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शरीर ही ब्रह्माण्ड: माया का साहचर्य ही पूर्णता

स्थूल भाव में स्त्री परा एवं अपरा दोनों भावों में जीवन का संचालन करती है। स्त्री का भौतिक स्वरूप, पति व गृहस्थी के प्रति उसका दायित्व, बच्चों का लालन-पालन, परिवार को आर्थिक व सामाजिक रूप में व्यवस्थित रखना यह सब अपरा प्रकृति के गुण हैं।
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भारत

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Gulab Kothari

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गुलाब कोठारी

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Updated: 24 Oct 2026, 7:37 AM IST

sharir hi brahmand

फोटो: पत्रिका

जो समझ न आए वह माया है, स्त्री है। परोक्ष ज्ञान, व्यवहार, वाणी तथा अन्तज्र्ञान की स्वामिनी है—स्त्री। कहते आए हैं कि 'त्रिया चरित्रं पुरुषस्य भाग्यं देवो न जानाति कुतो मनुष्य:।‘ स्त्री गुरु स्थानीय दिव्य सम्पदा है, जननी भी है। सम्पूर्ण देश में विभिन्न स्वरूपों में स्त्री की ही पूजा है। क्यों? क्योंकि यह शरीर- प्राणी मात्र का- मां का ही प्रतिनिधि है। मां के शरीर से-अन्न से-शोणित से ही निर्मित होता है। मां के दूध से ही पोषित होता है। मां के मन से ही संस्कारित होता है। गुठली पिता और सम्पूर्ण वृक्ष की आधार भूमि मां बनती है।

शरीर मां है। सबकी मां एक है—माया। वही शरीर बदलती है, वही अपने शरीर से सन्तान के शरीर का निर्माण करती है। शरीर किसके लिए। पुरुष-ईश्वर-ब्रह्म के लिए। वह भी तो सृष्टि में एक ही है। शरीर में प्राण रूप बहता है। जब तक शरीर है, बहता रहेगा। वही बीज का धारक है। वही नई सन्तान के लिए धरती में वपन करता है। नई सन्तान में भी बीज तो वही होगा। पिता ही पुत्र बन जाता है। माता-पिता सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में एक ही युगल के माया-रचित विभिन्न रूप हैं।

सृष्टि द्वन्द्वात्मक है। अग्नि-सोम भाव ही सृष्टि के मूल उपादान हैं। अग्नि का धर्म विशकलन (खण्ड करना) है तो सोम का धर्म जोडऩा है। एक दाहक है, दूसरा दाह्य। एक भोक्ता है, दूसरा भोग्य। एक-दूसरे के बिना अस्तित्वहीन भी हैं। सोम को आधार चाहिए अग्नि का और अग्नि को अपना स्वरूप बनाए रखने के लिए सोम चाहिए। यानी पूर्णता उनके साहचर्य में है अलगाव में नहीं। एक के पूर्णभाव का अभिप्राय है अद्र्धनारीश्वर भाव। यानी आधा अग्नि और आधा सोम मिलकर पूर्ण बनते हैं। पूर्णता ही समाधान है—
पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।

सृष्टि में पुरुष-प्रकृति, नर-नारी, शिव-शक्ति सभी अद्र्धनारीश्वर भाव हैं जहां दोनों मिलकर पूर्ण हैं, अन्यथा अपूर्ण। इसका अभिप्राय यह भी है कि प्रत्येक प्राणी ही अद्र्धनारीश्वर भाव लेकर जन्मता है। अग्नि अथवा सोम की प्रधानता ही उनके मूल स्वरूप को प्रतिष्ठित करता है। इसी आधार पर अग्नि प्रधान सृष्टि को पुरुष व सोम प्रधान सृष्टि को स्त्री कहा जाता है। किंतु दोनों में सोम व अग्नि भी रहते हैं। वस्तुत: भीतर उलटा है। पुरुष भीतर सौम्य है। स्त्री की प्रतिष्ठा आग्नेय है। सोम आहुति द्रव्य है, जो अग्नि की ओर आता है, आहुत होने। साहचर्य भाव की आकांक्षा से। अग्नि भी उसको स्वयं में स्थान देकर प्रतिष्ठित हो जाता है।

न ब्रह्म कुछ करता है, न माया ही कुछ करती है। दोनों मूल रूप से द्रष्टा हैं। जब ब्रह्म सृष्टि करने को प्रेरित होते हैं, तब माया बल कुछ नया रूप लेकर आगे बढ़ता है—प्राण रूप में। प्राण से ही गति-आगति-स्थिति के सिद्धान्त द्वारा सूक्ष्म शरीर का निर्माण होता है - महामाया शक्ति रूपा होती है। वैसे भी ब्रह्म में कर्ता भाव न होने से सभी क्रियाओं का संचालन महामाया ही करती है। पार्थिव जगत में यही कार्य स्त्री करती है।
महामाया भ्रम नहीं बल्कि संपूर्ण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति, पालन और संचालन की शक्ति है। देवी भागवत और मार्कण्डेय पुराण में कहा गया है कि माया सृष्टि भी उत्पन्न करती है और वही पालिका भी है—तयैव च जगत् सृष्टं तयैव परिपाल्यते। नाम-रूप कर्मात्मक विश्व की उत्पादिका शक्ति माया पदार्थों के विस्तार भाव से जुड़ी है। सत्ता, चेतना और आनंद रूप रस, जो सर्वत्र एक भाव में स्थित है, उसको आवरित कर विशेष बना देना ही महामाया का कार्य है। महामाया मूलत: गीता में कही गई परा और अपरा प्रकृतियों का समग्र रूप है। गीता के अनुसार अपरा प्रकृति जड़, स्थूल और भोग्य है। हमारा शरीर, मन, बुद्धि और अहंकार इसके अंग हैं—
भूमिरापोऽनलो वायु: खं मनो बुद्धिरेव च।
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥
(गीता 7.4)
परा प्रकृति जीवभूता है तथा सम्पूर्ण जगत् की धारिका शक्ति है—
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥
(गीता 7.5)
स्थूल भाव में स्त्री परा एवं अपरा दोनों भावों में जीवन का संचालन करती है। स्त्री का भौतिक स्वरूप, पति व गृहस्थी के प्रति उसका दायित्व, बच्चों का लालन-पालन, परिवार को आर्थिक व सामाजिक रूप में व्यवस्थित रखना यह सब अपरा प्रकृति के गुण हैं। जबकि उसका स्त्रैण भाव, ममत्व, अन्त: प्रेरणा, संस्कारदातृत्व आदि परा प्रकृति के रूप है। ये सूक्ष्म भाव परिवार को पूर्ण बनाते है।

