
washrooms
दिल्ली हाईकोर्ट ने साफ-सुथरे सार्वजनिक शौचालयों को जीवन के मौलिक अधिकार का हिस्सा बताकर इस समस्या का कानूनी वजन बढ़ा दिया है। यह सिर्फ कानूनी व्याख्या नहीं, बल्कि उस रोजमर्रा की सच्चाई की स्वीकारोक्ति है, जिससे करोड़ों शहरी नागरिक हर दिन जूझते हैं। बाजार में निकली महिला, दिहाड़ी मजदूर, रिक्शा चालक या बुजुर्ग- सबके लिए स्वच्छ शौचालय महज सुविधा नहीं, बुनियादी जरूरत है। अदालतों ने समय-समय पर संविधान के अनुच्छेद 21 की विस्तृत व्याख्या की है। इसमें स्वच्छ पर्यावरण, स्वास्थ्य और गरिमापूर्ण जीवन को शामिल माना गया है। साफ शौचालय को इसी की कड़ी मानना तर्कसंगत है। जब किसी नागरिक को शौचालय के अभाव में घंटों परेशान होने और संक्रमण के कारण बीमारी का खतरा उठाना पड़े, तो यह उसके स्वास्थ्य और गरिमा दोनों पर आघात है। महिलाओं के लिए यह समस्या और गंभीर है, क्योंकि सुविधा के अभाव में उनकी आवाजाही, रोजगार और सुरक्षा प्रभावित होती है।
अदालत ने ठीक ही कहा कि जिम्मेदारी सिर्फ शौचालयों के रखरखाव तक सीमित नहीं है। आबादी के अनुपात में पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध कराना भी प्रशासन का दायित्व है। यह सुनवाई दिल्ली के संदर्भ में जरूर हो रही है, पर अदालत की व्याख्या और सुझाव देश के सभी शहरों के लिए समान रूप से जरूरी है। पिछले दशकों में सार्वजनिक शौचालय की संख्या जरूर बढ़ी है, पर यह बढ़ती आबादी और स्वच्छता के पैमाने पर पर्याप्त अब भी नहीं है। अदालत का सबसे अहम सुझाव वह है जिसमें कॉलेज और यूनिवर्सिटी के विद्यार्थियों की टीमें बनाकर औचक निरीक्षण कराने की बात कही गई है, जिनकी रिपोर्ट पर अधिकारियों को कार्रवाई करनी होगी। इस मॉडल में दो अच्छी बातें हैं। पहली, निगरानी का दायरा सरकारी तंत्र से बाहर निकलकर समाज तक पहुंचता है। दूसरी, युवाओं को नागरिक जिम्मेदारी और जमीनी हकीकत से सीधे जोडऩे का अवसर मिलता है। मानदेय की व्यवस्था उचित है, क्योंकि स्वयंसेवा के भरोसे वाली व्यवस्थाएं अक्सर दम तोड़ देती हैं।
यह व्यवस्था तभी सार्थक होगी जब निरीक्षण रिपोर्टों पर कार्रवाई हो और इसका मैकेनिज्म धरातल पर उतरे। अदालतों के कई जनोपयोगी फैसलों की पालना का अनुभव संतोषजनक नहीं है। प्रशासनिक लाल-फीताशाही में रिपोर्टों का फाइलों में दब जाना आम है। अदालत ने जवाबदेही का स्पष्ट ढांचा तय कर इस जोखिम को कम करने की कोशिश की है। यह भी याद रखना होगा कि अदालतें निर्देश दे सकती हैं, पर शौचालय बनाने, पानी पहुंचाने और सफाई कराने का काम अंतत: प्रशासन को ही करना है। विडंबना ही है कि ऐसी व्यवस्थाओं के लिए भी अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ता है जिनमें किसी विवाद की कोई गुंजाइश नहीं हो। आखिर शासन-प्रशासन में बैठा कौन होगा जो साफ शौचालय के महत्व से अनजान हो?
Updated on:
24 Oct 2026, 3:09 PM IST
Published on:
24 Oct 2026, 3:09 PM IST
Copyright © 2026 Patrika Group. All Rights Reserved.