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संपादकीय: लालच व लापरवाही की जड़ें काटने से ही थमेंगे हादसे

जब जिम्मेदारी तय करने की बारी आती है तो समूचा भ्रष्ट तंत्र सुरक्षा कवच बनकर खड़ा हो जाता है। ज्यादा ही शोरगुल हुआ तो कुछ लोगों के नाम पर निलंबन के छींटे डाल दिए जाते हैं।
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लालच और लापरवाही की इंतहा में निर्दोषों की जान चली जाए तो भी जिम्मेदारों ने शायद हादसों से सबक नहीं लेने की कसम खा रखी है। मध्यप्रदेश के सागर जिले में जहरीली शराब से हुई मौतें हो या फिर देश की राजधानी दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में पीजी की इमारत ढहने से हुआ हादसा, दोनों के लिए भ्रष्ट व लापरवाह तंत्र जिम्मेदार है। दोनों में ही लालच का सबसे बड़ा योगदान है। हां, हर हादसे के बाद हमारे यहां लकीर पीटने का काम जरूर होता है। इसलिए मध्यप्रदेश में शराब दुकानें सील कर आबकारी महकमे के कुछ अफसरों पर निलंबन की कार्रवाई हुई है वहीं, दिल्ली में नगर निगम के पांच अफसरों को हादसे के लिए जिम्मेदार मानते हुए निलंबित कर दिया गया है। दिल्ली सरकार ने ऐलान किया है कि अब ऐसी नीति बनाई जाएगी, जिसके तहत सार्वजनिक उपयोग के लिए बनी इमारतों की समय-समय पर सुरक्षा जांच होगी।

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता दोनों ने ही ऐलान किया है कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। ये लोग बख्शे जाने योग्य भी नहीं हैं लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ निलंबन की कार्रवाई ही पर्याप्त है। क्या उन अफसरों को घर पर नहीं बैठा देना चाहिए था जिनकी लापरवाही ने सागर में जहरीली शराब की बिक्री होने दी और सस्ती के लालच में आकर इसे पीने वाले काल का ग्रास बन गए। क्या उनकी सेवा से बर्खास्तगी नहीं होनी चाहिए, जो चांदी की खनक के आगे बरसात के दौर में असुरक्षित इमारत में बेसमेंट खुदाई को लेकर आंखों पर पट्टी बांधे रहे। जहरीली शराब और इमारत ढहने से मौत के मामले हो या फिर बहुमंजिला इमारतों में आग लगने की घटनाएं। सबकी वजह जानने को लेकर जितने भी सवाल उठते हैं उनका एक ही जवाब है- जिम्मेदारों का लापरवाह रवैया। यह बात सच है कि सुरक्षा मानकों की पालना हर जगह होनी चाहिए। वहीं इस बात की सतत निगरानी भी जरूरी है कि कहीं नियम-कायदों की अवहेलना तो नहीं हो रही। चिंता का विषय यही है कि 'आग लगने पर कुआं खोदने' की प्रवृत्ति ही सिस्टम में इस तरह घुस गई है कि सारे नियम-कायदे कोई हादसा होने के बाद ही याद आने लगते हैं। जब जिम्मेदारी तय करने की बारी आती है तो समूचा भ्रष्ट तंत्र सुरक्षा कवच बनकर खड़ा हो जाता है। ज्यादा ही शोरगुल हुआ तो कुछ लोगों के नाम पर निलंबन के छींटे डाल दिए जाते हैं।

बड़ा सवाल यही है कि क्या जिम्मेदार अफसरों और कार्मिकों के निलंबन की कार्रवाई ही काफी है। रिश्वत के दम पर अवैध काम करने वाले क्यों बच जाते हैं? हादसों में दोषियों पर सीधे आपराधिक कार्रवाई जरूरी है। सजा भी ऐसी दी जानी चाहिए, जो नजीर बने। क्योंकि जिन्हें 'भ्रष्टाचार की गंगा' में स्नान करने की आदत पड़ गई वे नहीं सुधरेंगे। सिस्टम में पसरी लालच और लापरवाही की जड़ें काटकर ही हादसों की रोकथाम संभव है।