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रंगों को रोशनी में बदलते हुए

वे उस रोशनी के चित्रकार हैं जो रंगों के भीतर, उनके मर्म में आत्मा की तरह छिपी होती है और कला के किसी क्षण में बाहर आकर अनिश्चित आकारों में जाहिर होने लगती है।

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Sunil Sharma

Aug 18, 2018

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- मंगलेश डबराल, कवि-सम्पादक

लाल, नीले, हरे, भूरे रंग का ठोस जमाव, उनके बीच रोशनी की कुछ शक्लें, पट्टियां, आधे चांद या दीयों जैसे आकार, जो रोशनी से ज्यादा छायाओं की तरह हैं - जैसे वे उन्हीं रंगों से उपजे हुए, उनके भीतर से आए हुए हों और अपनी दूसरी, उप-छायाएं भी फेंक रहे हों। वे कहीं संगीत की तरह सुनाई देते हैं और कहीं खामोशी की तरह कम्पन करते हैं। मनीष पुष्कले की कला का यह स्थापत्य अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जाना जाता है और वे प्रकाश के एक प्रमुख चितेरे के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

लेकिन मनीष की कला रोशनी के रूप को भी विखंडित करती है और रूपांतरणों में अपना सफर पूरा करती है। शायद वे उस रोशनी के चित्रकार हैं जो रंगों के भीतर, उनके मर्म में आत्मा की तरह छिपी होती है और कला के किसी क्षण में बाहर आकर अनिश्चित आकारों में जाहिर होने लगती है। लेकिन शायद इतना ही नहीं है। इस कला में अनेक जगह रंग खुद रोशनी में बदल जाते हैं - जैसे किसी सुंदर कविता में शब्द संगीत में बदलते हैं या किसी संगीत का आरोह या अवरोह एक रंग की तरह चमक जाता है। रंग की उपस्थिति यहां एक माध्यम का काम करती है, लेकिन ऐसा भी हो सकता है कि रंग की कम से कम मौजूदगी या लगभग रंग-हीनता जैसी स्थिति एक रोशनी को जन्म दे। मनीष की नई, 2018 में रची कृतियां (आकार-प्रकार गैलरी, नई दिल्ली) उस रोशनी का सुंदर उदाहरण हैं, जो रंगों के न्यूनतम इस्तेमाल से उपजती हैं।

प्रदर्शनी का शीर्षक ‘लैमिना’ भौतिक विज्ञान का शब्द है। यानी एक झीनी सी, झिल्लीनुमा परत, जो एक पत्ते का हरापन या पीलापन उड़ जाने के बाद आखिरी अस्तित्व की तरह बची रहती है, हालांकि गौर से देखें तो उसके पार उसके मूल रंग का आभास मौजूद होता है। इस रूपांतरण के लिए मनीष ‘अनावृत्त’ करने यानी रंगों और रूपों को खोल कर और उधेड़ कर एक नई निर्मिती करने की तकनीक का सहारा लेते हैं। यह देखना दिलचस्प है कि उनकी पिछली प्रदर्शनियों के नाम भी इस प्रक्रिया से जुड़े रहे हैं - ‘प्रतिछाया’, ‘रोशनी का रंगमंच’, ‘अनावरण’ आदि। अपने नए कैनवसों में मनीष अनावरण की प्रक्रिया को जैसे एक कदम आगे ले जाते हैं और रंगों को लगाने से ज्यादा उन्हें हटाने की तरफ बढ़ते हैं, जिसके नतीजे में एक ‘न्यूनतावादी’ (मिनिमलिस्ट) रचना जन्म लेती है।

छायाओं का खेल मनीष के चित्रों में एक स्वप्निल और स्मृति सरीखी खूबी की तरह रहा है। अनेक बार वे उन छायाओं के अकेलेपन को बेजोड़ ढंग से उभारते हैं। वह सब इस प्रदर्शनी में भी है, लेकिन कम रंगों से अधिक उजास को उपजाते हुए मनीष एक नए अमूर्तन की ओर बढ़ते दिखते हैं।