ऊष्मा के साथ रासायनिक क्रिया कर प्रदूषण के प्रमुख स्रोत बनते हैं। क्रिया के दौरान काफी बड़े हिस्से की जैव विविधता प्राय: रासायनिक हमले जैसा दुष्प्रभाव झेलती है। जिस प्रकार भारी धातुओं जैसे शीशा, कॉपर, निक्कल, जिंक के साथ एंटीमोनी का उपयोग भविष्य में कैंसर जैसी बीमारियों का कारक माना जाता है उसी प्रकार विस्फोटक के बंधन हेतु भी विभिन्न रसायन इस्तेमाल होते हैं। दुर्भाग्यवश तकनीकी के उन्नयन के पश्चात भी प्रयोग में लाई गई सामग्री के प्रभाव को शून्य करना संभव नहीं हो पाया है। दीर्घायु प्राप्त धातुओं, रसायन आदि के परोक्ष प्रभाव में मानवीय एवं पशुधन के श्वसन, हृदय, तंत्रिका तंत्र पर त्वरित प्रभाव देखने को मिलता है, कालांतर में वायु, जल तथा भूमि के माध्यम से विभिन्न जीवों में पहुंच यह कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के साथ जन्मजात रोगों का बड़ा कारण बन जाता है। अध्ययनों से यह स्पष्ट हो चुका है कि शारीरिक तंत्र का कोई भी हिस्सा आयुध सामग्री के प्रभाव से अछूता नहीं रह सकता। विश्व युद्ध के पश्चात पीढ़ी दर पीढ़ी रोगों का क्रम देखने को मिला है। वर्तमान में तीक्ष्ण होती सामग्री से आमजन पर नहीं अथवा नगण्य प्रभाव की अभिधारणा तार्किक रूप से कहीं भी नहीं ठहर पाती। इस पृष्ठभूमि में युद्ध से जैव विविधता पर हुए प्रभावों को न्यूनतम किया जाना शीर्ष प्राथमिकता होनी चाहिए।