
fuel problems in india
राजेंद्र राठौड़, (पूर्व नेता प्रतिपक्ष राजस्थान विधानसभा)- आज दुनिया जिस दौर से गुजर रही है, उसमें ऊर्जा केवल विकास का साधन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और आत्मनिर्भरता का आधार बन चुकी है। रूस-यूके्रन युद्ध हो या पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव, हर वैश्विक संकट ने स्पष्ट कर दिया है कि जिन देशों की ऊर्जा जरूरतें आयातित तेल और गैस पर निर्भर हैं, वे किसी भी अंतरराष्ट्रीय उथल-पुथल के सामने आर्थिक दबाव में आ जाते हैं। भारत भी अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल और गैस के रूप में विदेश से खरीदता है। परिणामस्वरूप जैसे ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो उसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था, रुपए की स्थिति, महंगाई और आम आदमी की जेब पर पड़ता है।
हमारा देश दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल का उपभोक्ता है, जो अपनी जरूरत का 80 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। वर्ष 2024-25 में भारत का कच्चे तेल का आयात बिल 137 अरब डॉलर था। इसमें से भी सर्वाधिक तेल होर्मुज के रास्ते से ही देश में आता है। हालांकि पश्चिम एशिया में बढ़ती ऊर्जा अनिश्चितताओं के बीच देश ने अपने कच्चे तेल के आयात स्रोतों में भी विविधता लाते हुए निर्भरता को 27 देशों से बढ़ाकर 41 देशों तक पहुंचाया है। केंद्र सरकार ने रिफाइनरियों में एलपीजी उत्पादन बढ़ाने के निर्देश दिए हैं जिसके परिणामस्वरूप घरेलू उत्पादन 36 हजार मीट्रिक टन प्रतिदिन से बढ़कर 54 हजार मीट्रिक टन प्रतिदिन तक पहुंच गया। लेकिन यह केवल तात्कालिक समाधान है। स्थायी समाधान तो तभी संभव है जब देश महंगे जीवाश्म ईंधन से धीरे-धीरे मुक्त होकर स्वच्छ और अक्षय ऊर्जा की ओर बढ़े। वैश्विक युद्ध और ऊर्जा संकट के इस दौर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही देशवासियों से पेट्रोल-डीजल, गैस और अन्य पेट्रो उत्पादों का उपयोग केवल आवश्यकता के अनुसार करने, मेट्रो और रेलवे जैसी सार्वजनिक सुविधाओं को अपनाने, कार पूलिंग बढ़ाने, खाने में तेल का कम इस्तेमाल करने जैसी अपील की है, क्योंकि ऊर्जा और विदेशी मुद्रा की बचत ही देश को आर्थिक रूप से मजबूत बनाएगी। हालांकि वैश्विक संकट के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत गति से आगे बढ़ रही है और वर्ष 2026-27 में लगभग 7 प्रतिशत वृद्धि दर का अनुमान है लेकिन इस विकास को लंबे समय तक स्थिर रखना है तो ऊर्जा सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत ने ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़े और ऐतिहासिक कदम उठाए हैं।
आज देश ने सौर ऊर्जा के क्षेत्र में अभूतपूर्व उपलब्धियां हासिल की हैं। 31 मार्च 2026 तक देश की कुल सौर ऊर्जा क्षमता 150 गीगावाट तक पहुंच चुकी है, जबकि वर्ष 2014 में यह मात्र 2.82 गीगावाट थी। यानी केवल बारह वर्षों में 53 गुना वृद्धि। यह केवल आंकड़ा नहीं बल्कि भारत की बदलती ऊर्जा सोच का प्रतीक है। भारत ने जून 2025 में ही वह लक्ष्य प्राप्त कर लिया, जिसे पेरिस समझौते के तहत वर्ष 2030 तक हासिल करना था। देश की कुल स्थापित विद्युत क्षमता का 50 प्रतिशत हिस्सा अब गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से आ रहा है। 