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सावधान हो जाएं, जल संकट सिर पर खड़ा है

जलविद्युत उत्पादन में गिरावट आने से बिजली का संकट उत्पन्न हो सकता है, जिसका सीधा असर उद्योगों, विनिर्माण इकाइयों और वाणिज्यिक गतिविधियों की परिचालन लागत पर पड़ेगा।
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भारत

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Opinion Desk

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पंकज चतुर्वेदी

•

Updated: 28 Oct 2026, 5:58 PM IST

water crisis

water crisis

जलवायु परिवर्तन और प्रशांत महासागर में अल नीनो की सक्रियता के कारण इस बार मानसून के दौरान बारिश का वितरण अत्यंत असमान रहा है, जिससे देश के अधिकांश प्रमुख जलाशयों में पर्याप्त पानी नहीं पहुंच सका है। केंद्रीय जल आयोग के आंकड़ों के अनुसार, देश के 178 प्रमुख निगरानी वाले जलाशयों में उनकी कुल क्षमता का महज 68.58 प्रतिशत यानी 126.717 अरब घन मीटर जल ही उपलब्ध है, जबकि 31.42 प्रतिशत क्षमता खाली पड़ी है। पिछले वर्ष की तुलना में जलाशयों के जल स्तर में 24.53 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई है। जल संकट का यह प्रभाव विभिन्न राज्यों में धरातल पर दिखने लगा है।

मध्य प्रदेश में संभावित संकट से निपटने के लिए कम बारिश वाले 11 जिलों में कार्ययोजना तैयार की गई है और बांधों से बिना अनुमति के मोटर पंप लगाकर सिंचाई करने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है। राजस्थान में बांधों में पानी कम होने से जोधपुर क्षेत्र में रबी सिंचाई के लिए हर पांचवें दिन 24 घंटे का फिल्टर क्लोजर लिया जा रहा है। कर्नाटक के 240 में से 226 तालुक सूखाग्रस्त घोषित हो चुके हैं, जहां पीने के पानी के लिए टैंकरों पर निर्भरता बढ़ गई है। वहीं महाराष्ट्र में गैर-जरूरी कार्यों में पानी की बर्बादी पर जुर्माना और सख्त पाबंदियां लागू की गई हैं। दक्षिण भारत में स्थिति सबसे अधिक संवेदनशील है, जहां कावेरी बेसिन में सामान्य से 60.50 प्रतिशत और पेन्नार बेसिन में 72.32 प्रतिशत कम पानी बचा है। देशभर के 42 जलाशयों में पानी की मात्रा उनके सामान्य स्तर की तुलना में 50 से 80 प्रतिशत के बीच ही सिमटकर रह गई है। जल की इस व्यापक कमी का सबसे पहला और प्रत्यक्ष असर देश की कृषि अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। भारत में रबी फसलों की बुवाई और सिंचाई काफी हद तक जलाशयों तथा नहरों से मिलने वाले पानी पर निर्भर होती है। जलाशयों में जल भंडारण घटने से नहरों में जलापूर्ति कम की जा रही है, जिससे रबी सीजन में गेहूं, चना और सरसों जैसी फसलों की बुवाई और उत्पादन बुरी तरह प्रभावित होने की आशंका है। सिंचाई का जल न मिलने से किसानों की फसल लागत में वृद्धि हो रही है और पैदावार घटने का जोखिम गहरा गया है। इसके साथ ही मिट्टी में नमी की कमी के कारण भूमि की उर्वरता पर भी दीर्घकालिक विपरीत प्रभाव पड़ता है।

