
mental health
वर्ष 2013 में मैं एक अखबार में स्तंभकार थी। कुछ नया और चुनौतीपूर्ण करने की ललक में मैंने एक साथ चार अलग-अलग संपादकों के लिए कई लेख लिखने की जिम्मेदारी ले ली। तब मैं बाइपोलर डिसऑर्डर से जूझ रही थी, लेकिन मैंने अपनी मानसिक स्थिति पर ध्यान नहीं दिया और दफ्तर में इस बारे में किसी को बताया भी नहीं। दुर्भाग्य से, एक साथ कई लेखों को निपटाने का दबाव और मेरे जीवन का सबसे गंभीर मानसिक व मनोविकारी दौर, दोनों एक साथ आ खड़े हुए। मैं समय पर लेख नहीं दे पा रही थी।
आखिरकार मुझे संपादक के सामने अपनी समस्या को स्वीकार करना पड़ा। काम में विफलता के कारण मैं घबराई हुई और शर्मिंदा थी। लेकिन आशंकाओं के विपरीत संपादक ने मुझे कुछ समय की छुट्टी दे दी, जिसकी मुझे सख्त जरूरत थी। मेरा मासिक कॉलम भी निर्बाध चलता रहा। अपनी स्थिति को लेकर खुलकर बात करना और सहकर्मियों द्वारा उसकी स्वीकार्यता मेरे कॅरियर में नया मोड़ साबित हुआ। संपादकों ने मेरे काम को सराहा और मेरे प्रति लचीला रुख अपनाया। परिणामस्वरूप, मैंने अगले दस वर्षों तक उस अखबार के लिए लिखा।
इस सहयोग के कारण आगे चलकर मेरे कॉलम पर आधारित एक पुस्तक भी छपी, जिसे उस अखबार व एक प्रमुख प्रकाशक ने मिलकर प्रकाशित किया। मुझे अपना यह अनुभव भारतीय स्टार्टअप जगत में मानसिक स्वास्थ्य पर आई एक रिपोर्ट 'स्टेट ऑफ माइंड: द स्टार्टअप ईकोसिस्टमÓ पढ़ते हुए याद आया। इस रिपोर्ट का मुख्य निष्कर्ष यह था कि कार्यस्थल पर मानसिक कल्याण का सबसे गहरा संबंध मनोवैज्ञानिक सुरक्षा से है। परेशानी खुलकर साझा कर सकने वाले कर्मियों का मानसिक स्वास्थ्य स्तर दूसरों से बेहतर था। हालांकि यह निष्कर्ष केवल दोनों के बीच संबंध दर्शाता है, इसे एकमात्र कारण साबित नहीं करता। हार्वर्ड बिजनेस स्कूल की प्रोफेसर एमी एडमंडसन के अनुसार, मनोवैज्ञानिक सुरक्षा का अर्थ है कि किसी टीम के सदस्य यह विश्वास कर सकें कि गलती स्वीकार करने, सवाल पूछने या मदद मांगने पर उन्हें अपमानित नहीं किया जाएगा। मेरे लिए इसका व्यावहारिक अर्थ था कि बीमारी का एक दौर मेरे कॅरियर की संभावनाओं का अंत नहीं करेगा।
2017 में जब मैंने स्नातकोत्तर छात्रों को पढ़ाने की एक सेवा के लिए आवेदन किया, तो बायोडाटा में बाइपोलर डिसऑर्डर का उल्लेख किया। मैंने नियुक्ति अधिकारी को स्पष्ट बताया कि मैं बाइपोलर डिसऑर्डर से पीडि़त हूं और यह शिक्षण कार्य को बाधित भी कर सकता है। उन्होंने मेरी स्पष्टवादिता को सराहा और यह सही भी रहा। पहले ही सप्ताह में बीमारी का दौरा पड़ा और मुझे सेमेस्टर के बीच में ही घर लौटना पड़ा।
हालांकि मैं बाद में वापस लौटी और फिर कई वर्षों तक पढ़ाया। संवेदनशील समय में मिले इस सहयोग ने मेरे जीवन को नई दिशा दी। स्तंभ लेखन और पढ़ाने का काम थोड़ा लचीला था और मुझे भरोसा करने वाले लोग मिले। लेकिन कम अनुभव या कम पेशेवर हैसियत वाले व्यक्ति के लिए अपनी मानसिक स्थिति का खुलासा करना कहीं मुश्किल है। इसलिए सहयोग को केवल किसी संवेदनशील अधिकारी की व्यक्तिगत उदारता पर निर्भर होने की बजाय संस्थागत रूप मिलना चाहिए। रिपोर्ट में मनोवैज्ञानिक सुरक्षा बढ़ाने के कुछ व्यावहारिक उपाय सुझाए गए हैं। इनमें नियमित मानसिक स्वास्थ्य सहायता, कंपनी से बाहर किसी व्यक्ति से गोपनीय बातचीत की सुविधा और कर्मचारियों को पूर्ण विश्राम प्रदान करने वाली वास्तविक छुट्टियां शामिल हैं। निवेशकों से भी किसी कंपनी में निवेश से पहले कर्मचारियों के मानसिक कल्याण को ध्यान में रखने की सलाह दी गई है। कर्मचारियों को खुलकर बोलने के लिए प्रोत्साहित करना तभी सार्थक है, जब उन्हें सही प्रतिक्रिया मिलने का भरोसा हो। कोई व्यक्ति अपना काम अच्छी तरह कर सकता है और साथ ही मानसिक परेशानी से भी गुजर सकता है। इन दोनों सच्चाइयों को एक साथ स्वीकार करना जरूरी है। मेरे संपादक मेरी बीमारी को रोक नहीं सकते थे, लेकिन वे मुझे समय लचीलापन और काम के अवसर दे सकते थे। उनके सहयोग से मैं एक दशक तक लिखती रही, मेरी पुस्तक प्रकाशित हुई। यह सब मनोवैज्ञानिक सुरक्षा के कारण संभव हुआ।(मुंबई मिरर में प्रकाशित लेख, विशेष अनुमति से पत्रिका पाठकों के लिए)
अपर्णा पीरामल राजे, ('केमिकल खिचड़ी: हाउ आइ हैक्ड माय मेंटल हेल्थ') पुस्तक की लेखिका
Updated on:
27 Oct 2026, 7:12 PM IST
Published on:
27 Oct 2026, 7:12 PM IST
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