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पिछले कुछ दिनों से भारत के ताजा जीडीपी आंकड़ों को लेकर एक अनावश्यक विवाद खड़ा किया जा रहा है। 2011-12 सीरीज के तहत वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही का नॉमिनल जीडीपी पहले 86.05 लाख करोड़ रुपए बताया गया था। नई 2022-23 सीरीज में उसी तिमाही का अनुमान 80.00 लाख करोड़ रुपए है। सवाल उठाया गया कि 6.05 लाख करोड़ रुपए आखिर गए कहां? इसके बाद नई सीरीज में वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही के 88.27 लाख करोड़ रुपए की तुलना पुरानी सीरीज के 86.05 लाख करोड़ रुपए से करके नॉमिनल वृद्धि केवल 2.6 प्रतिशत बताई गई, जबकि सही नॉमिनल जीडीपी वृद्धि 10.3 प्रतिशत है। यह दावा सुनने में चौंकाने वाला जरूर है, पर सांख्यिकी और अर्थशास्त्र के सिद्धान्तों के अनुसार गलत है, क्योंकि इसमें दो अलग माप प्रणालियों को मिला दिया गया है। दो अलग पैमानों से निकले आंकड़ों को सीधे जोडक़र सही वृद्धि दर नहीं निकाली जा सकती।
यहां पहला वाजिब सवाल है कि क्या बेस ईयर को 2011-12 से बदलकर 2022-23 करने पर नॉमिनल जीडीपी बदल सकती है? उत्तर हां, लेकिन केवल इसलिए नहीं कि सांख्यिकीविदें ने कीमतों का एक सेट हटाकर दूसरा लगा दिया है। नॉमिनल जीडीपी यानी मौजूदा कीमतों पर जीडीपी में उत्पादन का मूल्य उसी तिमाही में चल रही कीमतों पर लगाया जाता है। बेस ईयर की कीमतें सीधे रियल जीडीपी में काम आती हैं, जहां कीमतों को स्थिर रखकर यह देखा जाता है कि वस्तुओं और सेवाओं के वास्तविक उत्पादन में कितना बदलाव आया।नई 2022-23 नेशनल अकाउंट्स सीरीज केवल कीमतों की नई सूची नहीं है। यह पूरी सांख्यिकीय प्रणाली का नवीनीकरण है। इसमें नए एंटरप्राइज सर्वे और जीएसटी डेटा, कंपनियों तथा सरकार के अधिक संपूर्ण खाते, बदली हुई वर्गीकरण प्रणाली, ज्यादा व्यापक कवरेज, नए इनपुट रेशियो, दोहरी गिनती हटाने के सुधार और तिमाहियों के बीच गतिविधि के बेहतर बंटवारे को शामिल किया गया है। असंगठित क्षेत्र के कुछ हिस्सों के लिए वार्षिक एएसयूएसई और पीएलएफएस डेटा का अधिक उपयोग किया गया है।
एक से अधिक गतिविधियां करने वाली कंपनियों के आकलन, निर्माण क्षेत्र के रेशियो और वित्तीय क्षेत्र की कवरेज को भी सुधारा गया है। इसके साथ नए आइआइपी, प्रोड्यूसर प्राइस और बैंकिंग सर्विसेज इंडेक्स जोड़े गए हैं। इन बदलावों से मौजूदा कीमतों पर भी वैल्यू एडेड का अनुमान बदल सकता है। आसान शब्दों में, वैल्यू एडेड वह मूल्य है, जो उत्पादन में इस्तेमाल हुई वस्तुओं और सेवाओं की लागत घटाने के बाद बचता है। इसलिए यह कहना गलत है कि नई बेस ईयर सीरीज आने पर नॉमिनल जीडीपी बदल ही नहीं सकता। केवल बेस ईयर की कीमत बदलने से मौजूदा कीमतों पर जीडीपी नहीं बदलता, लेकिन डेटा के स्रोत, कवरेज और गणना के तरीके बदलने से वह अवश्य बदल सकता है।
एक आसान उदाहरण से इसे समझें। मान लीजिए कि किसी पहली तिमाही का नॉमिनल जीडीपी पहले एक हजार करोड़ रुपए आंका गया। नए जीएसटी रिकॉर्ड और सर्वे से छोटे कारोबारों का वैल्यू एडेड 15 करोड़ रुपए कम निकला। पूरी कंपनी फाइलिंग मिलने पर 10 करोड़ और अंतिम सरकारी खातों के आधार पर 5 करोड़ रुपए और घटे। दूसरी ओर, व्यापक कवरेज से पहले दर्ज न हुई आर्थिक गतिविधि के 20 करोड़ रुपए जुड़ गए। दोहरी गिनती हटाने से 25 करोड़ रुपए घटे। नए इनपुट रेशियो से पता चला कि उत्पादन में बीच की वस्तुओं और सेवाओं का उपयोग पहले से 20 करोड़ रुपए अधिक था, इसलिए इतना ही वैल्यू एडेड घटा। बेहतर तिमाही बेंचमार्किंग से 15 करोड़ रुपए की गतिविधि बाद की तिमाहियों में चली गई। इस तरह नया अनुमान 930 करोड़ रुपए रह गया। यानी 70 करोड़ रुपए या सात प्रतिशत की कमी।
अर्थव्यवस्था से कुछ भी गायब नहीं हुआ। उसी तिमाही को अधिक संपूर्ण रिकॉर्ड, व्यापक कवरेज और बेहतर तरीके से फिर से मापा गया।
