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भारत के लिए रणनीतिक संतुलन साधने की चुनौती

भारत और चीन इस संगठन में सहयोग करते हैं, लेकिन हिमालयी सीमा सहित अनेक मुद्दों पर रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं। भारत अमरीका के साथ चतुष्कोणीय सुरक्षा संवाद का भी हिस्सा है। भारत और पाकिस्तान कश्मीर व आतंकवाद के सवाल पर आमने-सामने हैं।
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जयपुर

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Opinion Desk

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के.एस. तोमर

Sep 08, 2026

bishek

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(वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक)

शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के बिश्केक शिखर सम्मेलन में जारी घोषणा भारत के लिए केवल इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि इसमें आतंकवाद की निंदा और पहलगाम आतंकी हमले का विशेष उल्लेख हुआ। इसका वास्तविक महत्व उस जटिल भू-राजनीतिक परिस्थिति में है, जिसमें भारत को अपनी विदेश नीति का संतुलन साधना पड़ रहा है। एससीओ के 25वें स्थापना वर्ष के सम्मेलन में भारत, चीन, रूस, ईरान और पाकिस्तान ऐसे समय एक मंच पर आए, जब पश्चिम एशिया युद्ध की आग में है, यूक्रेन संघर्ष जारी है और विश्व व्यवस्था तेजी से ध्रुवीकृत हो रही है। घोषणा में ईरान की संप्रभुता का समर्थन और एकतरफा प्रतिबंधों का विरोध किया गया, लेकिन यूक्रेन में रूस की कार्रवाई की सीधी निंदा नहीं हुई। भारत के लिए यही अवसर भी है व चुनौती भी।

भारत के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि आतंकवाद के सवाल पर घोषणा की भाषा है। एससीओ नेताओं ने आतंकवाद के सभी रूपों की निंदा करते हुए उसके वित्तपोषण, भर्ती, कट्टरपंथ और आतंकियों को सुरक्षित ठिकाने उपलब्ध कराने के खिलाफ कार्रवाई की जरूरत बताई। इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि घोषणा में पहलगाम आतंकी हमले का स्पष्ट उल्लेख करते हुए पीडि़तों के प्रति संवेदना व्यक्त की गई और जिम्मेदार लोगों को न्याय के कठघरे में लाने की बात कही गई। इससे भारत को अपनी उस दलील को मजबूती से रखने का अवसर मिला कि आतंकवाद को राजनीतिक सुविधा के अनुसार 'अच्छा' और 'बुरा' नहीं माना जा सकता। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा कि आतंकवाद मानवता के सामने गंभीर चुनौती है और आतंकवाद को राज्य नीति के औजार के रूप में इस्तेमाल करने वाले देशों को इसे रणनीतिक हथियार की तरह उपयोग करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने स्वयं को आतंकवाद पीडि़त देश के रूप में प्रस्तुत किया, लेकिन भारत सीमापार आतंकवाद को एससीओ के सुरक्षा एजेंडे के केंद्र में रखने में सफल रहा।

