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कूटनीति भी क्या-क्या करतब दिखाती है, यह बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के स्वदेश वापसी की घोषणा के साथ एक बार फिर दिखाई देने लगा। इस मामले में कयास लगाने का दौर चल रहा है। कहा जा रहा है कि भारत-बांग्लादेश के बीच खराब रिश्तों में सुधार के लिए यह समाधान निकाला गया है। शेख हसीना के भारत में शरण लेने के बाद से भारत और बांग्लादेश के बीच तनाव बना हुआ है। ज्ञातव्य है कि अपने देश में बेरोजगारी के सवाल पर हिंसक छात्र आंदोलन के बीच 5 अगस्त 2024 को शेख हसीना को प्रधानमंत्री पद छोडऩा पड़ा था। तब वह किसी तरह नई दिल्ली पहुंचीं और उसी समय से भारत में निर्वासन व्यतीत कर रही हैं। उन पर अपने देश में 150 से अधिक मुकदमे बताए गए हैं। इनमें प्रमुख रूप से 2024 में आंदोलनकारियों पर गोली चलाने के आदेश के परिणामस्वरूप कुछ छात्रों व अन्य लोगों की मौत, भ्रष्टाचार और सरकारी संपत्ति के दुरुपयोग के आरोप हैं।
बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण (आइसीटी) ने शेख हसीना की अनुपस्थिति में नवंबर 2025 में उन्हें फांसी की सजा सुनाई थी। बांग्लादेश की पूर्व पीएम इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इन्हें राजनीति से प्रेरित बताती रही हैं। कूटनीतिक चालों के बीच बांग्लादेश की सरकार शेख हसीना को भगोड़ा अपराधी बताती है। बांग्लादेश यह भी मांग करता रहा है कि हसीना को भारतीय जमीन से राजनीतिक गतिविधि और इस तरह के बयान देने की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए। ऐसे में आखिर क्या बदलाव आया कि शेख हसीना ने अचानक स्वदेश लौटने की घोषणा कर दी है? इसे समझना बहुत मुश्किल नहीं है। दो साल पहले 5 अगस्त 2024 को शेख हसीना के भारत पलायन के बाद से स्थितियों पर काबू नहीं पाया जा सका है। हसीना के देश छोडऩे के बाद नोबेल पुरस्कार प्राप्त मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने शपथ ली। यूनुस ने प्रशासकों की नियुक्ति के जरिये देश के आर्थिक हालात ठीक करने के प्रयत्न शुरू किए। इन प्रयासों के तहत बैंकिंग सुधार और अवैध व धोखाधड़ी से बाहर भेजे धन को वापस लाने की जुगत शुरू हुई। उन्हीं के दौर में शेख हसीना को 2024 के छात्र आंदोलन के दौरान हिंसा और मानवता के खिलाफ कथित अपराधों के मामले में मौत की सजा सुनाई गई।
मोहम्मद यूनुस के सरकार प्रमुख रहते इस वर्ष फरवरी में वहां चुनाव कराए गए। निर्वाचन में तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने कुल 300 में से 209 सीटें हासिल कर भारी बहुमत से सरकार बनाई। यह शेख हसीना की आवामी लीग पार्टी की अनुपस्थिति में हुआ। सब कुछ सहज इसलिए लग रहा था कि बेरोजगारी, महंगाई आदि से आक्रोश की सीमा पार कर चुके लोग बदलाव की उम्मीदें कर रहे थे। ऐसे में कोई बड़ी राहत नहीं मिलते देख आक्रोश की राख फिर से सुलगने लगी। तारिक रहमान को विवादित और बेअसर बताकर उन्हें हटाने की योजना बनाई जा रही है। विवाद के पीछे बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान बताए जाते हैं। वे संयुक्त राष्ट्र महासभा के सत्र अध्यक्ष भी हैं। उन्होंने तारिक रहमान की बेटी जैमा को संयुक्त राष्ट्र महासभा के अध्यक्ष कार्यालय में लीगल ऑफिसर नियुक्त करा लिया है।
