
प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों की सुरक्षा एवं तनाव मुक्त माहौल प्रदान करने के लिए राज्य सरकार द्वारा राजस्थान कोचिंग सेंटर (नियंत्रण और विनियमन) विधेयक, 2025 पेश किया था। केंद्र एवं और राज्यों की सरकारें भी इस दिशा में काम कर रही हैं। सरकार के प्रयास ऐसे समय में हो रहे हैं, जब प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों की आत्महत्या की बढ़ती संख्या के कारण यह चिंता का विषय बनता जा रहा है।एक तरफ जहां प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए स्कूली शिक्षा से अलग कोचिंग संस्थानोंं का चलन बढता जा रहा है वहीं ऐसे माहौल में कोचिंग संस्थानों को युवाओं की मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के लिए कठघरे में खड़ा किया जा रहा है। पर क्या समस्या का सिर्फ यही पहलू है, जो हमें दिख रहा है या इससे इतर भी कोई बात है? यह सरकारों एवं सामाजिक संस्थाओं को सोचने की महती आवश्यकता है।
मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश के लिए देशभर में नीट यूजी 2026 परीक्षा में लगभग 23 लाख विद्यार्थी अपने सपनों को पूरा करने के लिए शामिल हुए। वे बच्चे जो इस परीक्षा में चयनित हुए उनकी संख्या का हिस्सा उन बच्चों की संख्या की तुलना में नगण्य है, जो किसी कारणवश चयन सूची से बाहर हुए या लोगों के अनुसार विफल हुए।विफल होना और विफल महसूस करना, दोनों अलग अलग परिस्थितियां हैं। असल में कोई एक परीक्षा जिंदगी की दिशा और दशा तय नहीं कर सकती है। वे बच्चे जो इस परीक्षा में विफल रहे वे न जाने किस क्षेत्र में अद्भुत करेंगे, बस उनको उनकी प्रतिभा के अनुसार मौका मिले। ऐसे में जब विद्यार्थी वर्ग के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की प्रतिस्पर्धा बहुत चुनौतीपूर्ण होती जा रही है। किसी भी प्रतियोगी परीक्षा के लिए विद्यार्थियों की बढ़ती संख्या हर परीक्षा को और मुश्किल बनाती जा रही है।
विद्यार्थियों की प्रतिभा एवं सफलता को सिर्फ अंकों से मापने का जो दौर चल रहा है वह इस स्थिति को और भी विकट बना रहा है। प्रतियोगी परीक्षाओं का परिणाम बच्चों की मेहनत एवं उसके आकलन की ऐसी दौड़ है, जिसमें अभिभावक अपने सपनों को सच होते देखना चाहते हैं। अंको के इस खेल में अपने आप को आगे रखने की इस दौड़ में कुछ बच्चे भावनात्मक चोटिल भी हो रहे हैं। चोटिल होना उतना पीड़ादायक नहीं है जितना उस चोट की अनदेखी करना। ये परिस्थितियां बच्चों में बढती मानसिक स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं की तरफ इशारा कर रही हैं।
‘अच्छे हैप्पीनेस इंडेक्स’ वाले देशों में, अपने बच्चों के कॅरियर के चुनाव में माता-पिता की भूमिका आम तौर पर निर्णय को थोपने या नियंत्रित करने के बजाय समर्थन और मार्गदर्शन की होती है। माता-पिता अपने बच्चे की व्यक्तिगत रुचियों, कौशल और शौक को प्राथमिकता देते हैं, उन्हें अलग-अलग विकल्पों का पता लगाने और ऐसे विकल्प चुनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, जो व्यक्तिगत संतुष्टि और खुशी की ओर ले जाते हैं।
जबकि भारतीय पैरेंट्स बच्चों की रुचि से अलग पड़ोसी एवं रिश्तेदारों के बच्चों से तुलना करके या कुछेक कॅरियर विकल्प अपनाने का दबाव बनाते है। इच्छा विपरीत थोपे गये विकल्प निराशा की भावना पैदा करते हैं।एनसीआरबी के अनुसार, 2024 में देश में लगभग 14488 छात्रों की आत्महत्या से मृत्यु हो गई। महाराष्ट्र में सबसे अधिक आत्महत्याएं दर्ज की गईं। राजस्थान में भी ये आंकड़े लगातार बढ रहे हैं। राज्य सरकार की तरफ से ऐसे मामलों को लेकर कोचिंग संचालकों, अभिभावकों, प्रशासन एवं पुलिस अधिकारियों के साथ बैठकें की जा रही हैं। बच्चों में आत्महत्या के बढते मामलों में हम सिर्फ कोचिंग संस्थानों पर दोषारोपण करके स्थितियों को नियंत्रित नहीं कर सकते। वास्तव में इन चीजों को ठीक करने के लिए मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के बारे में नजरिए को बदलने की जरूरत है।
