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जल-संवेदनशील नगर नियोजन की आवश्यकता

हमारे पूर्वजों ने बिना किसी आधुनिक उपकरण के, केवल अनुभव, प्रकृति की समझ और सामूहिक अनुशासन के बल पर ऐसी जलप्रबंधन प्रणालियां विकसित की थीं जो आधुनिक इंजीनियरों को भी आश्चर्यचकित करती हैं। टांका प्रणाली, घरों की छत से वर्षा जल को भूमिगत टैंक में संचित करने की विधि, जो जैसलमेर बाड़मेर, शेखावाटी आदि क्षेत्रों में आज भी है आधुनिक रूफटॉप रेनवाटर हार्वेस्टिंग हर घर संस्थान में अपनाए। बावड़ी, जोहड़, कुओं, तालाब, सूखे ट्यूबवेल को पुनर्जीवित किए जाए।

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भारत

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Opinion Desk

May 31, 2026

water conservation

water conservation

चंद्रशेखर पाराशर, नगरीय विशेषज्ञ एवं पूर्व एडिशनल चीफ टाउन प्लानर

भूमिका: जल - सनातन से संकट तक की यात्रा
भारतीय सनातन दर्शन में जल को 'पंचतत्वों' में सर्वाधिक पवित्र और जीवनदायी तत्व माना गया है। ऋग्वेद का उद्घोष - ‘आपो हि ष्ठा मयोभुव’- यानी 'जल ही सुख, शांति और जीवन का आधार है' केवल एक मंत्र नहीं, बल्कि पारिस्थितिक सत्य की एक गहरी स्वीकृति है। मत्स्य पुराण और स्कंद पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथों में जलाशयों, कुओं और बावडिय़ों के निर्माण को 'पूर्त धर्म' यानी सर्वोच्च पुण्य घोषित किया गया है। ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो संसार की समस्त महान सभ्यताओं सिंधु, मेसोपोटामिया, नील और गंगा का उदय जल स्रोतों के निकट ही हुआ और विद्वानों ने यह भी सिद्ध किया है कि प्रदूषित एवं दुरुपयोग किया गया जल उन्हीं सभ्यताओं के विनाश का वाहक बना। हमारी संस्कृति में कुआं-पूजन, तालाब-पूजन, वापी-पूजन और कार्तिक पूर्णिमा के दीपदान जैसी परंपराएं केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं थीं, बल्कि ये जल स्रोतों की स्वच्छता और संरक्षण के प्रति एक सामाजिक सतर्कता की अभिव्यक्ति थीं।
दुर्भाग्य की बात यह है कि जिस सभ्यता ने जल को देवता माना, वही आज 'जल संकट' के मुहाने पर खड़ी है। जब से बोरवेल और नलकूपों के माध्यम से मशीनीकृत रूप से भूजल खींचना शुरू हुआ- जिसकी शुरुआत 1940-50 के दशक में हुई और 1970 तक व्यापक हो गई - तब से जल संकट की नींव पड़ गई। थार मरुस्थल और राजस्थान के शुष्क क्षेत्रों में 1960-70 के दशक में यह प्रक्रिया तेजी से बढ़ी और सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में 1980 के दशक तक अंधाधुंध दोहन जारी रहा। जैसे ही सरकारी नल और बोरवेल से पानी उपलब्ध हुआ, हमने घर-घर के टांके, गांव-गांव के जोहड़ और शहर-शहर की बावडिय़ों को 'पुराना' कहकर उपेक्षित कर दिया। यही विस्मृति आज के संकट की जड़ बन गई है।