'नवीकरणीय ऊर्जा सांख्यिकी 2026' के अनुसार भारत अब स्थापित नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के मामले में ब्राजील को पीछे छोड़कर विश्व में तीसरे स्थान पर पहुंच चुका है। यह भारत की आर्थिक स्वतंत्रता और रणनीतिक मजबूती का भी संकेत है। इस परिवर्तन में राजस्थान की भूमिका सबसे महत्त्वपूर्ण है। राजस्थान अब 'ऊर्जा प्रदेश' के रूप में भी पहचाना जा रहा है। नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के 31 मार्च 2026 तक जारी आंकड़ों के अनुसार राजस्थान की कुल स्थापित नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता लगभग 47,020 मेगावाट तक पहुंच चुकी है तथा सौर ऊर्जा उत्पादन में राजस्थान देश में प्रथम स्थान पर है। राजस्थान की भौगोलिक परिस्थितियां इस दिशा में उसे प्राकृतिक बढ़त प्रदान करती हैं। यहां वर्षभर प्रचुर मात्रा में सूर्य का प्रकाश उपलब्ध रहता है, भूमि का विशाल विस्तार है और सौर विकिरण का स्तर देश में सबसे अधिक है।
राज्य सरकार की प्रभावी नीतियों, नए सोलर पार्कों और ट्रांसमिशन परियोजनाओं ने इस विकास को और गति दी है। प्रधानमंत्री के नेतृत्व में आज राजस्थान ऊर्जा आत्मनिर्भरता की नई गाथा लिख रहा है। पीएम-कुसुम योजना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। इस योजना के तहत प्रदेश में स्थापित सौर ऊर्जा संयंत्रों की कुल क्षमता 4 हजार मेगावाट तक पहुंच चुकी है। रूफटॉप सोलर के क्षेत्र में भी राजस्थान तेजी से आगे बढ़ रहा है। राज्य में घरेलू, अघरेलू तथा औद्योगिक श्रेणी में कुल 2,45,317 रूफटॉप सौर ऊर्जा संयंत्र लगाए जा चुके हैं। कुल रूफटॉप सोलर इंस्टॉलेशन के मामले में राजस्थान देश में तीसरे स्थान पर है, जिसकी कुल क्षमता 2090 मेगावाट है। पीएम सूर्यघर योजना के तहत अब तक 1 लाख 77 हजार 468 रूफटॉप संयंत्र स्थापित किए जा चुके हैं। यह परिवर्तन केवल शहरों तक सीमित नहीं है। गांवों में भी अब घर-घर सौर ऊर्जा पहुंच रही है।
इस उज्ज्वल तस्वीर के साथ कुछ गंभीर चुनौतियां भी हैं। राजस्थान आज जितनी सौर ऊर्जा पैदा कर रहा है, उतनी बिजली को प्रभावी ढंग से उपयोग और वितरण करने के लिए आवश्यक ट्रांसमिशन ढांचा पर्याप्त नहीं है। इसे 'सोलर कर्टेलमेंट' कहा जाता है। इसके पीछे ग्रिड क्षमता की कमी, स्टोरेज सिस्टम का अभाव, डिस्कॉम स्तर पर कमजोर लोड मैनेजमेंट और मांग-सप्लाई असंतुलन है। इसलिए केवल बिजली पैदा करना पर्याप्त नहीं, उसे संग्रहित और वितरित करना भी जरूरी है। बड़े पैमाने पर बैटरी स्टोरेज और आधुनिक ट्रांसमिशन ग्रिड का विस्तार आवश्यक है। परिवहन क्षेत्र में इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने से तेल आयात पर निर्भरता घट सकती है। भारत के सामने ऐतिहासिक अवसर है। दुनिया जिस समय ऊर्जा संकट, महंगे ईंधन और जलवायु परिवर्तन से जूझ रही है, ऐसे समय में भारत सूर्य की शक्ति को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना सकता है। ऊर्जा सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा के बराबर महत्त्व देना आवश्यक है। घरेलू तेल और गैस खोज के साथ-साथ सौर, पवन और हरित हाइड्रोजन में बड़े निवेश किए जाएं, ट्रांसमिशन नेटवर्क मजबूत किया जाए और आम नागरिकों को ऊर्जा बचत के लिए प्रेरित किया जाए। यदि सौर ऊर्जा का सही उपयोग किया गया, तो आने वाले समय में भारत न केवल महंगे ईंधन से मुक्ति पा सकता है, बल्कि दुनिया को स्वच्छ ऊर्जा का नया मॉडल भी दे सकता है।
Published on:
12 May 2026 03:58 pm
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