कृषि संकट के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में मवेशियों और पशुधन प्रबंधन के सामने भी एक बड़ा संकट आ खड़ा हुआ है। पानी की किल्लत के चलते चरागाह सूख रहे हैं और मवेशियों के पीने के पानी के पारंपरिक स्रोत जैसे पोखर, तालाब और कुएं समय से पहले ही जलविहीन हो चुके हैं। राज्य सरकारें सूखा प्रभावित क्षेत्रों में चारे की किल्लत से निपटने के लिए चारा डिपो स्थापित करने की योजना बना रही हैं। पानी और हरे चारे की अनुपलब्धता का सीधा असर दुग्ध उत्पादन पर पड़ रहा है, जो ग्रामीण परिवारों की आय का एक मुख्य पूरक साधन होता है। संकट बढऩे पर पशुपालकों को अपने मवेशियों को कम दामों पर बेचने या विस्थापित करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। पेयजल आपूर्ति की दृष्टि से भी आने वाले आठ-नौ महीने बेहद चुनौतीपूर्ण रहने वाले हैं।

देश के कई छोटे-बड़े शहरों में जल जीवन मिशन और स्थानीय निकायों द्वारा जलापूर्ति की राशनिंग शुरू की जा चुकी है। पानी के पाइपलाइनों में रिसाव, जल चोरी और अपव्यय को रोकने के लिए प्रशासन को सख्त नियम बनाने पड़ रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल स्रोतों के सूखने से महिलाओं को पानी जुटाने के लिए कई किलोमीटर दूर जाना पड़ रहा है। अर्थव्यवस्था के स्तर पर जल संकट का प्रभाव केवल कृषि तक सीमित न रहकर बहुआयामी रूप धारण कर लेता है। खाद्यान्न उत्पादन में कमी आने से बाजार में आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बाधित होती है, जिससे खाद्य पदार्थों की कीमतों में उछाल आता है और मुद्रास्फीति बढ़ती है। इसके अलावा, देश की 20 प्रमुख जलविद्युत परियोजनाओं में से 12 से जुड़े जलाशयों में पानी का स्तर सामान्य या उससे कम दर्ज किया गया है। जलविद्युत उत्पादन में गिरावट आने से बिजली का संकट उत्पन्न हो सकता है, जिसका सीधा असर उद्योगों, विनिर्माण इकाइयों और वाणिज्यिक गतिविधियों की परिचालन लागत पर पड़ेगा। सामाजिक दृष्टि से पानी का यह संकट विभिन्न क्षेत्रों और वर्गों के बीच प्रतिस्पर्धा और तनाव को जन्म देता है। सीमित जल संसाधनों के आवंटन को लेकर शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच तथा कृषि एवं औद्योगिक जरूरतों के बीच खींचतान बढ़ जाती है। पानी की मांग को लेकर किसानों के विरोध प्रदर्शन और सड़कों पर उतरने की घटनाएं सामाजिक असंतोष को बढ़ाती हैं। आजीविका का संकट गहराने पर ग्रामीण आबादी का शहरों की ओर पलायन तेज होता है, जिससे शहरी बुनियादी ढांचे, आवास व मलिन बस्तियों पर अत्यधिक दबाव बनता है। राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर भी यह जल संकट जटिल चुनौतियां उत्पन्न करता है। जब नदियों और जलाशयों में पानी का प्रवाह कम होता है, तो अंतरराज्यीय नदी जल विवाद अधिक उग्र हो जाते हैं।

स्थानीय राजनीति में पानी की उपलब्धता चुनावी मुद्दा बन जाती है, जहां प्रशासनिक ध्यान अल्पकालिक राहत कार्यों व आपातकालीन आवंटन तक सीमित रह जाता है। इस गंभीर स्थिति से निपटने के लिए तात्कालिक आपातकालीन उपायों के साथ-साथ दीर्घकालिक जल प्रबंधन रणनीतियों पर काम करना अत्यंत आवश्यक है। कम पानी में पकने वाली रबी फसलों के चयन, सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों के उपयोग और औद्योगिक जल के पुनर्चक्रण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। केवल एकीकृत और दूरदर्शी जल संरक्षण नीतियों के माध्यम से ही आने वाले महीनों में गहराने वाले इस बहुआयामी संकट के प्रभावों को सीमित किया जा सकता है।

पंकज चतुर्वेदी, (वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद्)