कंक्रीट का जंगल, भवन विनियमों एवं मास्टर प्लान में जल पारगम्यता के प्रावधान
आधुनिक शहरीकरण ने हर जगह को पक्का करके धरती की ‘सोखने की क्षमता’ छीन ली है। प्राकृतिक अवस्था में जहां गिरने वाले वर्षा जल का 50 फीसदी हिस्सा रिसकर एक्वीफर तक पहुंचता था, वह आज घटकर 5.10 फीसदी रह गया है। शहरों में सडक़ें, सेटबैक्स, पार्किंग और भवनों के मार्जिन सब कुछ कंक्रीट की ‘अभेद्य सतह’ में बदल चुके हैं। इससे भी गंभीर बात यह है कि ड्रेनेज लाइनों, प्राकृतिक अपवाह मार्गों और निचले क्षेत्रों में कचरा, मलवा भरकर अवैध निर्माण हो चुके हैं, जिससे वर्षा जल भूमि में रिसने के बजाय सडक़ों पर तांडव मचाता है और कुछ वर्षों से प्रति वर्ष शहरी बाढ़ का कारण बन रहा है।
एक नगर नियोजक की दृष्टि से देखें तो वर्तमान मास्टर प्लान में जल संरक्षण का उल्लेख अवश्य है,परंतु भू-उपयोग निर्धारण करते समय भूमि की ढलान, मिट्टी की पारगम्यता, प्राकृतिक जलभृत क्षेत्रों का संरक्षण और मानसून के दौरान भूजल पुनर्भरण का विस्तृत विवरण नहीं है, जो अब होने चाहिए़। मास्टर प्लान जोनिंग करते समय आवासीय, व्यावसायिक, औद्योगिक और पारिस्थितिक जोन बनाए जाते हैं, किंतु भूजल रिचार्ज जोन, प्राकृतिक जल-प्रवाह माग और पेलियोचैनल संरक्षण जोन जैसे विषय बिंदु मास्टर प्लानों में अनुपस्थित हैं।
भूजल संरक्षण को मास्टर प्लान के डीएनए में समाहित करने के लिए भूमि-उपयोग विनियमों में ‘अभेद्य सतह अनुपात’ और ‘पारगम्य सतह अनुपात’ के स्पष्ट और सख्त मानक निर्धारित करने होंगे। अमरीका के मैसाचुसेट्स राज्य के जोनिंग उप नियम इस दिशा में एक उत्कृष्ट मॉडल प्रस्तुत करते हैं। वहां सार्वजनिक पेयजल कुओं या प्रमुख भूजल रिचार्ज क्षेत्रों में किसी भी भूखंड के 15 फीसदी से अधिक हिस्से को पक्का करने पर पूर्णत: प्रतिबंध है। यदि इस सीमा से अधिक निर्माण अनिवार्य हो, तो विकासकर्ता को कृत्रिम पुनर्भरण प्रणाली स्थापित करना होती है ।
फ्लोरिडा के बे काउंटी में पारगम्य पेवर्स, जिनकी पारगम्यता 10: से अधिक हो,को, गणना में छूट दी जाती है, जिससे भूस्वामी प्राकृतिक मिट्टी खुली छोडऩे के लिए प्रेरित होते हैं। राजस्थान के विकास प्राधिकरणों,नगरीय निकाय आदि को भवन निर्माण उपनियमों में इन पारगम्यता अनुपातों को सख्ती से लागू करना चाहिए। प्रत्येक नए टाउनशिप प्रोजेक्ट में कम से कम 30 फीसदी पारगम्य सतह का प्रावधान अनिवार्य किया जाना चाहिए।

