
पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी। फोटो- पत्रिका
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥4/7-8॥ गीता ॥
गीता के इन दो श्लोकों ने घोषणा कर रखी है कि ईश्वर कब जन्म लेकर पृथ्वी पर अवतरित होते हैं और क्या करते हैं। शास्त्र यह भी कहते हैं कि असुरों का साम्राज्य देवताओं से तीन गुणा है। संसार में चारों ओर दुःख ही है। तब 'धर्मस्य ग्लानि' की परिभाषा क्या?
कृष्ण कह कर गए कि 'ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः'। तब प्रश्न यह भी है कि कृष्ण कहां नहीं है, जैसा कि प्रहलाद ने भी कहा था। और भी स्पष्ट कर रहे हैं- 'ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति' ।।18/61।।
सबके हृदय में बैठा है। फिर भी संसार दुःख का सागर है। क्योंकि व्यक्ति को यह ज्ञान नहीं है कि ईश्वर उसके साथ ही है। कहां से आता है यह ज्ञान और कैसे? कैसे कृष्ण को पहचानें, कैसे उसकी शक्तियों का उपयोग करें।
सृष्टि के आरंभ में ब्रह्म अकेला था, निराकार भी था। ऋत भाव में फैला था। ऋताग्नि और ऋतसोम के यज्ञ से वह सत्यावतार हुआ- ब्रह्म। ब्रह्म अग्निप्राण था- ऋषिप्राण रूप। ब्रह्म का गुण है निरंतर फैलना। ब्रह्म को भी फैलना ही था। पहले निराकार था, अब साकार है। उसके मन में भी कामना थी-'एकोऽहं बहुस्याम्'। परन्तु अकेले से सृष्टि नहीं होती। उसकी कामना ही मन को तप्त करने लगी। उसके भीतर का सुप्त मायाबल जाग्रत हुआ। आरंभ में बल के प्रभाव एवं अल्पता के कारण सृष्टि रस (ब्रह्म) प्रधान ही थी। बल के उद्भूत होते ही मन का प्राणण सृष्टि साक्षी हो गया। वाक् प्रकट हुआ। वाक् ही सृष्टि है।
यह तय हो गया कि सृष्टि युगल तत्व से ही होती है। ब्रह्म ने मायाबल को पैदा किया, जो उसको 'बहुस्याम्' बना सके। उसका सपना पूर्ण कर सके। ब्रह्म ही अव्यय पुरुष कहलाया, सृष्टि का आलम्बन बना। यही स्वयंभू कहलाया। सम्पूर्ण जगत इसका ही विवर्त है। ब्रह्म अमृत है, न मरता है, न ही पैदा होता है। मायाबल मर्त्यभाव है। पैदा होने वाले को तो मरना ही पड़ता है। जगत में आत्मा पुरुष है, अमृत है। माया प्रकृति है, स्त्री है, मृत्यु है। शरीर ही माया है।
माया की भूमिका है ब्रह्म का विस्तार। क्या अर्थ है? जो भी नई सृष्टि बने, उसमें ब्रह्म हो, ब्रह्म के गुण हों और ब्रह्म की तर्ज पर ही बृंहण करने की क्षमता भी रखता हो। इसका अर्थ है सारी सृष्टि एक ही ब्रह्म-बीज से उत्पन्न भी हो। उसी बीज से माया ने चौरासी लाख योनियों का निर्माण किया।
'गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् ।
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥ 9/18
आगे कृष्ण स्वयं ही स्पष्ट भी करते हैं -
'सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ।। 14/4
अर्थात् - ब्रह्म में कर्ता भाव नहीं है। वह मात्र बीज प्रदाता है। आगे सृष्टि करना, पोषण करना, बृंहण करना और अन्त में ब्रह्मांश को लौटा लाना, यह सारा कार्य माया का है। जगत में जो कुछ दिखाई देता है, गतिमान है, परिवर्तनशील है, नाना रूप हैं, वह सब माया है।
