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संपादकीय: दवाइयों की जांच में लेटलतीफी जानलेवा

यों तो कोई भी दवा नकली व अमानक नहीं होनी चाहिए। लेकिन कैंसर, हृदय रोग, मधुमेह या रेबीज जैसी गंभीर बीमारियों के उपचार में इनका मरीज सेवन कर ले तो परिणाम भयावह हो सकते हैं।
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भारत

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Harish Parashar

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Updated: 27 Oct 2026, 6:48 PM IST

medicines

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दवा लेने के बाद भी मरीज पर या तो उसका असर ही नहीं हो या फिर कोई विपरीत असर होता दिखे तो दोनों ही मामलों में चिंता होना स्वाभाविक है। आमतौर पर किसी दवा से फायदा होता नहीं दिखे तो चिकित्सक भी दूसरी दवा लिख देते हैं। लेकिन इसे तो मरीजों के जीवन से खिलवाड़ ही कहा जाएगा, जब यह खुलासा हो कि पहले जो दवा ले रहे थे उसे बाजार में आने के काफी समय बाद जांच एजेंसियों ने नकली घोषित कर दिया है। खतरनाक तथ्य यह भी है कि नकल सिर्फ दवाइयों में ही नहीं बल्कि एंटीज रेबीज वेक्सीन और दूसरे कई इंजेक्शनों में भी सामने आई है। बड़ी लापरवाही यह भी है कि बाजार में पहुंचने के बाद नकली होने के संदेह में पकड़ी गई दवाओं के असली व नकली होने की पुष्टि में ही महीनों बीत जाते हैं। ऐसे में मरीज का मर्ज बढ़ता जाए या दवा के दुष्प्रभाव से उसकी जान ही चली जाए तो इसकी परवाह भला कौन करेगा?

हमारे यहां यह ढर्रा सा हो चला है कि हर मामले में असली व नकली की जांच होने में ही काफी समय लग जाता है। मिलावट के दूसरे मामलों में भी यह लेटलतीफी सामने आती है। जब दवा की जांच के मामले में यह देरी हो तो खतरा और बढ़ जाता है। दवा का मिलता-जुलता नाम, लेबल पर किसी ऐसी कंपनी का नाम जो अस्तित्व में ही न हो और दवा के सॉल्ट ही बदले हुए हों तो यह नकली दवाइयों की श्रेणी में आती है। नकली और अमानक दवाइयों दोनों की ही बाजार में आने के काफी समय बाद जाकर मुनादी होती है कि इन दवाइयों का इस्तेमाल न करें। यह सब जानते हुए भी दवा कारोबार में हेरा-फेरी और दवा की जांच में जरा सी भी देरी से मरीजों का जीवन संकट में आ सकता है। नकली दवा बनाने वाले कभी-कभार तो पकड़े ही नहीं जाते। जो पकड़े जाते हैं उन पर भी कार्रवाई समय पर नहीं हो पाती। जाहिर है जब दवा के नकली होने की जानकारी ही देरी से मिल रही हो तो इन्हें बाजार में पहुंंचाने वालों को ज्यादा वक्त मिलने वाला है। केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) व सरकारी स्तर पर औषधि नियंत्रण विभागों की भूमिका इस मामले में ज्यादा अहम है। जरूरत इस बात की है कि दवा निर्माण से लेकर वितरण व विक्रय तकसमूची शृंखला की निगरानी तकनीक आधारित और अधिक जांच के लिए अत्याधुनिक प्रयोगशालाएं हों तथा दोषियों को कठोर दंड जैसे कदम उठाए जाएं। साथ ही दवा नियामक संस्थाओं की जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी कि किसी संदिग्ध दवा की रिपोर्ट महीनों के बजाय आठ-दस दिन में ही मिल जाए। यों तो कोई भी दवा नकली व अमानक नहीं होनी चाहिए। लेकिन कैंसर, हृदय रोग, मधुमेह या रेबीज जैसी गंभीर बीमारियों के उपचार में इनका मरीज सेवन कर ले तो परिणाम भयावह हो सकते हैं। यह समझना होगा कि उपचार विफल होने व बीमारी बढऩे की भरपाई किसी भी जांच रिपोर्ट से संभव नहीं।