'स्पंज सिटी': अवधारणा से क्रियान्वयन तक की पांच-चरणीय वैज्ञानिक पद्धति
चीन द्वारा 2013 में अपनी राष्ट्रीय नगर-नियोजन नीति में अपनाई गई 'स्पंज सिटी' की अवधारणा- शहर को एक ऐसे स्पंज की तरह बनाना जो वर्षा जल को सोखे, मिट्टी और वनस्पतियों से शुद्ध करे और आवश्यकतानुसार भूजल के रूप में वापस उपलब्ध कराए ,आज सम्पूर्ण विश्व में नगर-नियोजन की सबसे प्रभावशाली अवधारणा के रूप में स्थापित हो चुकी है। वुहान जैसे 1 करोड़ से अधिक जनसंख्या वाले शहर में स्ट्रोम वाटर मैनेजमेंट सिस्टम आधारित हरित अवसंरचना और पाइप नेटवर्क के एकीकरण से 1-वर्षीय और 5-वर्षीय वर्षा घटनाओं में बाढ़ की समस्या उल्लेखनीय रूप से नियंत्रित हुई है। शेनझेन में 2006-2020 के दीर्घकालिक अध्ययन ने सिद्ध किया कि जहां रित अवसंरचना का घनत्व अधिक था, वहां सतही अपवाह में कमी, पीक-फ्लो में कटौती और प्रदूषक फिल्ट्रेशन में सुधार स्पष्ट रूप से मापा जा सका।
राजस्थान के नगर नियोजकों और नीति-निर्माताओं के लिए 'स्पंज सिटी' को मास्टर प्लान में वैधानिक रूप देने की एक स्पष्ट पांच-चरणीय तकनीकी पद्धति है।
पहला चरण -भूवैज्ञानिकों और हाइड्रोलॉजिस्टों के सहयोग से मिट्टी की पारगम्यता और प्राकृतिक जल-स्तर के आधार पर 'सबमर्जिबल ग्रीन स्पेस' की इष्टतम गहराई का आकलन करना, ताकि वर्षा जल भरने पर पौधे सड़ें नहीं। दूसरा चरण- आवासीय, व्यावसायिक और संस्थागत भूमि के प्रत्येक वर्गीकरण के लिए न्यूनतम 'हरित क्षेत्र अनुपात' का विधिक निर्धारण। तीसरा चरण - 'वार्षिक वर्षा जल भंडारण अनुपात' की वैज्ञानिक गणना, जो बताए कि शहर अपनी सीमाओं के भीतर कुल वर्षा का कितना प्रतिशत संचित कर सकता है। चौथा चरण - विभिन्न भूमि उपयोगों के आधार पर 'डिज़ाइन रेनफॉल डेप्थ' का क्षेत्रफल-भारित आकलन। पांचवां चरण - पूरे शहर के लिए समग्र वीसीआरएआर निर्धारित कर उसे मास्टर प्लान के दस्तावेजों में एक मापनीय और बाध्यकारी लक्ष्य के रूप में अंकित करना। ये पांच चरण मिलकर मास्टर प्लान को एक 'जल-संवेदनशील' दस्तावेज में रूपांतरित करते हैं

भूजल संवर्धन करने का सरल सस्ता,गुरु मंत्र
इस पद्धति को धरातल पर उतारने के लिए कई व्यावहारिक तकनीकी उपाय अपनाने होंगे। पार्क का लेवल नीचा रखना आज की परिपाटी में पार्क सडक़ से ऊंचे बनाए जाते हैं, जिससे वर्षा जल बहकर सडक़ों पर आ जाता है। नए पार्कों का स्तर सडक़ से 1-2 फुट नीचे रखा जाए और सडक़ का पानी 'कर्ब कट्स' पार्क की दीवार में ऑपनिंग कट बनाकार वर्षा जल प्रवाह को पार्क में डाइवर्ट किया जाए। भारी वर्षा में ये पार्क अस्थायी 'रिचार्ज बेसिन' का कार्य करेंगे। बायोस्वेल्स- सडक़ों के किनारे कंक्रीट की नालियों के स्थान पर उथली, वनस्पतियुक्त जैविक नालियां बनाई जाएं जो अपवाह की गति धीमी करते हुए पानी को गहराई में छानें। प्राकृतिक निचले क्षेत्रों को यथावत रखा जाए- ये प्राकृतिक अंत:प्रवाह के केंद्र हैं जो मिट्टी की परतों से पानी शुद्ध करके एक्वीफर तक पहुंचाते हैं। स्कूलों, सरकारी परिसरों और सामुदायिक केंद्रों की खुली भूमि को 'वाटर रिचार्ज हब' घोषित किया जाए तथा पुराने बोरवेल और सूखे कुओं को - उचित फिल्ट्रेशन के पश्चात भूजल रिचार्ज के लिए पुन: उपयोग में लाया जाए। वस्तुत: वाटर हार्वेस्टिंग स्ट्रक्चर की सफाई नहीं हो पाती, पेंदे में तलछट जम जाती है जो रिचार्ज नहीं करने देती।

