ओपिनियन

शांति और शोर

शांतिपूर्वक निपटाए जा सकने वाले संकटों के लिए बेवजह शोर मचाना वाकई संस्थाओं को कमजोर करना है। जरूरत है कि दोनों में विवेकपूर्ण संतुलन बना रहे।
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Aug 19, 2018
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भारत के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा ने सैद्धांतिक तौर पर उचित ही कहा है कि किसी भी सिस्टम की आलोचना करना, हमला करना और नष्ट करना आसान है, लेकिन किसी संस्था को आगे ले जाना और अपनी निजी आकांक्षाओं को दूर रखकर उसे बढ़ाना चुनौतीपूर्ण है। उन्होंने कहा कि हमें अपनी व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाओं और शिकायतों को दूर रखना होगा और सुधार के लिए तर्कसंगतता, परिपक्वता और सकारात्मक मानसिकता के साथ कदम उठाने होंगे। प्रधान न्यायाधीश की इस बात को चार वरिष्ठतम जजों द्वारा बगावती तेवर दिखाने के बाद की पहली जवाबी प्रतिक्रिया माना जा रहा है। खासतौर पर उनका यह कहना कि 'हर व्यक्ति को शांतिपूर्वक व अधिकतम जिम्मेदारी के साथ काम करना चाहिए'। इसके विपरीत वरीयता क्रम में दूसरे जस्टिस रंजन गोगोई ने पिछले दिनों 'शोर मचाने वाले जजों और स्वतंत्र मीडिया को लोकतंत्र के लिए पहली पंक्ति का रक्षक बताया था। यह एक दूसरी सैद्धांतिक रेखा थी जिसमें शोर मचाने वाले जजों को लोकतंत्र के लिए जरूरी बताया गया था।

अलग कसौटी पर देखें तो जस्टिस गोगोई की बात भी दमदार लगती है। जब किसी संस्था को अपने भीतर से ही खतरा महसूस होने लगे और नियंता मौन दिखें तो शोर मचाना आखिरी विकल्प नजर आता है। पिछले कुछ वर्षों में लगता है कि लोकतांत्रिक संस्थाएं राजनीति की शिकार हो रही हैं। सार्वजनिक मंचों पर ऐसी शख्सियतों की उपस्थिति बढ़ती जा रही है जिनसे भाषण की नहीं, काम की उम्मीद की जाती है, जैसा कि प्रधान न्यायाधीश ने भी अपेक्षा जताई है। लीक से हटकर, पटना हाईकोर्ट के नवनियुक्त मुख्य न्यायाधीश जस्टिस मुकेश रसिकभाई शाह ने यह पूछे जाने पर कि उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व भाजपाध्यक्ष अमित शाह से जोडक़र क्यों देखा जाता है, बिना किसी संकोच के कहा कि 'क्योंकि मोदी रोल मॉडल हैं। वह एक हीरो हैं।' इस पद पर बैठे किसी व्यक्ति द्वारा किसी राजनेता के लिए ऐसी स्वीकारोक्ति शायद ही पहले दिखी हो।

देश के वरिष्ठतम न्यायाधीशों की बातें सारगर्भित हैं। महात्मा गांधी ने भी तीन बंदरों के माध्यम से बुरा मत सुनो, बुरा मत देखो और बुरा मत कहो- का पैगाम दिया था। सब कुछ जानते-समझते शांतिपूर्वक काम करते रहना तभी तक वाजिब कहा जाएगा, जब तक वह अन्यायपूर्ण न हो। दूसरी तरफ यह भी सच है कि शांतिपूर्वक निपटाए जा सकने वाले संकटों के लिए बेवजह शोर मचाना वाकई संस्थाओं को कमजोर करना है। जरूरत इस बात की है कि दोनों में विवेकपूर्ण संतुलन बना रहे, जैसा महात्मा गांधी ने अपने कर्म से हमें सिखाया है। इन दिनों आलोचनाओं को नकारात्मकता का लेबल लगाकर खारिज करने का शातिराना तरीका चल पड़ा है। इसीलिए दोनों न्यायाधीशों को भी इस पर जरूर विचार करना चाहिए कि जब लोकतांत्रिक शक्तियों के बीच संतुलन बनाने वाली संस्थाएं कारगर न दिखे तो शोर मचाने के अलावा क्या रास्ता हो सकता है?

Published on:
19 Aug 2018 11:58 am