कहा जाता है कि उन्होंने ऐसा जानबूझकर किया, जिससे तारिक विवादों में आ जाएं। खलीलुर रहमान पर शक इसलिए भी होता है कि हाल में संयुक्त राष्ट्र सभा के दौरान उन्होंने अपने प्रधानमंत्री तारिक रहमान के भाषण के लिए ऐसा वक्त तय किया, जब न्यूयॉर्क में दोपहर और ढाका में सुबह करीब सवा चार बजे का समय था। यह समय दोनों ही जगह लोगों को भाषण से दूर रहने का था। बांग्लादेश के मामले में चिंता इस खबर से भी है कि पिछले दिनों वहां पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआइ के कुछ वरिष्ठ अधिकारी डेरा डाले हुए थे। इनमें पाकिस्तानी सेना के मेजर मोहम्मद अकरम और मेजर अजीज बट्टरी प्रमुख हैं। इन अधिकारियों ने बांग्लादेश के चट्टोग्राम सहित कई सैन्य छावनियों का गुपचुप दौरा किया। बड़ा सवाल यह है कि बांग्लादेश की पूर्व पीएम शेख हसीना क्या पाकिस्तान की इस साजिश के बीच अपने देश लौट रही हैं। इस मुद्दे को बहुत सहजता से ग्रहण करने पर गलतफहमी हो सकती है। वह कम से कम यह स्थिति नहीं पैदा करेंगी, जिससे उन्हें शरण देने वाले भारत के सामने विपरीत कूटनीतिक हालात पैदा हों। जब बांग्लादेश लौटने की उन्होंने दूसरी बार घोषणा की, उसी समय 1975 को भी याद किया जब उनके पिता बंगबंधु की हत्या कर सरकार बदल दी गई थी। अब बांग्लादेश के अंदर सरकार बदलने के लिए ताजा योजनाओं में सिर्फ आइएसआइ ही नहीं है। दूसरे मुस्लिम देशों को भी तारिक रहमान सुहा नहीं रहे हैं।
ऐसा लगता है कि कुल पांच बार और चार बार लगातार देश की पीएम रह चुकीं शेख हसीना बांग्लादेश के इस अनिश्चित हालात को अपने अनुकूल मानकर चल रही हैं। फिर वर्तमान सरकार के विपरीत स्थिति भी उनके अनुकूल हो सकती है। उन्हें पता है कि उनके स्वदेश लौटने पर सरकारी विरोध के मुकाबले कहीं अधिक आम लोगों की ओर से स्वागत होगा। लोगों का रुख भांप पूर्व में दी गई फांसी की सजा भी तत्काल अमल में नहीं लाई जा सकेगी। ऐसा प्रवर्तन नियमों के तहत होगा। बांग्लादेश से प्रवर्तन समझौते के बावजूद राजनीतिक मामलों में प्रवर्तन की छूट अथवा संतुष्टि पर ही वांछित को वापस भेजने के नियम का ही लाभ भारत ले रहा है। वह शर्त लगा सकता है कि हसीना की फांसी की सजा पर फिर से सुनवाई हो। अपने ताजा बयान में खुद हसीना इस बात के लिए अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप को बधाई दे ही चुकी हैं कि उन्होंने बांग्लादेश को यूएसएड की फंडिंग रोककर धन गलत हाथों में जाने से बचा लिया है। कूटनीति और भविष्य के रंग कैसे हों, यह तो अभी पता नहीं, पर बांग्लादेश में निर्वासन के बाद फिर से पीएम बनने के उदाहरण पहले भी रहे हैं।
डॉ. प्रभात ओझा,(वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार)
Updated on:
27 Oct 2026, 6:59 PM IST
Published on:
27 Oct 2026, 6:59 PM IST
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