डिजिटल एलिवेशन मॉडल: मास्टर प्लान में तकनीकी क्रांति
नगर नियोजन में केवल द्वि-आयामी (2डी) नक्शों और कागजी रेखाचित्रों पर निर्भरता एक गंभीर तकनीकी सीमा है। आधुनिक मास्टर प्लान तैयार करते समय जीआइएस-आधारित 'डिजिटल एलिवेशन मॉडल' का अनिवार्य उपयोग किया जाना चाहिए। डीईएम तकनीक किसी भी क्षेत्र की स्थलाकृति का उच्च-रिजॉल्यूशन त्रि-आयामी डेटा प्रदान करती है, जिससे यह सटीकता से निर्धारित किया जा सकता है कि किस दिशा में पानी बहेगा, कहां जमेगा और कहां रिसेगा। इससे 'जल-जोखिम क्षेत्र' 'जल-प्रवाह मार्ग' और 'जल-भराव क्षेत्र' को मास्टर प्लान बनने से पहले ही चिह्नित किया जा सकता है। शहरी हरित अवसंरचना और स्पंज सिटी तत्वों के डिजाइन के लिए 30 से 60 सेंटीमीटर रिजॉल्यूशन वाला डीईएम सबसे प्रभावी परिणाम देता है।
इससे भी महत्त्वपूर्ण है 'पेलियोचैनल्स' की पहचान। डीईएम और ट्रिटियम टैगिंग जैसी तकनीकों से प्राचीन भूमिगत नदी-मार्गों को उजागर किया जा सकता है। पश्चिमी गंगा के मैदानों के अध्ययनों से पता चला है कि पेलियोचैनल्स में भूजल पुनर्भरण दर 19-29 फीसदीतक होती है, जबकि सामान्य फ्लडप्लेन में यह मात्र 6-9 फीसदी है। मास्टर प्लान में ऐसे उच्च-रिचार्ज क्षेत्रों को 'नो-कंस्ट्रक्शन इको-जोन' घोषित कर संरक्षित किया जाना अनिवार्य है। डीईएम आधारित विश्लेषण से नदी-नालों में भरे अतिरिक्त जल को पाइपलाइन के माध्यम से सुदूर कृषि या रिचार्ज स्थलों तक पहुंचाने की परियोजनाएं भी तैयार की जा सकती हैं जिससे एक साथ बाढ क़े नियंत्रण और जल-सुरक्षा दोनों साधे जा सकते हैं। इसके समानांतर, वाष्पीकरण नियंत्रण के लिए तैरते सोलर पैनल और विशेष रासायनिक छिडक़ाव के प्रयास हो।
साथ ही, जल को 'मुफ्त की वस्तु' समझने की सामाजिक मानसिकता बदलनी होगी। 'वॉटर ऑडिट' को 500 वर्गमीटर से बड़े वाणिज्यिक और संस्थागत भवनों के लिए वार्षिक रूप से अनिवार्य किया जाए।
इजराइल विश्व में जल-प्रबंधन का निर्विवाद गुरु है। वहां प्रति व्यक्ति जल खपत मात्र 138 घन मीटर वार्षिक है, जबकि ओइसीडी देशों का औसत 691 घन मीटर है। इजराइल अपने अपशिष्ट जल का लगभग 87फीसदी हिस्सा शोधित कर कृषि और उद्योग में पुनर्उपयोग करता है - दुनिया में यह अनुपात सर्वाधिक है। यदि राजस्थान के शहरी अपशिष्ट जल का आधा भी शोधित कर कृषि को दिया जाए, तो भूजल पर दबाव नाटकीय रूप से कम होगा। चेन्नई ने 2003 में सभी भवनों में रेनवाटर हार्वेस्टिंग अनिवार्य करके मात्र कुछ वर्षों में भूजल स्तर और जल गुणवत्ता में आश्चर्यजनक सुधार प्राप्त किया।

