
किसी देश की अर्थव्यवस्था की ताकत मात्र उसके कारखानों, निर्यात या शेयर बाजार से नहीं मापी जाती। यह भी देखा जाता है कि आम लोग कितना खर्च कर रहे हैं। उनके खर्च से कारोबार, उत्पादन और रोजगार को कितनी गति मिल रही है। भारत में त्योहारों का मौसम इस आर्थिक गतिविधि को समझने का अच्छा उदाहरण है। रक्षाबंधन से गणेश चतुर्थी, नवरात्र, दशहरा और दीपावली तक तथा इसके बाद शादियों के मौसम में खरीदारी बढ़ जाती है। कपड़े, आभूषण, वाहन, मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और घर के सामान की मांग बढऩे से बाजार में गतिविधियां तेज होती हैं। इसका लाभ बड़े उद्योगों के साथ छोटे दुकानदारों, कारीगरों, मिठाई बनाने वालों और परिवहन से जुड़े लोगों को भी मिलता है। इस तरह त्योहार केवल धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन नहीं हैं, बल्कि देश के कारोबार को गति देने का भी बड़ा अवसर हैं। कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) ने नवंबर 2025 में जारी अपने सर्वेक्षण में नवरात्र से दीपावली के बीच वस्तुओं की बिक्री 5.40 लाख करोड़ रुपए और सेवाओं का कारोबार 65,000 करोड़ रुपए रहने का अनुमान दिया था। इस तरह कुल त्योहारी कारोबार का अनुमान 6.05 लाख करोड़ रुपए तक पहुंचा। यह अनुमान देश के 60 प्रमुख व्यापारिक केंद्रों में किए गए सर्वेक्षण पर आधारित था।
हालांकि, यह सरकार का आधिकारिक आंकड़ा नहीं, बल्कि व्यापारियों के संगठन का आकलन है। फिर भी इससे पता चलता है कि त्योहारों के दौरान देश के बाजार में कितनी बड़ी आर्थिक गतिविधि होती है। इस बाजार की व्यापकता को करोड़ों परिवारों की खरीदारी से भी समझा जा सकता है। भारत में हर परिवार की आमदनी और खर्च करने की क्षमता अलग-अलग है। कोई परिवार सोना, वाहन या महंगे घरेलू उपकरण खरीदता है तो कोई कपड़े, मिठाई, दीपक और रोजमर्रा की जरूरतों पर खर्च करता है। यदि लगभग 30 करोड़ परिवारों को आधार मानकर अलग-अलग खर्च की श्रेणियों का एक उदाहरण लिया जाए तो 50 लाख परिवारों का दो-दो लाख रुपए का खर्च एक लाख करोड़ रुपए बनता है। पांच करोड़ परिवारों का 50-50 हजार रुपए का खर्च 2.50 लाख करोड़ रुपए, दस करोड़ परिवारों का 20-20 हजार रुपए का खर्च दो लाख करोड़ रुपए और 15 करोड़ परिवारों का दो-दो हजार रुपए का खर्च 30 हजार करोड़ रुपए होता है। इन सभी को जोडऩे पर कुल राशि 5.80 लाख करोड़ रुपए बैठती है।
आर्थिक रूप से देखें तो देश की अर्थव्यवस्था में तकरीबन 6 लाख करोड़ रुपए का खर्च शामिल होगा जिस पर विभिन्न प्रकार के करों से सरकार को भी आय होगी और व्यापारियों को भी। जिससे देश की आर्थिक गति में तेजी आएगी। यह केवल एक उदाहरण है, वास्तविक त्योहारी खर्च का प्रमाणित आंकड़ा नहीं है। परिवारों की संख्या और खर्च की इन श्रेणियों की पुष्टि किसी सरकारी सर्वेक्षण से नहीं होती। इसका उद्देश्य यह समझाना है कि करोड़ों परिवारों का छोटा-बड़ा खर्च मिलकर कितना बड़ा बाजार बन सकता है। दरअसल, भारत की अर्थव्यवस्था में आम लोगों के खर्च की अहमियत सरकारी आंकड़ों से भी स्पष्ट होती है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में निजी अंतिम उपभोग व्यय का जीडीपी में हिस्सा 61.5 प्रतिशत रहने का अनुमान था। सरल शब्दों में कहें तो देश में बनने वाली वस्तुओं और सेवाओं के कुल मूल्य में लोगों के खर्च की भूमिका बहुत बड़ी है। इसी वित्त वर्ष की पहली छमाही में निजी उपभोग व्यय में वास्तविक रूप से 7.5 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई। जब लोग अधिक खरीदारी करते हैं तो कारोबारियों को बिक्री बढ़ाने का अवसर मिलता है। मांग बढऩे पर कंपनियां उत्पादन बढ़ा सकती हैं और नए कामगारों की जरूरत भी पैदा हो सकती है।
वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के जरिये सरकार वस्तुओं और सेवाओं की बिक्री पर लागू कर वसूलती है। सितंबर 2026 में देश का कुल जीएसटी टैक्स कलेक्शन 2.04 लाख करोड़ रुपए रहा, जो सितंबर 2025 की तुलना में 14.7 प्रतिशत अधिक था। अप्रेल से सितंबर 2026 के बीच कुल जीएसटी टैक्स कलेक्शन में पिछले वर्ष की इसी अवधि के मुकाबले 11.6 प्रतिशत वृद्धि हुई। ये आंकड़े बताते हैं कि सरकार का टैक्स कलेक्शन बढ़ा है और औपचारिक कारोबार में गतिविधियां बनी हुई हैं। हालांकि, इस बढ़ोतरी में त्योहारों के अलावा आयात, कर जमा करने के बेहतर अनुपालन और दूसरे आर्थिक कारणों की भी भूमिका होती है। कारोबार बढऩे और टैक्स कलेक्शन में सुधार का व्यापक आर्थिक महत्व है, लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए कि टैक्स कलेक्शन में हुई पूरी बढ़ोतरी को केवल त्योहारों की खरीदारी से जोडऩा सही नहीं होगा। त्योहारी मांग का असर वाहन उद्योग में भी दिखाई देता है। फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशंस (फाडा) के अनुसार वर्ष 2025 में नवरात्र के दौरान वाहन खुदरा बिक्री में पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में लगभग 34 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई थी। ऑनलाइन खरीदारी और डिजिटल भुगतान ने इस बाजार को और बड़ा बनाया है। ग्रामीण भारत भी त्योहारी अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। किसानों की आमदनी, फसलों के दाम और ग्रामीण रोजगार की स्थिति का असर गांवों में होने वाली खरीदारी पर पड़ता है।
सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण 2023-24 के अनुसार सरकारी योजनाओं के तहत मुफ्त मिलने वाली वस्तुओं के अनुमानित मूल्य को शामिल किए बिना ग्रामीण भारत में प्रति व्यक्ति औसत मासिक खर्च 4,122 रुपए और शहरी भारत में 6,996 रुपए था। ये पूरे वर्ष के घरेलू खर्च के आंकड़े हैं, केवल त्योहारों के नहीं। फिर भी इनसे ग्रामीण और शहरी परिवारों की खरीदारी की स्थिति को समझने में मदद मिलती है। भारत की त्योहार-आधारित अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत उसका विशाल घरेलू बाजार है। कैट का त्योहारी कारोबार संबंधी अनुमान, आर्थिक सर्वेक्षण में घरेलू खर्च की बड़ी हिस्सेदारी और जीएसटी टैक्स कलेक्शन में बढ़ोतरी अलग-अलग रूपों में बाजार की गतिविधियों को सामने रखते हैं। ये आंकड़े यह साबित नहीं करते कि पूरी आर्थिक वृद्धि त्योहारों के कारण हुई है, लेकिन वे बताते हैं कि लोगों की खरीदारी देश के कारोबार के लिए कितनी महत्वपूर्ण है। भारत में त्योहारों की आर्थिक शक्ति उस प्रक्रिया में है, जो परिवारों की खरीदारी को व्यापार, उत्पादन और रोजगार से जोड़ती है। इस शक्ति का सही उपयोग घरेलू बाजार को मजबूत करने व आर्थिक विकास को व्यापक आधार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
विजय गर्ग,(आर्थिक विशेषज्ञ)