यह उदाहरण केवल प्रक्रिया समझाता है। यह भारत के वास्तविक 6.05 लाख करोड़ रुपए के संशोधन का मदवार ब्यौरा नहीं है। आधिकारिक क्रम स्पष्ट है। पुरानी सीरीज में अगस्त 2025 में वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही का नॉमिनल जीडीपी 86.05 लाख करोड़ रुपए आंका गया था। नई सीरीज ने फरवरी 2026 में इसे 80.32 लाख करोड़, जून 2026 में 80.44 लाख करोड़ और नवीनतम आइआइपी, प्रोड्यूसर प्राइस तथा प्रशासनिक डेटा जोडऩे के बाद अगस्त 2026 में 80.00 लाख करोड़ रुपए आंका। इस बदलाव का अधिकांश हिस्सा वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही के आंकड़े जारी होने से कई महीने पहले हो चुका था। ये अलग-अलग समय पर उपलब्ध बेहतर डेटा पर आधारित क्रमिक सांख्यिकीय अनुमान हैं, गायब हुई कोई रकम नहीं।
86.05 लाख करोड़ रुपए से 80.00 लाख करोड़ रुपए पर आने का अर्थ 7.03 प्रतिशत का नीचे की ओर संशोधन है। क्या इतना बड़ा बदलाव पहले कभी नहीं हुआ, या फिर यह मामूली और नियमित प्रक्रिया है? सही उत्तर इन दोनों के बीच है। यह सामान्य तिमाही संशोधन नहीं है, लेकिन जब भारत में व्यापक नई जीडीपी सीरीज लागू हुई हैं, तब इससे मिलते जुलते या इससे भी बड़े बदलाव पहले हो चुके हैं।
जब 1993-94 सीरीज ने 1980-81 सीरीज की जगह ली, तब 1993-94 के लिए फैक्टर कॉस्ट पर जीडीपी 7,32,874 करोड़ रुपए से बढक़र 7,99,077 करोड़ रुपए हो गया। यह 9.03 प्रतिशत की वृद्धि थी, जिसका बड़ा कारण निजी उपभोग की बेहतर कवरेज था। फैक्टर कॉस्ट की यह अवधारणा आज के बाजार मूल्य पर मुख्य जीडीपी आंकड़े से अलग है, लेकिन माप से जुड़ा सबक साफ है। जब 2004-05 सीरीज ने 1999-2000 सीरीज की जगह ली, तब वित्त वर्ष 2008-09 की पहली तिमाही का बाजार मूल्य पर नॉमिनल जीडीपी करीब 12.35 लाख करोड़ रुपए से बढक़र 13.33 लाख करोड़ रुपए हो गया।
यह 7.94 प्रतिशत का संशोधन था, जो आज के 7.03 प्रतिशत बदलाव के करीब है, हालांकि तब संशोधन ऊपर की ओर हुआ था। लेकिन संशोधन हमेशा जीडीपी को बढ़ाते नहीं हैं। 2011-12 सीरीज लागू होने के समय 2011-12 का नॉमिनल जीडीपी 90.10 लाख करोड़ रुपए से घटकर 87.36 लाख करोड़ रुपए रह गया था, यानी लगभग तीन प्रतिशत की कमी। नई सीरीज अनुमान को ऊपर या नीचे, किसी भी दिशा में ले जा सकती है। नतीजा उपलब्ध डेटा, कवरेज और गणना की पद्धति पर निर्भर करता है।
अब इस दावे को अर्थव्यवस्था की जमीनी तस्वीर से भी परखना चाहिए। क्या व्यापक अर्थव्यवस्था उस लगभग ठहराव जैसी दिखती है, जिसका संकेत 2.6 प्रतिशत की गलत गणना देती है? नहीं। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में सीमेंट उत्पादन 8.9 प्रतिशत बढ़ा। बुनियादी ढांचा और निर्माण वस्तुओं का आईआईपी 7.2 प्रतिशत, बिजली आईआईपी 9.3 प्रतिशत तथा कैपिटल गुड्स उत्पादन 15.2 प्रतिशत बढ़ा। कमर्शियल वाहनों की बिक्री 18.3 प्रतिशत, माल ढुलाई वाले वाहनों का रजिस्ट्रेशन 20.1 प्रतिशत, तैयार इस्पात की खपत 8.3 प्रतिशत और प्रमुख बंदरगाहों पर कार्गो 6.2 प्रतिशत बढ़ा। ये लगभग शून्य रियल ग्रोथ के संकेत नहीं हैं। इनमें से कई इंडिकेटर तिमाही जीडीपी की गणना में भी इस्तेमाल होते हैं, इसलिए इन्हें पूरी तरह स्वतंत्र प्रमाण नहीं कहा जा सकता। फिर भी समग्र तस्वीर ठहराव की नहीं, विस्तार की है।अंत में तीन बातों को अलग रखना जरूरी है- अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन, माप की गुणवत्ता और गणना का तर्क। रोजगार की गुणवत्ता, वेतन, निवेश और अलग अलग क्षेत्रों में असमान वृद्धि पर सवाल उठाना पूरी तरह उचित और आवश्यक है। लेकिन दो असंगत सीरीज को मिलाकर वृद्धि दर नहीं निकाली जा सकती। नवीनतम और समान सीरीज के अनुसार वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में नॉमिनल जीडीपी वृद्धि 10.3 प्रतिशत और रियल जीडीपी वृद्धि 7.8 प्रतिशत रही। 7.8 प्रतिशत की वृद्धि को ‘शून्य’ कहना न स्वस्थ संदेह है, न आर्थिक विश्लेषण। यह सीधी बौद्धिक बेईमानी है।
Updated on:
06 Sept 2026 05:41 pm
Published on:
06 Sept 2026 05:41 pm
