
जीवन का, शिक्षा का, अर्जन का एक ही लक्ष्य रह गया- लक्ष्मीपति होना। यही सफलता का मापदण्ड भी बन गया। कितना भी कमाओ, कम लगता है। उपयोग केवल सुख के लिये - भोग के लिए। वैसे भी धन की तीन ही अवस्थाएं होती हैं— दान, भोग और नाश।
Gulab Kothari Articles : स्पंदन :ज्ञान को जीवन का श्रेष्ठतम आभूषण कहा गया है। व्यक्ति जब ज्ञान और समृद्धि दोनों में सात्विक रूप से प्रतिष्ठित रहता है तभी समाज में शीर्ष कोटि का सम्मान पाता है।
शिक्षा ने दृष्टि को कुंठित कर दिया। भौतिकता, उपभोगवाद, श्रेष्ठता का नाप-तोल सभी धन-आधारित हो पड़ा। शरीर ही उपयोग का क्षेत्र रह गया। ज्ञान का क्षेत्र भी भौतिक शिक्षा पर आकर ठहर गया। आज पिता की सम्पत्ति के लिए भाई-बहन कोर्ट में पहुंच रहे हैं। सम्पत्ति के संघर्ष जानलेवा हो रहे हैं। इसके आगे बांटने का कुछ बचता ही नहीं है। पिता की ज्ञान-सम्पदा की ओर किसी का ध्यान तक नहीं जाता।