व्यवहार में स्त्री ही जीवन को गतिमान बनाए रखने के लिए प्रत्येक स्वरूप में दिखाई पड़ती है। एक निश्चित स्वरूप में जीने के लिए समाज व्यवस्था बनी हुई है। प्रकृति इस व्यवस्था के बाहर है। पुरुष और प्रकृति दोनों ही युगल तत्त्व एवं कर्मफल के अनुरूप जीते हैं। इसके लिए व्यवस्था अवरोध नहीं बन सकती। आज भी मनुष्य प्रकृति की कर्मफल और पुनर्जन्म की व्यवस्था को समझने की क्षमता नहीं प्राप्त कर पाया। स्त्री ही भिन्न-भिन्न रूपों में पुरुष के चारों ओर - ऋत रूप - क्रिया-प्रतिक्रिया रूप में पुरुष जीवन का संचालन करती है, स्वयं का नहीं।
स्त्री की सभी क्रियाएं पुरुष के निमित्त होती हैं। वह सत्याग्नि में आहुत रहते हुए पौरुष भाव में पुरुष का विस्तार करती है। स्वयं का ज्ञान - व्यवहार - कर्म उसी को समर्पित कर देती है। स्वयं गौण बनी रहती है। आप किसी भी मां को स्वयं के लिए जीते नहीं देखोगे। स्त्री अपने जीवन को तीन स्वरूपों में जीती है। विवाह पूर्व स्वयं के लिए - अपरा प्रकृति के रूप में। विवाहोत्तर - पत्नी रूप में - परा प्रकृति रूप में। अपने आत्मिक धरातल पर - भक्ति - निवृत्ति - सेवा रूप में।

विवाह पूर्व जहाँ स्त्री शरीर से जुड़ी, परिजनों, परम्पराओं के विषयों को सीखकर स्वयं को प्रशिक्षित करती है, वहीं विवाह बाद इनमें से अधिकांश विषय जीवनशैली में समाहित होते जाते हैं। विवाह के समय उसके आत्मिक धरातल के द्वार खुल जाते हैं। पति के आत्मा में आहुत हो जाती है। तब वहाँ तो केवल यांत्रिक देह है। उसका मूल लक्ष्य है ब्रह्म का विवर्त बनाना - एकोऽहं बहुस्याम्। यह आत्मा का ही क्षेत्र है। शरीर के विषय, सम्बन्ध पितृगृह में छूट गए।

विवाह आत्मा का विषय है। इसके द्वारा पिछले कर्मों का भोग किया जाता है, प्रकृतिदत्त भूमिका का निर्वाह किया जाता है तथा नए कर्मों की सर्जना - (बंधन/मोक्ष) की जाती है। स्त्री ही कामना रूप में पुरुष को प्रवृत्त करती है। उसके शरीर के प्रत्येक अंग से अंश एकत्र करती है। मायाबल के द्वारा ब्रह्मांश को आकर्षित करती है। इन सभी तत्वों को स्वयं के शरीर में आमंत्रित करती है। आगे के शिशु देह के निर्माण, पोषण, संस्कार निर्माण में सूक्ष्म शरीर के व्यापार को मूर्त रूप देती है। यहाँ देह केवल माध्यम है, उसका भोग लक्ष्य नहीं है। गर्भस्थ शिशु के साथ देह नहीं, आत्मा जुड़ता है। मूल में स्त्री अद्र्धांगिनी रूप में ही शेष जीवन व्यतीत करती है।

स्त्री शिशु को भी पति रूप में ही देखती है। पिता वै जायते पुत्रो कहा जाता है। स्त्री शरीर से शिशु का पोषण करती है, उसके आत्मा का मानव रूप में संस्कार करती है। यह देह के कार्य नहीं हैं। सन्तान को भी पति की सम्पत्ति ही मानकर माली की तरह सींचती है। जन्म के बाद बच्चा वैसे भी पिता का ही कहलाने लगता है।

पति का निर्माण भी करना है। उसकी अपूर्णता को पूर्ण करना है। यह भी सूक्ष्म स्तर का ही कर्म है। जो मूर्ति शादी से पूर्व कल्पना में तैयार की थी, उसे मूर्त रूप देती है। उसके अल्प-सोम भीतर के स्वरूप को भी पूर्णता देती है। श्रद्धा, वात्सल्य, स्नेह, प्रेम आदि व्यवहार से। वानप्रस्थ शुरू होने से पूर्व निवृत्त करने की तैयारी में लग जाती है। स्त्री को स्वयं के लिए मोक्ष जाने की तैयारी नहीं करनी होती। वह तो पति के आत्मा से जुड़ी है। अत: पति को ही भक्ति योग में प्रवेश को प्रेरित करती है। दोनों साथ-साथ मोक्ष गमन कर सकें।

क्रमश:
gulabkothari@epatrika.com