भारत को अपनी रक्षा आवश्यकताओं और नागरिक नवाचार के बीच मजबूत संस्थागत सेतु बनाना होगा। विश्वविद्यालयों, तकनीकी संस्थानों, अनुसंधान संस्थानों और स्टार्टअप्स को रक्षा परियोजनाओं से जोड़ना होगा, जिससे नई तकनीकें सीधे सैन्य उपयोग में आ सकें।
मिलिंद कुमार शर्मा - प्रोफेसर (एमबीएम विवि, जोधपुर),
यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि आज विश्व बहुध्रुवीयता, क्षेत्रीय संघर्ष, तकनीकी प्रतिस्पर्धा, आर्थिक राष्ट्रवाद और आपूर्ति-शृंखला विखंडन की ओर तेजी से अग्रसर है। ऐसे में किसी भी देश के लिए मात्र सैन्य शक्ति या आर्थिक विकास पर्याप्त नहीं है। सुरक्षा और विकास दोनों को एक साथ साधने के लिए 'सिविल-मिलिट्री फ्यूजन,' अर्थात नागरिक-सैन्य संलयन, एक अनिवार्य रणनीति के रूप में उभरकर सामने आया है।
'सिविल-मिलिट्री फ्यूजन' का मूल अर्थ है कि नागरिक क्षेत्र की तकनीक, उद्योग, व्यापार, शिक्षा, अनुसंधान और मानव संसाधन सैन्य आवश्यकताओं के साथ जुड़कर एक-दूसरे के पूरक बन परस्पर दृढता प्रदान करें। आधुनिक सुरक्षा चुनौतियां अब युद्धस्थल तक सीमित नहीं रहीं हैं। आज प्रतिस्पर्धा साइबर स्पेस, अंतरिक्ष, समुद्री आवागमन, सूचना तंत्र और अर्थव्यवस्था तक फैल चुकी है।
ऑपरेशन सिंदूर और रूस-यूक्रेन संघर्ष में यह सिद्ध हो चुका है कि आधुनिक संघर्ष अब पूर्णतया तकनीक-प्रधान हो चुके हैं। ड्रोन, एआइ, क्वांटम कंप्यूटिंग, सैटेलाइट, साइबर सुरक्षा, डेटा विश्लेषण और उन्नत संचार प्रणालियां किसी भी देश की सुरक्षा क्षमता तय करती हैं। इन तकनीकों का विकास मुख्य रूप से सरकारी विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों और निजी स्टार्टअप व व्यवसायी संगठनों में होता है। यदि सैन्य संस्थान इनसे अलग-थलग रहें, तो संभव है वे नई तकनीकों को अपनाने में पीछे रह जाएंगे।
'सिविल-मिलिट्री फ्यूजन' इसी दूरी को कम कर सुनिश्चित कर सकता है कि नागरिक नवाचार समय पर सैन्य उपयोग में आ सकें। संयुक्त राज्य अमरीका इसका एक व्यावहारिक उदाहरण है। वहां लंबे समय से निजी उद्योग और रक्षा क्षेत्र के बीच गहरा सहयोग रहा है। बोइंग कंपनी नागरिक विमानों के साथ-साथ लड़ाकू विमान और रक्षा प्रणालियां विकसित करती है। इसी तरह जनरल इलेक्ट्रिक कंपनी के जेट इंजन और उन्नत तकनीकें नागरिक और सैन्य दोनों क्षेत्रों में उपयोग होती हैं। इससे स्पष्ट होता है कि नागरिक उद्योग और सैन्य आवश्यकताएं साथ चलें, तो तकनीकी बढ़त और औद्योगिक विकास दोनों संभव हो सकते हैं।
सिविल-मिलिट्री फ्यूजन घरेलू उद्योगों को रक्षा उत्पादन से जोड़कर इस निर्भरता को कम कर संकट के समय देश को आत्मनिर्भर बना सकता है। इस संदर्भ में चीन का अनुभव देखना भी रोचक होगा। चीन ने 'सिविल-मिलिट्री फ्यूजन' को राष्ट्रीय रणनीति का हिस्सा बनाया है। वहां विश्वविद्यालयों, निजी कंपनियों और सैन्य संस्थानों के बीच सहयोग को बढ़ावा देने का है। वहां की 'एविएशन इंडस्ट्री कॉर्पोरेशन ऑफ चाइना' नागरिक विमानों के साथ लड़ाकू विमान और ड्रोन भी बनाती है।
