
दवाइयों की मनमानी कीमतों और मरीजों पर बढ़ते इलाज के बोझ को लेकर सुप्रीम कोर्ट की चिंता के बीच राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) के कैंसर की 543 ब्रांडेड दवाओं की कीमतों में संशोधन तथा 137 कैंसररोधी दवाओं पर ट्रेड मार्जिन सीमित करने का निर्णय स्वागत योग्य कहा जाएगा। इससे कैंसर मरीजों और उनके परिवारों को राहत अवश्य मिलेगी, लेकिन यह राहत अभी अधूरी ही है। हकीकत यह है कि कैंसर समेत कई दूसरी गंभीर बीमारियों की दवाएं आज भी आम आदमी की पहुंच से बाहर हैं। दवाइयों की उत्पादन लागत और अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) के बीच का बड़ा अंतर यह बताता है कि दवा उद्योग में मुनाफे का खेल मरीजों की मजबूरी पर टिका हुआ है।
कैंसररोधी दवाओं की कीमतों में कटौती की मांग लंबे समय से उठती रही है। स्वास्थ्य संबंधी संसदीय समिति ने भी कई बार इस मुद्दे पर चिंता जताई है। दरअसल, समस्या केवल कैंसर की दवाओं तक सीमित नहीं है। उत्पादन से उपभोक्ता तक की यात्रा में जुडऩे वाले भारी-भरकम व्यापारिक मार्जिन किसी भी बीमारी के उपचार को आम मरीज के लिए असहनीय बना देते हैं। एनपीपीए द्वारा ट्रेड मार्जिन को 30 प्रतिशत तक सीमित करने का फैसला सही दिशा में उठाया गया कदम है, लेकिन इससे समस्या का पूर्ण समाधान नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट भी यह सवाल उठा चुका है कि अन्य महंगी दवाओं और अस्पतालों के माध्यम से बेची जाने वाली दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे। यदि सरकार वास्तव में सस्ती दवा उपलब्ध कराना चाहती है, तो उसे व्यापक स्तर पर मूल्य नियंत्रण की नीति अपनानी होगी। महंगी दवाइयों से जुड़ी समस्या की जड़ पेटेंट कानून भी है जो दवा कंपनियों को अनुसंधान और नवाचार के बदले विशेष अधिकार देता है। ये अधिकार ही कई बार एकाधिकार और मनमाने मूल्य निर्धारण का माध्यम बन जाते हैं।
जबकि भारतीय पेटेंट कानून में स्पष्ट प्रावधान है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य हित सर्वोपरि है। आपातकालीन परिस्थितियों, सार्वजनिक जरूरतों या गैर-व्यावसायिक उपयोग के मामलों में सरकार अनिवार्य लाइसेंस जारी कर सकती है तथा पेटेंट नवाचार का सार्वजनिक उपयोग सुनिश्चित कर सकती है। दुर्भाग्य से इन कानूनी प्रावधानों का प्रभावी प्रयोग नहीं हो रहा है। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि सरकार के पास अक्सर ऐसे ठोस आंकड़ों का अभाव रहता है, जिनके आधार पर पेटेंट कानून के इस अधिकार का इस्तेमाल प्रभावी तौर पर कर सके। इसीलिए हर बार मरीजों के हितों की रक्षा करने वाले सरकारी प्रयास कागजों तक सीमित रह जाते हैं।केवल कुछ दवाओं पर सीमित नियंत्रण से बात नहीं बनेगी। जरूरत ऐसी सख्त और व्यापक नीति की है, जो दवा कंपनियों के बेलगाम मुनाफे की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाए ताकि मरीजों को सस्ता उपचार पाने का अधिकार मिल सके।