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संपादकीय: खेती में कीटनाशक नीति पर पुनर्विचार का समय

अत्यधिक विषैले व प्रतिबंधित श्रेणी के कीटनाशकों की बिक्री पर कड़ी निगरानी सुनिश्चित की जाए, क्योंकि भारत में आज भी कई ऐसे रसायन खुलेआम बिकते हैं जिन पर विकसित देशों में पहले ही प्रतिबंध लग चुका है।
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जयपुर

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Mukesh Kumar Bhushan

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Updated: 5 Sep 2026, 4:37 PM IST

pesticide

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भारत को अन्न के मामले में आत्मनिर्भर बनाने वाले किसान की सुरक्षा को लेकर सामने आए आंकड़े किसी भी संवेदनशील समाज को झकझोरने के लिए काफी हैं। पेस्टिसाइड एक्शन नेटवर्क के हालिया अध्ययन के अनुसार दुनिया भर में कीटनाशक विषाक्तता से होने वाली करीब 11 हजार मौतों में से 60 प्रतिशत भारत में होती हैं। अध्ययन बताता है कि दुनिया के करीब 93.4 करोड़ किसानों और कृषि श्रमिकों में से 43.3 करोड़ यानी लगभग 46 प्रतिशत हर साल किसी न किसी रूप में कीटनाशक के जहर का शिकार होते हैं। चिंता की बात यह भी है कि 2023 में विश्व भर में करीब 38 लाख टन कीटनाशकों का इस्तेमाल हुआ, जो 1990 की तुलना में लगभग दोगुना है। हरित क्रांति के बाद से उत्पादकता बढ़ाने की होड़ में हमने रासायनिक निर्भरता को लगातार बढ़ाया लेकिन इस्तेमाल करने वालों की सुरक्षा की उतनी ही अनदेखी की जाती रही।

भारत में यह संकट इसलिए और गंभीर हो जाता है क्योंकि यहां छोटे और सीमांत किसान, जिनकी संख्या देश में सबसे अधिक है, अक्सर बिना उचित प्रशिक्षण, बिना सुरक्षा उपकरणों और बिना किसी निगरानी के कीटनाशकों का छिड़काव करते हैं। दस्ताने, मास्क या सुरक्षा चश्मे जैसी बुनियादी सावधानियां तो दूर, कई बार किसानों को यह भी नहीं पता होता कि किस रसायन की कितनी मात्रा सुरक्षित है। खेतों में नंगे हाथों से कीटनाशक घोलना, हवा की दिशा का ध्यान न रखते हुए छिड़काव करना और छिड़काव के तुरंत बाद उन्हीं कपड़ों में परिवार के बीच लौट आना- ये दृश्य हमारे ग्रामीण इलाकों में आम हैं। लंबे समय तक कीटनाशकों के संपर्क से पार्किंसन जैसी गंभीर बीमारियां भी जन्म ले रही हैं। यह आने वाली पीढिय़ों के स्वास्थ्य से जुड़ा दीर्घकालिक संकट है। आखिर जिम्मेदारी किसकी है? यह ठीक है कि किसान संगठनों और स्वयंसेवी संस्थाओं ने समय-समय पर सुरक्षित कीटनाशक इस्तेमाल को लेकर जागरूकता अभियान चलाए हैं, लेकिन यह प्रयास तब तक अधूरा रहेगा जब तक सरकार इसे सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं बनाती। पहली आवश्यकता इस बात की है कि सभी किसानों को कीटनाशक के सुरक्षित इस्तेमाल का प्रशिक्षण दिया जाए। दूसरा, सुरक्षा उपकरण जैसे दस्ताने, मास्क और चश्मे सब्सिडी दरों पर या मुफ्त उपलब्ध कराए जाएं, जैसे बीज और उर्वरक पर सब्सिडी दी जाती है। तीसरा, अत्यधिक विषैले व प्रतिबंधित श्रेणी के कीटनाशकों की बिक्री पर कड़ी निगरानी सुनिश्चित की जाए, क्योंकि भारत में आज भी कई ऐसे रसायन खुलेआम बिकते हैं जिन पर विकसित देशों में पहले ही प्रतिबंध लग चुका है।सबसे अहम बात तो यह है कि कीट प्रंबधन के लिए जैविक तरीकों पर निर्भरता बढ़ाने के उपाय कारगर हों। सिक्किम जैसे राज्यों ने पूर्ण जैविक खेती की दिशा में जो कदम उठाए हैं, वे बताते हैं कि रासायनिक निर्भरता से मुक्ति असंभव नहीं है, बशर्ते राजनीतिक इच्छाशक्ति और निवेश हो।