नगर नियोजकों, निर्णयकर्ता-नीति निर्माताओं के लिए एक बहु-स्तरीय कार्ययोजना
नगरीय जल संकट को हल करने के लिए आवश्यक है कि नगर नियोजकों और सरकारी नीति निर्माणकर्ता-निर्माताओं के पास एक स्पष्ट,समयबद्ध और मापनीय कार्य योजना हो। यह योजना तीन कालखंडों में विभाजित की जानी चाहिए।
तत्काल कार्यवाही 0.6 माह - सर्वप्रथम, राज्य के समस्त विकास प्राधिकरणों जेडीए, जेओडीए, केडीए, यूआइटी आदि नगरीय निकायों के वर्तमान मास्टर प्लानों की समीक्षा कर ‘भूजल रिचार्ज जोन’ और ‘जल निकाय संरक्षण जोन’ को अनिवार्य जोनिंग श्रेणी के रूप में जोड़ा जाए। डीईएम और जीआइएस विश्लेषण के आधार पर प्रत्येक शहर के प्राकृतिक जल-प्रवाह मार्गों, पेलियोचैनल्स और निचले क्षेत्रों की वैज्ञानिक मैपिंग तत्काल आरंभ हो। राजस्थान अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र, जोधपुर और ओजीडब्ल्यूबी के डेटा का एकीकृत उपयोग करते हुए प्रत्येक शहरी क्षेत्र का ‘भूजल संवेदनशीलता मानचित्र’ तैयार किया जाए। इस मानचित्र पर आधारित होकर भवन निर्माण अनुमोदन प्रक्रिया में ‘स्टॉर्म वाटर मैनेजमेंट प्लान’ को तत्काल अनिवार्य शर्त बनाया जाए।

मध्यकालिक सुधार 6 माह से 2 वर्ष : यूआरडीपीएफआइ् 2015 के दिशानिर्देशों में संशोधन का राज्य-स्तरीय प्रस्ताव केंद्र को भेजा जाए, जिसमें ‘जल-संवेदनशील नगरीय डिजाइन’ को मास्टर प्लान का अनिवार्य अंग घोषित करने की मांग हो। राजस्थान भवन निर्माण उपनियमों में आइएसआर और पीएसआ के स्पष्ट मानक- न्यूनतम 30 फीसदी पारगम्य सतह और बड़े भवनों के लिए रेनवाटर हार्वेस्टिंग प्रमाणपत्र अनिवार्य किए जाएं। शहरी क्षेत्रों में जहां भूजल 20 मीटर से अधिक नीचे जा चुका है, वहां नए बोरवेल पर अस्थायी रोक और कृत्रिम रिचार्ज संरचनाओं का निर्माण प्राथमिकता पर हो। प्रत्येक जिले में वन विभागए नगर निगम, पीएचईडी और विकास प्राधिकरण का एसपीवी गठित कर ‘जल-हरित कैलेंडर’ लागू किया जाए, जिसमें हर गतिविधि, स्थान, प्रजाति, रिक्ति, बजट और जवाबदेह अधिकारी का स्पष्ट उल्लेख हो।