इसी प्रकार 'चाइना स्टेट शिप बिल्डिंग कॉर्पोरेशन' वाणिज्यिक जहाजों के साथ युद्धपोत और पनडुब्बियां भी तैयार करती है। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि चीन में नागरिक उद्योग सीधे सक्रिय रूप से सैन्य शक्ति से जुड़े हुए हैं। 'सिविल-मिलिट्री फ्यूजन' केवल तकनीक और उद्योग तक सीमित नहीं है, अपितु मानव संसाधन से भी गहराई से जुड़ा विषय है। आज की सुरक्षा चुनौतियां इंजीनियरों, वैज्ञानिकों, डेटा विशेषज्ञों और नीति-विश्लेषकों की मांग करती हैं। जब नागरिक विशेषज्ञ सैन्य परियोजनाओं में योगदान देते हैं और सैन्य अनुभव नागरिक संस्थानों तक पहुंचता है, तो देश की समग्र क्षमता बढ़ती है।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भारत के लिए 'सिविल-मिलिट्री फ्यूजन' का महत्व और भी अधिक है, जहां भारत को एक ओर जटिल सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ता है और दूसरी ओर तेज आर्थिक विकास, रोजगार सृजन और तकनीकी आत्मनिर्भरता भी प्राप्त करनी है। ऐसे में प्रश्न यह है कि भारत क्या कर सकता है और यह सब कैसे किया जा सकता है। सबसे पहले, भारत को अपनी रक्षा आवश्यकताओं और नागरिक नवाचार के बीच मजबूत संस्थागत सेतु बनाना होगा। विश्वविद्यालयों, तकनीकी संस्थानों, अनुसंधान संस्थानों और स्टार्टअप्स को रक्षा परियोजनाओं से जोड़ना होगा, जिससे नई तकनीकें सीधे सैन्य उपयोग में आ सकें।
इसके लिए सरकार को स्पष्ट नीतियां, दीर्घकालिक रोडमैप और स्थिर वित्तीय समर्थन देना होगा। साथ ही निजी क्षेत्र की भूमिका को और सशक्त करना आवश्यक है। रक्षा उत्पादन को केवल सार्वजनिक क्षेत्र तक सीमित रखने की अपेक्षा निजी कंपनियों, सूक्ष्म एवं मझोले उद्योग और स्टार्टअप्स को बड़े स्तर पर अवसर दिए जाने होंगे। इससे प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, लागत घटेगी और नवाचार को गति मिलेगी। निसंदेह रक्षा में विकसित उपयोग वाली तकनीकें नागरिक उद्योग को भी लाभ पहुंचाएंगी। मानव संसाधन विकास पर भी विशेष ध्यान देना होगा।
इनके अतिरिक्त भारत को आत्मनिर्भरता के साथ-साथ वैश्विक सहयोग का उचित संतुलन बनाना होगा। मित्र देशों के साथ संयुक्त अनुसंधान, सह-उत्पादन और तकनीक साझेदारी से भारत अपनी क्षमताएं बढ़ा सकता है, जबकि मुख्य नियंत्रण और उत्पादन क्षमता देश के भीतर बनी रहे। किंतु 'सिविल-मिलिट्री फ्यूजन' में लोकतांत्रिक संतुलन बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। पारदर्शिता, जवाबदेही और नागरिक नियंत्रण सुनिश्चित करना होगा, जिससे सुरक्षा के नाम पर लोकतांत्रिक मूल्यों से समझौता न हो।
इसका उद्देश्य समाज का सैन्यीकरण नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संसाधनों का विवेकपूर्ण और संतुलित उपयोग होना चाहिए। अत: आज के भू-रणनीतिक और विखंडित विश्व में 'सिविल-मिलिट्री फ्यूजन' एक विकल्प नहीं, अपितु अनिवार्यता बन चुका है। भारत यदि इसे स्पष्ट नीति, सुदृढ़ संस्थानों और दीर्घकालिक दृष्टि के साथ क्रियान्वित करता है, तो वह न केवल अपनी सुरक्षा को सुदृढ़ कर पाएगा, अपितु आर्थिक विकास और तकनीकी नेतृत्व के मार्ग पर भी तेजी से आगे बढ़ सकेगा।