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स्वागत..! स्वस्थ सियासी पहल का…

छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक उदाहरण देखने को मिला, जब पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा एक सार्वजनिक फोरम में चर्चा के लिए हुए आमने-सामने
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रायपुर

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Anupam Rajiv Rajvaidya

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Govind Thakre

Sep 15, 2026

Chhattisgarh

‘दुश्मनी जमकर करो, पर ये गुंजाइश रहे कि जब हम मिलें तो शर्मिंदा न हों।’ कुछ इसी अंदाज में छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक उदाहरण देखने को मिला, जब प्रधानमंत्री आवास के मुद्दे पर पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा एक सार्वजनिक फोरम में चर्चा के लिए आमने-सामने हुए। यह बहुत अच्छी पहल मानी जाएगी, लोकतंत्र में स्वस्थ परंपरा के पालन की दृष्टि को और मजबूत करने की दिशा में। अक्सर ऐसा अमरीका जैसे कुछ बड़े लोकतांत्रिक देशों में ही देखने को मिलता है। निश्चित ही इससे किसी मुद्दे पर जनता को राय बनाने में मदद मिलती है।

कड़वाहट भूलकर दोनों का एक मंच पर आना सुखद रहा। आरोप-प्रत्यारोप के बीच अपने-अपने तथ्यों पर टिके रहकर बात करना भी अच्छा रहा। प्रधानमंत्री आवास के विषय पर इस चर्चा से समाधान हुआ या नहीं? कौन सही और कौन गलत?आंकड़ों की बाजीगरी में कौन भारी...? तमाम बातें शायद एक दम स्पष्ट हों, नहीं हों, लेकिन इस चर्चा में सबसे अच्छा यह हुआ कि दोनों पार्टियों के वरिष्ठ नेताओं ने एक-दूसरे को नीचा दिखाए बगैर दृढ़ता से बात रखी। सियासी मर्यादा को बनाए रखते हुए अपने-अपने तर्क और तथ्य प्रस्तुत किए।

इसमें एक और अच्छी और स्वस्थ बात देखने को मिली। आमतौर पर आज के दौर में पार्टी प्रवक्ताओं की बहस हो-हल्ले में तब्दील हो जाती है, लेकिन इसमें राजनीतिक परिपक्वता के साथ चर्चा को गंभीर स्वरूप दिया गया और बीच में टोका-टाकी के बिना एक-दूसरे को सुनने का धैर्य दिखाया गया। कड़वाहट की राजनीति के दौर में फिलहाल ऐसा उदाहरण किसी अन्य राज्य में दिखाई नहीं दिया है। निश्चित ही यह राजनीतिक सोच को नेक्स्ट लेवल पर ले जाने वाली चर्चा साबित होगी।

एक और सराहने वाला पहलू यह भी रहा कि खबरों के माध्यम से मुद्दे पर संज्ञान लिया और एक मंच पर आने का दोनों ने इरादा जाहिर किया। दोनों ही स्वाभाविक तौर पर तैयारी के साथ पहुंचे थे। किसी औपचारिकता की प्रतीक्षा किए बिना यह आमने-सामने आना स्वागत योग्य है।

जाहिर है, सत्ता और विपक्ष दोनों जनता के हितों के लिए काम करते हैं या आवाज उठाते हैं। लक्ष्य भी यही होना चाहिए। यह परंपरा जनहित में जरूरी है और इसे आगामी चुनाव के दौर में मुद्दों पर आमने-सामने बातें रखने का सशक्त माध्यम बनाना चाहिए। यही जन आकांक्षाओं के प्रति सच्ची राजनीतिक भावना होगी। ताकि लोकतांत्रिक व्यवस्था को लगातार मजबूत बनाने और जनता के मुद्दों को समाधान की ओर ले जाने में मदद हो सके।

- गोविंद ठाकरे govind.thakre@in.patrika.com