
फोटो: पत्रिका
मानव की देह का निर्माण एक असाधारण प्राकृतिक प्रक्रिया है जिसमें सृष्टि के सभी तत्व शामिल रहते हैं। चूंकि यज्ञ से ही अधिदेव और अध्यात्म का योग होता है अत: जो भी प्रक्रिया आत्मा के निर्माण में काम आती है, ठीक वैसी ही प्रक्रिया शरीर निर्माण में भी काम आती है। मूल में तो यह क्रम प्राण का ही विवर्त है। ब्रह्म का प्रथम आवरित स्वरूप अव्यय पुरुष कहलाता है। यही मूल प्राण है जो समस्त विश्व में व्याप्त रहता है। चेतन प्राणियों में यह अध्यात्म कहलाता है। जड़ पदार्थों में वह अधिभूत कहा जाता है। और देवताओं अर्थात इन्द्रिय आदि में रहने वाला अव्यय पुरुष का अंश अधिदेव कहलाता है।
वेदों में में गर्भधारण को मात्र एक जैविक प्रक्रिया के रूप मेंं नहीं देखा जाता। यह एक पवित्र कर्म माना गया है। ब्रह्म महद्योनि में चेतन गर्भ की स्थापना करता है। ममयोनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भम्दधाम्यहम्। जड़-चेतन के संयोग से ही सभी भूतों की उत्पत्ति होती है। गर्भाधान यज्ञ हेतु ब्रह्म स्वयं बीजप्रदाता बनता है और सभी प्राणियों के हृद् प्रदेश में प्रतिष्ठित होता जाता है—
ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारुढानि मायया॥
(गीता-।8.6।)
गर्भधारण ब्रह्म के अवतरण का मार्ग है। अत: गर्भाधान से पूर्व विविध देवताओं का आह्वान किया जाता है। ऋग्वेद और अथर्ववेद में गर्भ प्रक्रिया का वर्णन है,जहां विष्णु, त्वष्टा, प्रजापति, धाता, सरस्वती, सिनीवाली, अश्विनीकुमार, मित्रावरुण, बृहस्पति, इन्द्र, अग्रि आदि देव गर्भस्थापन से गर्भच्युति तक विभिन्न कर्मों के सहयोगी बनते हैं। इनमें विष्णु गर्भाशय को गर्भधारण के योग्य बनाते हैं। त्वष्टा शिशु की आकृति गढ़ते हैं। प्रजापति गर्भ में प्रजनन की शक्ति स्थापित करते हैं। धाता भ्रूण को स्थैर्य प्रदान करते हैं। सरस्वती गर्भ की रक्षा करती हैं। सिनीवाली प्रजनन क्षमता और सुगम प्रसव की देवी है। अश्विनीकुमार उर्वरता, संरक्षण और पोषण प्रदान करते हैं।
गर्भधारण प्रक्रिया में चन्द्रमा का सीधा संबंध होता है। सौम्यता, पोषण और मानसिक शक्ति के कारक चन्द्रमा की कलाओं का संभूति और विनाश भाव सृष्टि के सतत चक्र को दर्शाता है। संभूति सृजन, पोषण और ऊर्जा का आरोहण काल है, जबकि विनाश विश्राम, आत्मनिरीक्षण और अगले सृजन के लिए ऊर्जा-संचय का काल है। चन्द्रमा मन का स्वामी है। स्त्रियों का ऋतुकाल 28 दिन की अवधि का होता है। चन्द्रमा का माह भी 28 दिन का होता है। चान्द्रमास में 28 रात्रियों में 28 बार चांद्ररस का आगमन होता है। पुरुष-शुक्र में उन 28 चान्द्ररसों का सह-पिंड बनता है। इसी से प्रजनन चक्र संचालित होता है। जिस प्रकार चन्द्रमा समुद्र में ज्वार उत्पन्न करता है, उसी प्रकार चान्द्र ऊर्जा मानव-मन और शरीर पर भी प्रभाव डालती है। शुभ चन्द्र स्थिति में किया गया गर्भाधान उच्च कोटि के जीव को आकर्षित करने में सहायक बनता है। यदि चन्द्रमा बलवान है और वह शुभ नक्षत्रों के द्वारा देखा जा रहा है तो यह एक स्वस्थ और तेजस्वी संतान का संकेत है। इसके विपरीत पीडि़त चान्द्र अवस्था शिशु के खराब स्वास्थ्य का कारण बन जाता है। नारद पुराण में स्पष्ट उल्लेख है कि कृष्ण पक्ष में चन्द्रमा अनिष्टकारी हो सकता है, अत: इस काल में गर्भाधान वर्जित माना गया है।
गर्भाधान केवल जैविक संतान प्राप्ति का यज्ञ नहीं है बल्कि स्वयं ब्रह्म के विवर्त से जुड़ा है। यहां आत्मा को गर्भ में आमंत्रित किया जाता है। गर्भाधान संस्कार के माध्यम से किया जाने वाला यह पवित्रतम कर्म शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से सकारात्मक व दैवीय भावों के साथ सम्पन्न किया जाता है।
सुश्रुत संहिता में ऋतु, क्षेत्र, अम्बु और बीज- इन चार कारकों को महत्वपूर्ण माना है। इनमें से किसी में भी दूषण होने से गर्भधारण में बाधा संभव है। साथ ही इनके स्वस्थ होने पर भी अनेक बार गर्भधारण नहीं होता। शास्त्रों के अनुसार इसमें ईश्वरीय इच्छा और प्रारब्ध का भी योग होता है। श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि जैसे खेत में बीज बोने पर भी अंकुरण नहीं होता, वैसे ही गर्भधारण परमात्मा की माया शक्ति के अधीन है—
यथा धानासु वै धाना भवन्ति न भवन्ति च।
एवं भूतानि भूतेषु चोदितानीशमायया॥
(6.15.4)
माता-पिता ही नहीं, जीव के संदर्भ में भी प्रारब्ध कार्य करता है। कृष्ण भी कह रहे हैं कि हे अर्जुन! मनुष्य जिस-जिस भाव को स्मरण करता हुआ अंतिम समय में देह त्यागता है, वह उसी भाव को प्राप्त कर लेता है। जीव के पूर्वकृत्कर्म ही तय करते हैं कि वह कौन-सी योनि में जन्म लेगा? किस परिवार का हिस्सा बनेगा? कितनी आयु का भोग करेगा? किन परिस्थितियों व विधियों से उसका जन्म होगा?
