सैन्य बलों में महिलाओं की भागीदारी और उन्हें समान अवसर देने का प्रश्न केवल रोजगार या पदोन्नति का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज की सोच, संस्थागत संरचना और संविधान में निहित समानता के मूल्यों की परीक्षा भी है। हाल में सुप्रीम कोर्ट की ओर से शॉर्ट सर्विस कमीशन (एसएससी) वाली महिला अधिकारियों को […]
सैन्य बलों में महिलाओं की भागीदारी और उन्हें समान अवसर देने का प्रश्न केवल रोजगार या पदोन्नति का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज की सोच, संस्थागत संरचना और संविधान में निहित समानता के मूल्यों की परीक्षा भी है। हाल में सुप्रीम कोर्ट की ओर से शॉर्ट सर्विस कमीशन (एसएससी) वाली महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने के मामले में की गई टिप्पणी इसी व्यापक संदर्भ को उजागर करती है। अदालत ने कहा कि स्थायी कमीशन (पीसी) देने की प्रक्रिया में प्रणालीगत भेदभाव और असमान मापदंड अपनाए गए हैं। कोर्ट की यह टिप्पणी केवल प्रशासनिक खामी की ओर इशारा नहीं करती, बल्कि उस मानसिकता को भी सामने लाती है, जो आज भी कई संस्थानों में लैंगिक असमानता को बनाए हुए है।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही सेना में महिलाओं के लिए स्थायी कमीशन का मार्ग प्रशस्त कर चुका है। इसके बावजूद, नए मापदंडों जैसे एसीआर के वेटेज और अन्य शर्तों के माध्यम से महिलाओं को पीछे धकेलने की प्रवृत्ति चिंता का विषय है। सेना में पुरुषों का वर्चस्व ऐतिहासिक रूप से रहा है, लेकिन बदलते समय के साथ यह धारणा अब टिकाऊ नहीं रह गई है। आधुनिक युद्ध और सैन्य प्रशासन केवल शारीरिक क्षमता तक सीमित नहीं हैं। इसमें नेतृत्व, रणनीति, तकनीकी दक्षता और मानसिक दृढ़ता की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। इन सभी क्षेत्रों में महिलाएं अपनी योग्यता सिद्ध कर चुकी हैं। ऐसे में उन्हें समान अवसर न देना न केवल अन्याय है, बल्कि राष्ट्रीय संसाधनों का भी दुरुपयोग है। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश कि चयन प्रक्रिया, कट-ऑफ और अंक वितरण की समीक्षा की जाए, एक सकारात्मक कदम है। पारदर्शिता और निष्पक्षता किसी भी संस्था की विश्वसनीयता की आधारशिला होती है। यदि हर बैच और हर कैडर में उपलब्ध वैकेंसी, मापदंड और मूल्यांकन प्रणाली स्पष्ट रूप से सामने रखी जाए, तो न केवल भेदभाव की संभावना कम होगी, बल्कि महिलाओं का विश्वास भी संस्थान में मजबूत होगा।
हालांकि, यह भी एक सच्चाई है कि भारत में लैंगिक समानता की दिशा में प्रगति अक्सर न्यायिक हस्तक्षेप के माध्यम से ही होती है। यह प्रवृत्ति आत्ममंथन का विषय है। लैंगिक भेदभाव केवल नीतियों में नहीं, बल्कि हमारे सोचने के तरीके में भी गहराई से समाया हुआ है। जब तक यह मानसिकता नहीं बदलेगी, तब तक नियमों में बदलाव भी सीमित प्रभाव ही डाल पाएंगे। इसलिए आवश्यक है कि ऐेसे मामलों में संस्थानों के साथ-साथ समाज के हर स्तर पर जागरूकता और संवेदनशीलता बढ़ाई जाए। यह सभी को याद रखना चाहिए महिलाओं को समान अवसर देना कोई विशेष सुविधा नहीं, बल्कि उनका अधिकार है। मजबूत, समावेशी और आधुनिक भारत का निर्माण करने की चाहत के बीच यह सुनिश्चित करना होगा कि हर क्षेत्र में महिलाओं को बिना किसी भेदभाव के आगे बढऩे का अवसर मिले।