मैंने परामर्श सेवाओं के दौरान ऐसे काफी बच्चे देखें है, जो मानसिक स्वास्थ्य समस्या का सामना तो कर ही रहे होते हैं पर इस बात को लेकर भी परेशान हो रहे होते हैं कि यह समस्या घरवालों को पता ना लगे वरना वो इसे मेरी व्यक्तिगत कमजोरी या पढ़ाई लिखाई ना करने की मेरी नियत की तरह देखेंगे।मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा एक आम भ्रम है कि छोटी उम्र में मानसिक समस्या नहीं हो सकती है, जबकि यह एक गलत धारणा है।दरअसल, मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं किसी को भी, किसी भी उम्र में हो सकती हैं। हालांकि बच्चों में मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं बड़ों की तुलना में कम होती हैं।विद्यार्थी वर्ग में बढ़ती ऑनलाइन मोबाइल गेमिंग की लत, आक्रामकता, नशे की प्रवृत्ति एवं इनसे संबधित बाल अपराधों के बढ़ते आंकड़े स्थिति की गंभीरता की तरफ इशारा कर रहे हैं। ओटीटी पर परोसी जाने वाली हिंसक सामग्री एवं गाली गलौज का अत्यधिक प्रभाव विकसित होते बालमन पर बहुत नकारात्मक होता है। सोशल मीडिया पर दूसरों से तुलना करने की प्रवृत्ति बढ़ती है जिससे कमतरी की भावनाएं पैदा होती हैं इससे असंतोष और चिड़चिड़ापन बढ़ता है। साइबर बुलिंग से भी मानसिक स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं एवं विश्व स्वास्थ्य संगठन के तुलनात्मक अध्ययनों के अनुसार भारत में छात्र पहले की तुलना में अधिक तनावग्रस्त हैं। बच्चों में मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ रही हैं।
आइसीएमआर की एक रिपोर्ट के अनुसार 4 से 16 वर्ष की आयु के बीच 12 से 14 प्रतिशत भारतीय छात्र मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से पीडि़त हैं। और अब ये आंकड़े और बढ रहे हैं। इंडियन साइकियाट्रिक सोसायटी के एक अध्ययन एवं मानव संसाधन मंत्रालय के बताये आंकड़ों के अनुसार, इन सालों में देश में मानसिक रोगों से पीडि़त मरीजों की संख्या 15 से 20 फीसदी तक बढ़ गई है। विद्यार्थी वर्ग भी इससे अछूता नहीं है। कोचिंग करने वाले बच्चों को मानसिक रूप से स्वस्थ रखने में स्कूल मेंटल हैल्थ (एसएमएच) जैसे कार्यक्रम उपयोगी साबित हो सकते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डबल्यू एच ओ) ने एसएमएच को स्कूलों में आवश्यक रूप से लागू करने की सिफारिश की है। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएससी) ने बच्चों में तनाव को कम करने और स्कूलों में कार्यक्रमों के माध्यम से सकारात्मक रवैया अपनाने पर जोर दिया है। पर अब भी इस दिशा में किए गए प्रयास काफी कम हैं।
सीबीएससी का सुझाव है कि सभी माध्यमिक और वरिष्ठ माध्यमिक स्कूलों में एक काउंसलर नियुक्त करना चाहिए, जिससे छात्रों का आत्मविश्वास, विपरीत परिस्थितियों या दबावों को झेलने की क्षमता और सीखने की क्षमता को बेहतर किया जा सके। विद्यार्थियों को मानसिक तौर पर स्वस्थ रखना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यह संख्या देश की हेल्थ इकोनॉमी की सूचक है। इससे न केवल परिवार एवं समाज पर बल्कि पूरे देश के विकास पर असर पड़ता है। इसीलिए बढ़ती किशोर मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं एसएमएच कार्यक्रमों की आवश्यकता को बताती हैं। विद्यार्थी वर्ग के बेहतर मानसिक स्वास्थ्य के लिए अब कुछ नीतियां बनाकर काम करने की आवश्यकता है। हमें अभिभावकों एवं बच्चों को यह भरोसा दिलाने की जरूरत है कि मेडिकल, इंजीनियरिंग एवं प्रशासनिक सेवाओं के अलावा भी कई विकल्प हैं, जहां सफलता की ऊंचाइयों को छुआ जा सकता है।
हमें बच्चों को बताना है कि अगर दसवीं की अंकतालिका भविष्य निर्धारक होती तो भारत को विश्व क्रिकेट की अंकतालिका में श्रेष्ठ स्थान पर पहुंचाने वाले सचिन तेंदुलकर या विराट कोहली कभी ना मिलते। अभिभावकों को यह समझना जरूरी है कि अगर आपका बच्चा ज्यादा नंबर लाता है तो बहुत अच्छी बात है लेकिन अगर वह ज्यादा नंबर नहीं ला सका तो तो आप बच्चे से उसका आत्मविश्वास और उसका स्वाभिमान न छीन लें।अगर वह अच्छे नंबर न ला सके तो आप उन्हें हौसला दीजिएगा की कोई बात नहीं यह एक छोटा-सा इम्तिहान है। वह तो जिंदगी में इससे भी कुछ बड़ा करने के लिए बनाए गए हैं। अगर वह कम अंक लाते हैं तो आप उन्हें बता दें कि आप फिर भी इनसे प्यार करते हैं और आप उन्हें उन के कम अंकों की वजह से जज नहीं करेंगे। ईश्वर के लिए ऐसा ही कीजिएगा और जब आप ऐसा करेंगे फिर देखिएगा कि आपका बच्चा भी दुनिया जीत लेगा।दुनियाभर में सभी स्वास्थ्य सेवाओं में केवल एक प्रतिशत हेल्थ वर्कर्स ही मानसिक स्वास्थ्य के उपचार देने संबंधी व्यवस्थाओं से जुड़े हैं। भारत में इसका आंकड़ा और भी कम है। ऐसे में सरकारों को बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ बनाने के प्रयासों को प्राथमिकता से लेने की महती आवश्यकता है। हालांकि धीरे-धीरे लोग समझ रहे हैं कि मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल कितनी महत्वपूर्ण है और इसके लिए कितने संसाधनों की आवश्यकता है।