दीर्घकालिक परिवर्तन 2.5 वर्ष: राजस्थान नगर विकास नियमावली में ब्लू-ग्रीन इन्फ्रास्ट्रक्चर स्टेंड्डर्स का एक अलग अध्याय जोड़ा जाए। नए टाउनशिप प्रोजेक्ट्स में 10 फीसदी भूमि जल.संचयन और हरित क्षेत्र के लिए आरक्षित करना कानूनी अनिवार्यता बने। कृषि क्षेत्र के लिए भी चरणबद्ध ढंग से भूजल टैरिफ और सूक्ष्म सिंचाई की अनिवार्यता लागू की जाए। आइओटी आधारित भूजल स्तर निगरानी नेटवर्क,ग्रेस उपग्रह डेटा का मासिक सार्वजनिक प्रकाशन और एआइ आधारित ‘अर्बन वाटर रिस्क असेसमेंट टूल’ ये तीनों एक साथ मिलकर भविष्य के जल प्रबंधन की रीढ़ बनेंगे। प्रत्येक शहर का वार्षिक ‘वाटर बजट’- जितना पानी निकाला, उतना रिचार्ज सुनिश्चित हो, एक कानूनी दायित्व के रूप में स्थापित किया जाए।

पारंपरिक जल-विरासत: विज्ञान और परंपरा का सेतु
हमारे पूर्वजों ने बिना किसी आधुनिक उपकरण के, केवल अनुभव, प्रकृति की समझ और सामूहिक अनुशासन के बल पर ऐसी जलप्रबंधन प्रणालियां विकसित की थीं जो आधुनिक इंजीनियरों को भी आश्चर्यचकित करती हैं। टांका प्रणाली, घरों की छत से वर्षा जल को भूमिगत टैंक में संचित करने की विधि, जो जैसलमेर बाड़मेर, शेखावाटी आदि क्षेत्रों में आज भी है आधुनिक रूफटॉप रेनवाटर हार्वेस्टिंग हर घर संस्थान में अपनाए। बावड़ी, जोहड़, कुओं, तालाब, सूखे ट्यूबवेल को पुनर्जीवित किए जाए।

उपसंहार: जल ही जीवन है, या पौराणिक बोध से वैज्ञानिक संकल्प तक
महाकवि रहीम का यह दोहा- रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून, आज राजस्थान के लिए एक साहित्यिक पंक्ति नहीं, अस्तित्व की अंतिम चेतावनी है।
इस लेख में प्रस्तुत समाधान तीन स्तंभों पर टिके हैं -विज्ञान, नीति और समाज। विज्ञान के स्तर पर, डिजिटल इलिवेशन मॉडल, जल संवेदनशील,आधारित मास्टर प्लान, आइएसआर/पीएसआर नियमन, बायो- रिटेंशन फिल्टर, फाइटोमेडिएशन और वीसीआरएआर की गणना। नीति के स्तर पर- मास्टर प्लान में जल-संवेदनशील भू-उपयोग, कृषि समेत व्यापक भूजल विधेयक, स्पेशल परपस व्हीकल आधारित अंतर विभागीय समन्वय और वैज्ञानिक वृक्षारोपण की कानूनी अनिवार्यता। समाज के स्तर पररू नगरों एवं ग्रामों में स्थित पारंपरिक जल-विरासत का पुनरुद्धार, जल-मित्र नेटवर्क और वाटर बैंक की जन-चेतना धरातल पर सख्ती से लानी होगी।
यदि आज इसी मानसून से पहले हमने अपनी छतों को हार्वेस्टिंग यूनिट में, अपने पार्कों को रिचार्ज बेसिन में, अपनी नालियों को बायोस्वेल में और अपने मास्टर प्लानों को जल-संवेदनशील दस्तावेजों में नहीं बदला, तो आने वाले कुछ ही दशकों में राजस्थान के शहर केवल कंक्रीट की कब्रगाहें बनकर रह जाएंगे। भावी पीढिय़ां हमें इस घोर लापरवाही के लिए कभी माफ नहीं करेंगी।
आइए पौराणिक ज्ञान के दीपक और आधुनिक विज्ञान की रोशनी को एक साथ थामकर, अपने शहरों को कंक्रीट के रेगिस्तान से ‘जल-समृद्ध स्पंज सिटी’ में रूपांतरित करें। क्योंकि, यह हमारी अगली पीढ़ी के प्रति हमारा सबसे पवित्र और अपरिहार्य दायित्व है।