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संपादकीय: ‘जमीन’ की मजबूती भी हो आसमान में सुरक्षा के लिए

नए हवाई अड्डे बन रहे हैं। नए मार्ग खुल रहे हैं। देश को अंतरराष्ट्रीय विमानन केंद्र बनाने की महत्वाकांक्षा भी है। जाहिर है, व्यवस्था जितनी बड़ी होगी, उसमें चूक की आशंका भी उतनी ही बढ़ेगी। ऐसे में केवल विमानों और हवाई अड्डों की संख्या बढ़ाना ही काफी नहीं है।
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जयपुर

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Anil Karma

Sep 16, 2026

immigration

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दिल्ली एयरपोर्ट से तीन विदेशी नागरिकों के बिना अनिवार्य इमिग्रेशन जांच के म्यूनिख पहुंच जाना सिर्फ एक चूक ही नहीं, बल्कि हमारी विमानन व्यवस्था पर गंभीर सवाल भी है। गत 4 सितंबर को अमृतसर से दिल्ली पहुंचे इन तीनोंं यात्रियों की अनिवार्य इमिग्रेशन प्रक्रिया पूरी नहीं हुई और इन्होंने यहां से म्यूनिख की उड़ान पकड़ ली। मामले की गंभीरता को देखते हुए नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने एयर इंडिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी से जवाब मांगा है। सवाल यह नहीं है कि यह चूक हुई क्यों? बड़ा सवाल यह है कि जब एक जरूरी प्रक्रिया छूट गई, तो उसे पकडऩे वाली अगली व्यवस्था कहां थी? विमानन सेवाओं से जुड़े नियम महज कागज पर लिखी इबारतें ही नहीं होते। दरअसल ये सुरक्षा की ऐसी परत का काम करते हैं, जिनमें एक परत की कमजोरी को संभालने के लिए आगे की परत को तैयार रहना ही चाहिए।
हाल के महीनों में विमानन क्षेत्र से सामने आई दूसरी घटनाएं भी इसी चिंता को अलग-अलग रूप में सामने लाती हैं। अगस्त में फुकेट से दिल्ली आ रही उड़ान में तीनों हाइड्रोलिक तंत्र कुछ समय के लिए काम नहीं कर पाए। 24 यात्री और चालक दल के सदस्य घायल हुए। मामले की जांच जारी है। संसद में सरकार ने यह भी बताया कि 2023 से जून 2026 तक विमान सेवाओं से जुड़े 2400 से अधिक महत्वपूर्ण तकनीकी दोष दर्ज हुए हैं। जनवरी 2024 से जून 2026 के बीच सुरक्षा उल्लंघनों को लेकर 382 कारण बताओ नोटिस भी जारी किए गए। जाहिर है, सवाल किसी एक एयरलाइन तक सीमित नहीं है।

इन आंकड़ों को उस पूरी व्यवस्था की तस्वीर की तरह देखना चाहिए, जिसमें विमान का रखरखाव, चालक दल का प्रशिक्षण, हवाई अड्डे की प्रक्रियाएं, यात्री प्रबंधन और नियामकीय निगरानी सब एक-दूसरे से जुड़े हैं। आसमान में उड़ान केवल विमान से नहीं, प्रक्रियाओं पर भरोसे से होती है। इसलिए हवाई यात्रा में 'सब चलता है' का भाव तो कतई नहीं चल सकता। भारत में हवाई यात्रियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। नए हवाई अड्डे बन रहे हैं। नए मार्ग खुल रहे हैं। देश को अंतरराष्ट्रीय विमानन केंद्र बनाने की महत्वाकांक्षा भी है। जाहिर है, व्यवस्था जितनी बड़ी होगी, उसमें चूक की आशंका भी उतनी ही बढ़ेगी। ऐसे में केवल विमानों और हवाई अड्डों की संख्या बढ़ाना ही काफी नहीं है। इनकी सुरक्षा व्यवस्था भी मजबूत करनी होगी। लापरवाही के मामले सामने आने पर एकाध कार्मिकों की जिम्मेदारी तय कर मामले को रफा-दफा करना उचित नहीं है। विमान सेवाओं में प्रत्येक प्रक्रिया का पालन, तकनीकी जांच, प्रशिक्षण और निगरानी को गंभीरता से लेना होगा।जरूरत ऐसी संस्कृति की है, जिसमें नियम निरीक्षण के डर से नहीं, सुरक्षा की समझ से माने जाएं। एयरलाइन हो, हवाई अड्डा हो या नियामक, जिम्मेदारी अलग-अलग हो सकती है, लेकिन यात्री का भरोसा साझा है। इसलिए विमान यात्रा को सुरक्षित रखने वाली 'जमीन' मजबूत करनी होगी।