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संपादकीय: तकनीक के इस्तेमाल में मानवता की भी हो चिंता

दुनिया के अनेक देश एआइ कंपनियों पर अघोषित नियंत्रण को लेकर भी काम कर रहे हैं। सरकारें एआइ पर बाध्यकारी कानून लाने से यह कहकर बचना चाहती हैं कि कंपनियां खुद अपनी लक्ष्मण रेखा तय करें।
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जयपुर

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Opinion Desk

Sep 15, 2026

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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) आज दुनिया का सबसे चर्चित विषय बना हुआ है। इसलिए नहीं कि आने वाले दौर में मानव जीवन को पूरी तरह बदल देगा, बल्कि इस बहस के लिए कि इसके फायदे ज्यादा हैं अथवा नुकसान। यों तो हर तकनीक अपने साथ कुछ नया लेकर आती है और उस पर बहस भी अपने तरीके से चलती है। दुनिया में जब कम्प्यूटर आया तो उसके पक्ष और विपक्ष में तर्क रखने वालों की संख्या कम नहीं थी। अब, एआइ के पक्ष और विपक्ष में बोलने वालों की तादाद बढ़ती नजर आ रही है। अमरीकी राष्ट्रपति एआइ पर लगाम के पक्ष में तो नहीं है लेकिन उनकी चिंता इस क्षेत्र में चीन से आगे रहने की जरूर है। आइआइएससी बैंगलोर के सहायक प्रोफेसर डॉ. प्रतोश एपी की स्पष्ट मान्यता है कि एआइ से तरक्की तो होगी लेकिन सवाल यह कि इससे खुश कौन रहेगा।

दुनिया की बड़ी पांच एआइ कंपनियों में शुमार एंथ्रोपिक के सीईओ डारियो एमोदेई ने एआइ विकास की रफ्तार पर लगाम लगाने का समर्थन किया है। एमोदेई की सलाह का समर्थन एक्स एआइ कंपनी के मालिक एलन मस्क और ओपन एआइ के ऑल्टमैन ने भी किया है। मतलब साफ है कि दुनिया के शीर्ष उद्योगपति एआइ के पक्ष में तो हैं लेकिन उसकी रफ्तार को एक सीमा में बांधे रखना चाहते हैं। एआइ के फायदे-नुकसान की कशमकश में आम आदमी अब भी उधेड़बुन में है कि आखिर एआइ का भविष्य क्या होगा। उसकी चिंता इस बात को लेकर अधिक है कि एक तरफ उसकी रफ्तार कम रखने की बात करने वाले लोग भी उसके विकास पर अंधाधुंध खर्च कर रहे हैं। वर्ष 2024 में फिजिक्स का नोबेल पुरस्कार जीतने वाले जेफ्री हिंटन भी एआइ से मानवता के खत्म होने की आशंका जता चुके हैं। देखा जाए तो एआइ को लेकर भ्रम फैलाने के काम में वे कंपनियां आगे हैं, जो इस क्षेत्र में अपना वर्चस्व कायम करना चाहती हैं। ओपन एआइ, एंथ्रोपिक, माइक्रोसॉफ्ट और गूगल जैसी बड़ी कंपनियां उसकी सुरक्षा पर तो बात करती हैं लेकिन उसकी असली चिंता ये भी है कि उन्होंने अगर सुरक्षा पर अधिक ध्यान दिया तो कहीं एआइ की दौड़ में पिछड़ न जाएं। दुनिया के अनेक देश एआइ कंपनियों पर अघोषित नियंत्रण को लेकर भी काम कर रहे हैं। सरकारें एआइ पर बाध्यकारी कानून लाने से यह कहकर बचना चाहती हैं कि कंपनियां खुद अपनी लक्ष्मण रेखा तय करें। अभी इस चिंता का जवाब भी मिलना बाकी है कि क्या एआइ आने वाले दौर में उस इंसान से आगे निकल जाएगा जिसने उसे बनाया है।
चिंता इस बात की भी है कि क्या एक दिन एआइ इंसानों पर भी नियंत्रण हासिल कर लेगा। यही, चिंता एआइ की रफ्तार धीमी रखने पर जोर दे रही है। नई दुनिया बनाने के चक्कर में दुनिया का चक्र डांवाडोल न हो जाए। नई तकनीक का स्वागत है लेकिन आगे निकलने की होड़ में मानवता को नुकसान न पहुंचे, इसका ध्यान सभी को रखना होगा।