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बहुध्रुवीय विश्व में भारत की कूटनीतिक सफलता का डंका

वाणिज्य मंत्रालय के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2023-24 में भारत का कुल निर्यात (वस्तु एवं सेवा) 778.21 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया।
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जयपुर

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Opinion Desk

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घनश्याम तिवाड़ी

Sep 16, 2026

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इक्कीसवीं सदी के अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक संक्रमण काल में भारत अब रक्षात्मक तटस्थता के घेरे में सिमटा संकोची राष्ट्र नहीं रहा। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में, स्वतंत्रता के बाद भारत को अक्सर 'गुटनिरपेक्षता' की अमूर्त अवधारणा के साथ देखा गया, जहां वैश्विक शक्ति-संतुलन में अपनी स्वायत्तता के नाम पर उसे दोनों खेमों से उपेक्षित होना पड़ा।कश्मीर जैसे गंभीर अंतरराष्ट्रीय मुद्दों के समय अपने न्यायसंगत पक्ष को मनवाने के लिए भारत को बारंबार सोवियत संघ के 'वीटो' पर निर्भर रहना पड़ा, जो हमारी कूटनीतिक लाचारी का परिचायक था। परंतु 2014 के बाद भारत ने इस पुरानी रक्षात्मक मानसिकता को पूरी तरह छिन्न-भिन्न कर दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विश्व बिरादरी को स्पष्ट संदेश दिया कि गुटनिरपेक्षता का अर्थ निष्क्रिय तटस्थता नहीं हो सकता। नया भारत किसी खेमे से भयभीत होकर नहीं, बल्कि विश्व की शक्तियों के साथ अपनी शर्तों और 'विशुद्ध राष्ट्रीय हितों' के आधार पर संबंध बना रहा है।

भारतीय कूटनीति की यह नई इमारत मजबूत आर्थिक और रणनीतिक आंकड़ों की नींव पर टिकी है। कूटनीतिक सफलताओं को वैश्विक व्यापार से जोड़ते हुए भारत ने ऐतिहासिक आर्थिक छलांग लगाई है। वाणिज्य मंत्रालय के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2023-24 में भारत का कुल निर्यात (वस्तु एवं सेवा) 778.21 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। इसी प्रकार अप्रेल 2014 से सितंबर 2024 के बीच देश में लगभग 709.84 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) आया, जिससे भारत ने एक ट्रिलियन डॉलर के कुल एफडीआइ का ऐतिहासिक मील का पत्थर पार किया। यूएई (सीईपीए), ऑस्ट्रेलिया (ईसीटीए) और यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (ईएफटीए) के साथ हुए ऐतिहासिक व्यापारिक समझौते और 100 अरब डॉलर के सुनिश्चित निवेश की प्रतिबद्धताएं हमारी 'रणनीतिक स्वायत्तता' के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। आर्थिक सामथ्र्य के साथ-साथ कूटनीतिक शक्तिको विस्तार देने के लिए देश के भीतर 'भारत मंडपम' व 'यशोभूमि' जैसे बुनियादी ढांचों का निर्माण हुआ, जिसने साबित किया कि भारत किसी भी बड़े कूटनीतिक आयोजन का नेतृत्व करने में सक्षम है।

वैदेशिक नीतियों के मोर्चे पर, भारत ने 'डोजियर सौंपने' की कायरतापूर्ण नीति को त्यागकर 'सक्रिय रक्षा' (एक्टिव डिफेंस) का मार्ग अपनाया। उरी और पुलवामा के बाद सर्जिकल और एयर स्ट्राइक से दुनिया को संदेश दिया कि संप्रभुता पर प्रहार बर्दाश्त नहीं होगा। संयुक्त राष्ट्र में आतंकवाद के विरुद्ध 'जीरो टॉलरेंस' और एफएटीएफ के जरिये पाकिस्तान पर वित्तीय दबाव इसके अहम कूटनीतिक परिणाम रहे। पश्चिम एशिया में 'डी-हाइफनेशन' नीति के तहत ईरान-सऊदी अरब और इजरायल-अरब राष्ट्रों के बीच संतुलन साधते हुए भारत ने अपने हितों को सर्वोपरि रखा। वैश्विक राजनीति में अत्यंत जटिल शक्ति-संतुलन और 'कूटनीतिक एकता' साधने की अद्वितीय कला का सबसे श्रेष्ठ, प्रासंगिक और ज्वलंत उदाहरण हाल में 'भारत मंडपम' में संपन्न हुआ 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन है। देशों के बीच अंतर्विरोधों के बावजूद भी 'नई दिल्ली घोषणापत्र' पर आम सहमति बनाना, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन सहित कई राष्ट्राध्यक्षों को एकजुट करना और 'ब्रिक्स बिजनेस फोरम' के जरिये स्टार्टअप्स व नवाचार पर साझा एजेंडा तय करना प्रधानमंत्री की उस बेजोड़ 'कूटनीतिक एकता' का साक्षात प्रमाण है जो विभाजित दुनिया में भी विकास व संवाद का मजबूत पुल बना रही है।

इस कूटनीतिक स्वायत्तता को भारत की उस बढ़ती रक्षा आत्मनिर्भरता से भी भारी बल मिला है, जिसके अंतर्गत रक्षा मंत्रालय के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2013-14 की तुलना में भारत का रक्षा निर्यात लगभग 31 गुना बढ़कर वित्त वर्ष 2023-24 में 21,083 करोड़ रुपए के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है। इस प्रकार जी-20 और ब्रिक्स जैसे वैश्विक सम्मेलनों के सफल आयोजनों ने भारत को अंतरराष्ट्रीय मंचों का स्वाभाविक सूत्रधार बना दिया है। वर्ष 2023 में आयोजित जी-20 शिखर सम्मेलन और हालिया ब्रिक्स सम्मेलन की अभूतपूर्व सफलताओं का यदि समग्र विश्लेषण किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि भारत अब केवल एक भागीदार नहीं, बल्कि वैश्विक दिशा-निर्माता है। जी-20 में आम सहमति बनाने से लेकर ब्रिक्स सम्मेलन में महाशक्तियों को एक मेज पर लाने तक की यह यात्रा प्रदर्शित करती है कि भारत की कूटनीति अब किसी दबाव या विचारधारा की बंधक नहीं है।

भारत की विदेश नीति का नया स्वरूप दर्शाता है कि देश का वर्तमान उदय किसी अन्य राष्ट्र के पतन पर नहीं, बल्कि समूची मानवता के कल्याण, सह-अस्तित्व और सर्वसमावेशी विकास पर आधारित है। तटस्थता और संकोच के खोल से बाहर निकलकर जी-20 और ब्रिक्स की कूटनीतिक सफलताओं तक का यह सफर एक नए भारत का उद्घोष है। अपनी व्यापक रणनीतिक सफलताओं, रिकॉर्ड-तोड़ आर्थिक एवं रक्षा निर्यात और निर्भीक फैसलों के बल पर आज का भारत विश्व राजनीति के बीच खड़ा एक सशक्त राष्ट्र है। वह वैश्विक एजेंडा निर्धारित करने वाली अग्रिम पंक्ति का एक अत्यंत सशक्त, स्वाभिमानी, एकजुट और गौरवशाली 'विश्वमित्र' बन चुका है, जिसके नेतृत्व, सामथ्र्य और कूटनीतिककौशल को आज पूरी दुनिया सम्मान की दृष्टि से देख रही है।

(राज्यसभा सांसद)