चूंकि गर्भ धारण करना एक स्त्री के जीवन का मूल उद्देश्य होता है, अत: वह अपने मातृत्व लाभ हेतु पुरुष से जुड़ती है, विवाह संस्कार के द्वारा। यदि वह प्राकृतिक रूप में सम्पन्न प्रक्रिया से गर्भधारण नहीं कर पाती, तो भी उसके मातृत्व के पोषण हेतु विविध विधियों का विधान मिलता है। प्राचीन समाज व्यवस्था में मंत्र शक्ति और नियोग प्रथा से संतति प्राप्ति के अनेक उदाहरण शास्त्रों में मिलते हैं। महाभारत में राजा पाण्डु, धृतराष्ट्र और विदुर ये तीनों महर्षि वेदव्यास से उत्पन्न हुए। इनमें बीज एक किन्तु माताएं भिन्न थीं। सत्यवती ने वंशवृद्धि हेतु वेदव्यास को नियोग हेतु नियुक्त किया था। पुन: मंत्र शक्ति से कुंती व माद्री को पुत्रों की प्राप्ति हुई थी। क्या सौ कौरवों की उत्पत्ति को आज की आईवीएफ. तकनीक का पूर्व रूप नहीं माना जा सकता जहां गर्भपिंड को सौ टुकड़ों में विभाजित कर कलशों में रखा गया और शतपुत्रों की प्राप्ति हुई। आधुनिक चिकित्सा पद्धति में संतान प्राप्ति का प्रचलित माध्यम आईवीएफ है। साथ ही समाज व्यवस्था में नियोग के स्थान पर सरोगेसी को अपनाया गया है।
सामान्य गर्भाधारण में अंडाणु व शुक्राणु का योग स्त्री शरीर में होता है जबकि आईवीएफ में यह प्रयोगशाला में परखनली में होता है। भ्रूण बनने के बाद यह गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया जाता है। सरोगेसी में जैविक माता-पिता भिन्न होते हैं तथा भ्रूण को अन्य स्त्री के गर्भ में रखा जाता है। क्या कृष्ण के भाई बलराम के जन्म को सरोगेसी पद्धति से हुआ माना जा सकता है? भागवत में उल्लेख मिलता है कि भगवान ने योगमाया से कहा था कि देवकी के गर्भ में मेरा अंश स्वरूप शेष है, उसे बिना कठिनाई के रोहिणी के गर्भ में स्थापित कर दो।
गर्भाधान किसी भी प्रक्रिया से हुआ हो, आत्मा का प्रवेश समान नियम के अधीन है। जीव की दृष्टि से पिता की विरासत और मां के संस्कार ही अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। पिता का बीज तो सभी परिस्थितियों में समान रहता है, किंतु गर्भक्षेत्र के परिवर्तन से विधि के अनुरूप संतान के संस्कारों में अंतर आता है। आयुर्वेद और गीता के अनुसार मां के संस्कार गर्भाशय के वातावरण, रसधातु और मां की मानसिक और भावनात्मक स्थिति पर निर्भर रहते हैं। मां के व्यक्तित्व का सीधा प्रभाव संतान में परिलक्षित होता है।
सरोगेसी में मां जैविक मां से भिन्न होती है। गर्भकालिक संस्कार उस मां के होंगे जो 9 महीने इसे धारण करती है। मां की हर चर्या का प्रभाव शिशु पर पड़ता है। यदि संतान प्राप्ति की विधि में अन्य मां जुड़ती है तो जैविक मां का दायित्व संतान के प्रति अधिक बढ़ जाता है। वह अपनी संतान के उज्ज्वल भविष्य हेतु सरोगेट मां को उत्तम भोजन, सात्विक चर्या व समुचित वातावरण प्रदान करती है। साथ ही शिशु से स्वयं संवाद स्थापित कर उसे अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि व संस्कारों से जोड़ती है। जैविक मां भगवती भाव से संकल्पित होकर शिशु में दैवीय गुणों का विकास करती है, ताकि उसकी भगवत्ता सुदृढ़ हो सके।
क्रमश:
gulabkothari@epatrika.com
Updated on:
05 Sept 2026 07:14 am
Published on:
05 Sept 2026 07:12 am
