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मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व वाली राजस्थान की भारतीय जनता पार्टी की सरकार को बधाई! प्रदेश के 40.83 प्रतिशत वार्डों में जीत हासिल कर उसने एक परीक्षा पास कर ली। स्थानीय निकाय चुनावों में जीत हासिल कर भाजपा जश्न के माहौल में डूबी हुई है। दूसरी ओर, राजनीतिक विश्लेषक कह रहे हैं कि चुनाव परिणामों को भाजपा के लिए संतोषजनक ही माना जा सकता है, क्योंकि शहरी क्षेत्रों में वैसे भी भाजपा का अच्छा प्रभाव रहता आया है। असली परीक्षा पंचायत चुनाव में होगी। पार्टी के ही कुछ लोग भाजपा के ही शासन में 2014-2015 में हुए चुनाव के नतीजों से तुलना कर रहे हैं, जब भाजपा ने कांग्रेस के मुकाबले 16 प्रतिशत ज्यादा सीटें जीती थीं। इस बार यह अंतर लगभग पांच प्रतिशत है।
जो भी हो, जीत तो जीत है। कांग्रेस को भी लगभग भाजपा के बराबर वोट हासिल करने पर ज्यादा प्रसन्न होने की आवश्यकता नहीं है। उसके सामने अवसर था। मुद्दों को सही प्रकार जनता के सामने उठाती तो, हो सकता क्या कुछ और सीटें निकाल लेती। पर पार्टी ने अपने प्रत्याशियों को बेसहारा छोड़ दिया। चुनाव अभियान में अशोक गहलोत, सचिन पायलट जैसे बड़े नेता नजर ही नहीं आए। उधर, मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा एक के बाद एक रोड शो और रैलियां किए जा रहे थे। कांग्रेस में प्रदेशाध्यक्ष गोविंदसिंह डोटासरा और प्रतिपक्ष के नेता टीकाराम जूली अपने-अपने क्षेत्रों में ही सीमित रहे।
राजस्थान के 2443 वार्ड ऐसे है, जहां मतदाताओं ने भाजपा या कांग्रेस की बजाय निर्दलीयों व अन्य दलों के प्रत्याशियों पर विश्वास प्रकट करना ज्यादा ठीक समझा। दोनों दलों को इस स्थिति का विश्लेषण करना चाहिए। स्थानीय निकाय ऐसे चुनाव ऐसे होते हैं, जब छोटी-छोटी स्थानीय समस्याओं को लेकर मतदाता वोट देने का मानस बनाता है। क्या इन दलों ने इन ऐसी समस्याओं को दूर करने की ईमानदार कोशिश की? चाहे स्थानीय निकाय हों या पंचायती राज संस्थाएं, दोनों ही दलों की रुचि इनको पंगु बनाए रखने में ज्यादा रही। जिन अधिकारों और शक्तियों की ये संस्थाएं हकदार हैं, वे इन्हें दी ही नहीं जातीं। न ये संस्थाएं अपने लिए राजस्व उगाह सकती है, न शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन जैसी सुविधाओं के लिए कोई बड़ा काम कर सकती हैं। विधायिका इन्हें कभी अधिकार देना ही नहीं चाहती। यहां तक कि कर्मचारियों के वेतन और बजट के लिए भी इन्हें राज्य सरकार के सामने कटोरा फैलाना पड़ता है। यानी संस्थाएं और जनप्रतिनिधि तो जनता के निकट हैं, लेकिन जनता के लिए कुछ कर नहीं पाते। रही-सही कसर सरकारें प्रशासनिक सेवाओं के अधिकारियों की इन संस्थाओं में नियुक्ति कर के पूरी कर देती है। इनका जनता से कोई सीधा जुड़ाव नहीं होता। बस बजट को ठिकाने लगाना आता है।
स्थानीय निकाय चुनाव में कई युवा प्रत्याशी मैदान में उतरे। पार्टियों ने टिकट नहीं दिए तो निर्दलीय होकर चुनाव लड़ा और जीते। यह राजनीतिक दलों के लिए सबक है कि उन्हें राजनीति में युवाओं को आगे लाना चाहिए। इन चुनावों में जात-बिरादरी भी उतना असर नहीं डालती, जितना विधानसभा और लोकसभा चुनावों में डालती है। इससे भी राजनीतिक दलों को सबक लेना चाहिए।
अभी महापोरों, अध्यक्षों और सभापतियों के चुनाव होने हैं। बाड़ेबंदियां तो कई दिनों से चल रही है। अब प्रलोभनों का दौर शुरू होगा। जन प्रतिनिधियों के ईमान खरीदे जाएंगे। जनता को ईमान बेचने वाले प्रतिनिधियों पर नजर रखनी है। जो आरंभ में ही अपने मतदाताओं से विश्वासघात करता है, वह आने वाले कार्यकाल में तो क्या नहीं करेगा! देखा जाए तो वार्ड प्रतिनिधियों की परीक्षा अब शुरू होगी।
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Updated on:
16 Sept 2026 10:31 am
Published on:
16 Sept 2026 10:28 am
