
राजस्थान निकाय चुनाव। फोटो: पत्रिका
राजस्थान के शहरों की सियासी बिसात बिछ चुकी है। मोहरे अपनी-अपनी जगह डटे हुए हैं, खिलाड़ी आखिरी चालों पर हैं और अब बस घड़ी टिक-टिक दौड़ रही है। बुधवार को पहले चरण का मतदान पहली शह देगा, लेकिन बाजी शुक्रवार के दूसरे चरण तक खुली रहेगी। दो दिनों में होने वाला यह मतदान सिर्फ पार्षदों का चुनाव नहीं है। यह भाजपा-कांग्रेस की स्थानीय पकड़, क्षत्रपों की साख और बागियों की ताकत का भी इम्तिहान है।
पहले चरण में बीकानेर, भरतपुर, भीलवाड़ा और अलवर नगर निगम समेत 162 निकायों में मतदान है। भाजपा ने पूरी ताकत के साथ किलेबंदी की है। मुख्यमंत्री से लेकर पार्टी के तमाम क्षत्रप मैदान में उतर चुके हैं। लक्ष्य साफ है। राज्य की सत्ता के बाद शहरों की सत्ता पर भी कमल खिलाना। लेकिन शतरंज में सबसे खतरनाक मोहरा हमेशा सामने वाला नहीं होता। कई जगह भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए अपने ही घर के घोड़े बागी बन गए हैं। वे किस खाने में पहुंचेंगे, कोई नहीं जानता।
कांग्रेस ने सीधी टक्कर के बजाय कई जगह गुरिल्ला चाल चली है। वार्ड-दर-वार्ड समीकरण साधे जा रहे हैं। जहां भाजपा का असंतुष्ट कार्यकर्ता मैदान में है, वहां कांग्रेस को सेंध का रास्ता दिख रहा है और जहां कांग्रेस का बागी खड़ा है, भाजपा उसी दरार को और चौड़ा करने में जुटी है। तीसरा मोर्चा भी अपनी अलग बिसात लेकर बैठा है। भले उसकी बाजी निगम के बोर्ड तक पहुंचे या न पहुंचे, लेकिन कई वार्डों में वह वोटों का समीकरण जरूर उलट सकता है।
चार नगर निगमों की तस्वीर इस सियासी शतरंज की अलग-अलग चाल दिखाती है। बीकानेर में मुकाबला बाड़ाबंदी तक जा सकता है तो भरतपुर-डीग अंचल में पिछले चुनाव में कांग्रेस की सेंध भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का सवाल है। भीलवाड़ा में भाजपा का पूरा कुनबा और कांग्रेस की अधूरी मौजूदगी के बीच निर्दलीयों की बड़ी फौज कई खाने आगे-पीछे कर रही है। अलवर में भी बागी और निर्दलीय दोनों प्रमुख दलों की चाल के बीच खड़े हैं।
हालांकि इस चुनावी बिसात के मुद्दों में कोई रहस्य नहीं है। सड़क, पानी, सीवरेज, सफाई, जलभराव, अतिक्रमण और स्ट्रीट लाइट जैसे सवाल सीधे जनता के सामने हैं। दल अपनी-अपनी उपलब्धियों के मोहरे आगे कर रहे हैं, विपक्ष कमियों को उजागर करने की राह पर है, मगर मतदाता इस बार खिलाड़ी की जुबान से ज्यादा पिछली चालों का हिसाब देख रहा है।
हर खिलाड़ी अपनी चाल को निर्णायक मानकर बैठा है, लेकिन बिसात पर कुछ मोहरे ऐसे हैं जिनकी अहमियत अभी तय नहीं हुई। बागी सिर्फ वोट काटेंगे या बाजी पलट देंगे, निर्दलीय सिर्फ संख्या बढ़ाएंगे या सत्ता का रास्ता खोलेंगे…यह गणित आखिरी वक्त तक उलझा रहेगा। फिलहाल दावे बहुत हैं, भरोसा कम। बाजी किसके हाथ जाएगी, यह अभी कोई नहीं जानता। इतना जरूर है कि आखिरी चाल तक शतरंज के दांव जारी रहेंगे।
Updated on:
09 Sept 2026 04:52 pm
Published on:
09 Sept 2026 04:52 pm