घोषणा में एक बड़ा विरोधाभास भी दिखाई देता है। एससीओ ने संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को मूल सिद्धांत बताते हुए ईरान के खिलाफ अमरीका और इजरायल की सैन्य कार्रवाई की निंदा की। एकतरफा प्रतिबंधों का विरोध किया गया तथा परमाणु अप्रसार संधि के तहत ईरान के शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के अधिकार का समर्थन किया गया। लेकिन इसी घोषणा में यूक्रेन में रूस के आक्रमण की निंदा नहीं की गई। यह चयनात्मक रवैया बताता है कि एससीओ कोई एकजुट रणनीतिक गठबंधन नहीं, बल्कि अलग-अलग हितों वाले देशों का मंच है। भारत के लिए ईरान से जुड़ी भाषा विशेष रूप से संवेदनशील है। नई दिल्ली संप्रभुता के उल्लंघन और एकतरफा प्रतिबंधों का विरोध करती है, लेकिन अमरीका के साथ उसके रणनीतिक संबंध भी मजबूत हैं। इसलिए भारत को ऐसा रास्ता अपनाना होगा जिसमें वह संप्रभुता और शांतिपूर्ण परमाणु सहयोग जैसे सिद्धांतों का समर्थन करे, लेकिन किसी अमरीका-विरोधी धड़े का हिस्सा न बने। एससीओ को अमरीका-विरोधी गुट मानना सही नहीं होगा। भारत और चीन इस संगठन में सहयोग करते हैं, लेकिन हिमालयी सीमा सहित अनेक मुद्दों पर रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं। भारत अमरीका के साथ चतुष्कोणीय सुरक्षा संवाद का भी हिस्सा है। भारत और पाकिस्तान कश्मीर व आतंकवाद के सवाल पर आमने-सामने हैं। मध्य एशियाई देश रूस और चीन से संबंध बनाए रखते हुए यूरोप, तुर्किये और अमरीका के साथ भी अपने रिश्ते बढ़ा रहे हैं। तुर्किये स्वयं नाटो का सदस्य होते हुए यूरेशिया में अपनी भूमिका मजबूत कर रहा है। इसलिए एससीओ को पश्चिम-विरोधी गठबंधन के बजाय परस्पर प्रतिस्पर्धी हितों के बीच संवाद के मंच के रूप में देखना अधिक उचित होगा।

पीएम मोदी ने कहा कि पश्चिम एशिया का संघर्ष दिखाता है कि कोई भी क्षेत्रीय युद्ध अब केवल उसी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। तनाव का समाधान युद्धभूमि के बजाय संवाद और कूटनीति से होना चाहिए। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ मोदी की मुलाकात ने इस नीति को और स्पष्ट किया। मोदी का 'अनंत युद्धÓ से 'युद्ध की समाप्तिÓ की ओर बढऩे का संदेश रूस को यूक्रेन पर भारत की चिंता जताने का संयमित तरीका था। ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान के साथ बातचीत का महत्व अलग था। खाड़ी क्षेत्र की स्थिरता और समुद्री मार्गों की सुरक्षा भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। ईरान मध्य एशिया तक भारत की पहुंच के लिए भी अहम है, क्योंकि पाकिस्तान भारत को स्थलीय मार्ग उपलब्ध नहीं कराता। इसलिए ईरान भारत की दीर्घकालीन संपर्क और व्यापार नीति का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की संक्षिप्त बातचीत को हालांकि बढ़ा-चढ़ाकर नहीं देखा जाना चाहिए। इससे संवाद की संभावना जरूर बनी रहती है, लेकिन इसे कोई बड़ी द्विपक्षीय सफलता कहना जल्दबाजी होगी। बिश्केक घोषणा पर अमरीका की प्रतिक्रिया सतर्क होगी। ईरान के समर्थन, एकतरफा प्रतिबंधों के विरोध और कम पश्चिम-केंद्रित आर्थिक व्यवस्था की वकालत से वाशिंगटन को एससीओ में बदलते शक्ति-संतुलन का संकेत मिलेगा।

बिश्केक ने भारत की सबसे बड़ी ताकत और चुनौती- रणनीतिक स्वायत्तता—दोनों को सामने ला दिया है। भारत चीन-रूस-ईरान धड़े का हिस्सा नहीं बनना चाहता, पर अपनी विदेश नीति को वाशिंगटन के निर्देशों पर भी नहीं चलाना चाहता। पुतिन, पेजेश्कियान और शी के साथ समानांतर संवाद इसी नीति का प्रमाण है। इसलिए बिश्केक घोषणा का महत्व केवल उसके शब्दों में नहीं, बल्कि यूरेशिया की बदलती शक्ति-संरचना में है। भारत के लिए चुनौती साफ है- एससीओ उसके हितों को आगे बढ़ाने का मंच बने, न कि ऐसा भू-राजनीतिक खेमा जिसमें शामिल होने के लिए उस पर दबाव हो।