
WaterHarvesting
बाबूलाल जाजू, पर्यावरणविद्
देश के अनेक हिस्सों में हर वर्ष गर्मी आते ही पेयजल संकट विकराल रूप धारण कर लेता है। कहीं टैंकरों से पानी की सप्लाई हो रही है, तो कहीं ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं कई किलोमीटर दूर से पानी लाने को मजबूर हैं। भू-जल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। नदियां, तालाब तथा कुएं सूखते जा रहे हैं। ऐसे समय में यदि किसी एक प्रभावी और स्थायी समाधान की सबसे अधिक आवश्यकता है, तो वह है वाटर हार्वेस्टिंग अर्थात वर्षाजल संचयन।
विडंबना यह है कि जिस देश में हर वर्ष करोड़ों लीटर वर्षा का पानी धरती पर गिरता है, उसी देश में लोग पीने के पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि हम वर्षाजल को सहेजने के बजाय उसे नालों और नदियों के माध्यम से व्यर्थ बहने देते हैं। यदि वर्षा के पानी को वैज्ञानिक तरीके से संरक्षित किया जाए, तो देश में गहराते जल संकट को काफी हद तक समाप्त किया जा सकता है।
सरकारों द्वारा वर्षों से वाटर हार्वेस्टिंग को बढ़ावा देने के लिए योजनाएं चलाई जा रही हैं। सरकारी कार्यालयों, अस्पतालों, विद्यालयों और सार्वजनिक भवनों में वर्षाजल संचयन प्रणाली स्थापित करने के निर्देश भी दिए गए हैं, लेकिन धरातल पर स्थिति चिंताजनक है। अधिकांश भवनों में बने वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम या तो खराब पड़े हैं या फिर उनका सही उपयोग नहीं हो रहा। कहीं पाइप टूटे हुए हैं, कहीं पाइप जाम हैं, तो कहीं स्टोरेज टैंक इतने छोटे हैं कि उनका कोई वास्तविक लाभ नहीं मिल पाता। कई स्थानों पर सिस्टम केवल दिखावे के लिए बने हुए हैं। यदि गंभीरता से निरीक्षण किया जाए, तो यह स्पष्ट होगा कि लगभग 90 प्रतिशत वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम प्रभावी रूप से कार्य नहीं कर रहे हैं। इससे करोड़ों लीटर वर्षाजल हर वर्ष व्यर्थ बह जाता है। यह केवल सरकारी भवनों तक सीमित समस्या नहीं है, बल्कि निजी भवनों, होटल, रिसॉर्ट, विवाह स्थल और बड़े आवासीय परिसरों में भी स्थिति कम चिंताजनक नहीं है।
नियमों के अनुसार एक निश्चित क्षेत्रफल से बड़े भवनों में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाना अनिवार्य है, लेकिन अधिकांश लोग इसकी पालना नहीं करते। नगर निगम और नगर परिषद भवन निर्माण की अनुमति देते समय सुरक्षा राशि जमा करवाते हैं और वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम बनने पर राशि वापस करने का प्रावधान भी रखते हैं, फिर भी बड़ी संख्या में भवन मालिक इस व्यवस्था को नजरअंदाज कर देते हैं। परिणामस्वरूप छतों पर गिरने वाला लाखों लीटर पानी सीधे नालियों में बह जाता है। यदि हर भवन में प्रभावी वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाया जाए और बड़े भूमिगत टैंक अथवा रिचार्ज पिट बनाए जाएं, तो भू-जल स्तर में उल्लेखनीय सुधार संभव है। वर्षाजल को जमीन में पहुंचाने से सूखते बोरवेल पुनर्जीवित हो सकते हैं और आने वाले वर्षों में पेयजल संकट काफी हद तक कम हो सकता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि वाटर हार्वेस्टिंग को केवल सरकारी योजना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय जनआंदोलन बनाया जाए। प्रदेश और देश में लाखों विद्यालय, सरकारी कार्यालय, अस्पताल और सार्वजनिक भवन हैं। वर्षा ऋतु से पहले इन सभी भवनों की तकनीकी जांच अनिवार्य रूप से होनी चाहिए। जहां सिस्टम खराब हैं, वहां मरम्मत हो। केवल कागजों में योजनाएं दिखाकर जल संकट समाप्त नहीं किया जा सकता। सरकार को इस दिशा में सख्त कदम उठाने होंगे। जिन भवनों में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम नहीं है या जो कार्य नहीं कर रहे, वहां जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही भी तय हो। नगर निकायों को केवल अनुमति देने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि समय-समय पर निरीक्षण कर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वर्षाजल संचयन व्यवस्था वास्तव में काम कर रही है।
ग्रामीण क्षेत्रों में भी पारंपरिक जल स्रोतों-तालाब, कुएं, बावडिय़ां और टांके को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। राजस्थान सहित देश के कई हिस्सों में पूर्वजों ने वर्षाजल संरक्षण की अद्भुत परंपरा विकसित की थी। उन्हीं व्यवस्थाओं ने सदियों तक जल संकट को नियंत्रित रखा। आज आधुनिकता के दौर में हम उन व्यवस्थाओं को भूल गए हैं और उसका परिणाम जल संकट के रूप में सामने आ रहा है।
जल संरक्षण केवल सरकार का दायित्व नहीं, बल्कि हर नागरिक की जिम्मेदारी है। यदि प्रत्येक परिवार अपनी छत का पानी सहेजने का संकल्प ले और हर संस्था प्रभावी वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम स्थापित करे, तो आने वाले वर्षों में जल संकट को काफी हद तक रोका जा सकता है।
Published on:
12 May 2026 04:23 pm
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