सृष्टि के तीन धरातल हैं। सात लोकों में फैली विश्व-सृष्टि तीन त्रिलोकियों में बंटी है - रोदसी, क्रन्दसी, संयति।
अव्यय-अक्षर-क्षर रूप ब्रह्म की सृष्टि के भी तीन धरातल हैं। इसी प्रकार हमारे भी तीन शरीर हैं- स्थूल, सूक्ष्म, कारण शरीर। स्थूल और सूक्ष्म शरीर ही अपरा-परा प्रकृति है। सृष्टि निर्माण में अर्द्धनारीश्वर की भी बड़ी भूमिका होती है।
सृष्टि विस्तार के लिये ब्रह्मबीज पंचाग्नि में से गुजरता है। पांचवा जन्म स्थूल शरीर रूप होता है। 'अन्नाद भवन्ति भूतानि' ।।3/14।। पृथ्वी की योनि में वर्षा से गर्भ धारण करती है पृथ्वी। अन्न की आहुति से ब्रह्म शुक्र में पहुंचता है। शुक्राहुति से पुरुषदेह छोड़कर माता के गर्भ में पहुंचता है। मुख्य बात यह है कि यह बीज ही कृष्ण है, जिसे गर्भ में नया शरीर धारण करना है। माता का शरीर चलता-फिरता मन्दिर बन जाता है। ब्रह्म का माता की देह में आने-जाने का द्वार भी देहातीत है। माता अपनी स्थूल देह से नई देह का निर्माण करती है। माता की देह का-मन का निर्माण अन्न से होता है। अन्न ब्रह्म तथा शब्द-ब्रह्म ही ब्रह्मदेह-चेतना का विकास करते हैं। माता की सूक्ष्म देह प्राणमयी होती है। मां की भावनाओं के स्पंदन बातों से, लोरियों से शिशुमन का निर्माण करते हैं।
मां को पता लग जाता है कि घर में कोई नया मेहमान आ गया है। माता के मन में नए भाव उठने लगते हैं। खान-पान भी जीव के अनुरूप ही बदलता है। सपने भी जीव से संवाद का माध्यम बनते हैं। मां जीव के पिछले जन्म के संस्कारों को परिष्कृत करके अपने परिवार, मानव संस्कृति और मातृभूमि से जोड़ती है।
शरीर का निर्माण होना काफी नहीं है। गुठली से आम का पैदा होना ही बृंहण है। नई गुठली में पेड़ बनने और नए ब्रह्म को पैदा करने की क्षमता पैदा करना दूसरी बात है। स्त्री माया रूप में कारण शरीर है। अव्यय है-कृष्ण की शक्ति है। मां की चेतना ही शिशु के कारण शरीर में स्थित कृष्ण को संस्कारित करती है। उसको शक्ति और सामर्थ्य का स्मरण कराती है। परिवार की परिस्थितियों का भान कराती है, जहां उसे भूमिष्ठ होना है, अवतरण करना है। परिवार में रहते हुए ही उसे अपनी भूमिका का निर्वहन करना है-
'परित्राणाय साधूनां, विनाशाय च दुष्कृताम्' को अपने वर्तमान जीवन में घटित करना है। इसके बिना यह सिद्ध कैसे होगा कि जीवात्मा ब्रह्मांश है। चूंकि मां ही जीव में इस अभिव्यक्ति की क्षमता भरती है, अतः वह निश्चित रूप से पूजनीय है। उसके घर में कृष्ण रमण करते दिखाई पड़ेंगे। और यह क्षमता प्रत्येक माता में है। प्रश्न आस्था और प्रयास का है। जेन- जेड की तरह। हर बालक में कृष्ण की किलकारियां, लीलाएं और उसका वचन गूंजेगा-
'सर्व धर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ।।'
॥ गीता- 18/66॥
Updated on:
05 Sept 2026 08:51 am
Published on:
05 Sept 2026 08:39 am
