ओपिनियन

चारागाह प्रबंधन से ही बढ़ेगी पशुधन उत्पादकता और आय

भारत में पशुपालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था, खाद्य सुरक्षा और लाखों लोगों की आजीविका का महत्वपूर्ण आधार है, लेकिन लगातार बढ़ती चारे की कमी, चारागाह भूमि के घटते क्षेत्रफल, भूमि क्षरण और जलवायु परिवर्तन ने इस क्षेत्र के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। चारागाहों की बदहाल स्थिति का सीधा असर पशुधन की उत्पादकता और पशुपालकों की आय पर पड़ रहा है। ऐसे में चारागाहों का संरक्षण, गुणवत्तापूर्ण चारे की उपलब्धता, चरवाहों के अधिकारों की रक्षा और टिकाऊ पशुपालन के लिए समग्र एवं दीर्घकालिक नीतियों की जरूरत है।
4 min read
Aug 19, 2026
GrazingLands
GrazingLands

पशुपालन ऐतिहासिक रूप से भारत में कृषि का एक अभिन्न अंग रहा है और वर्तमान में भी प्रासंगिक है क्योंकि ग्रामीण समाज का एक बड़ा वर्ग सक्रिय रूप से कृषि कार्य में संलग्न होने के साथ इस पर निर्भर है। यह क्षेत्र देश की कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, जो खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण आजीविका और सकल घरेलू उत्पाद में महत्वपूर्ण योगदान देता है। यह क्षेत्र दुनिया की पशुधन आबादी के लगभग 20 फीसदी और मानव आबादी के 17.5 फीसदी का भरण-पोषण करता है, जो दुनिया के केवल 2.3 फीसदी भूमि क्षेत्र में है। हालांकि, इसके पैमाने और महत्व के बावजूद, भारत लगातार चारे की कमी का सामना कर रहा है। हरे चारे के लिए 35.6 फीसदी, सूखी फसल अवशेषों के लिए 10.5 फीसदी और केंद्रित फीड के लिए 44 फीसदी का अनुमान है। यह कमी पशुधन उत्पादकता को गंभीर रूप से प्रभावित करती है, जिससे दूध और मांस उत्पादन में कमी आती है और लाखों ग्रामीण आजीविका को खतरा होता है।


चारागाहों पर बढ़ता वैश्विक संकट
  गौर करने वाली बात यह है कि संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 2026 को चारागाह और पशुचारक वर्ष घोषित किया गया है। इससे जाहिर है कि वैश्विक स्तर पर चारागाह भूमियां संकटग्रस्त हैं और इन पर ध्यान देने की जरूरत है। इनका क्षेत्रफल भूमि उपयोग में बदलाव के कारण घटता जा रहा है। अति दोहन और खरपतवारों के कारण इनकी उपजाऊ क्षमता लगातार घटती जा रही है। दुनिया में चारागाह, सवाना घास के मैदान, झाड़ीदार जंगल, रेगिस्तान, पर्वतीय चरागाह, खुले वन और कृषि वानिकी क्षेत्र इसी श्रेणी में शामिल हैं। वैश्विक क्षेत्रफल का 54 फीसदी भूभाग किसी न किसी प्रकार की चारागाह भूमियों में शामिल है, जिसमें से 78 फीसदी शुष्क क्षेत्रों में स्थित हैं। एक तिहाई जैव विविधता इन्हीं क्षेत्रों पर निर्भर है। विश्व खाद्य उत्पादन का 16 फीसदी इन्हीं क्षेत्रों से आता है। चारागाह क्षेत्र भूमि को पोषक तत्व प्रदान करने के अतिरिक्त कार्बन प्रदूषण, ईको टूरिज्म और मनोरंजन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कुल चारागाह क्षेत्र का 50 फीसदी भाग अनुत्पादक होने के कगार पर है।


भारत में चारागाहों की बदहाल स्थिति
भारतवर्ष में चारागाह भूमियों का क्षेत्रफल 1210 लाख हेक्टेयर है, जिसमें से 1000 लाख हेक्टेयर अच्छी स्थिति में नहीं है और पूर्ण उपयोगिता के स्तर की भूमिका निभाने में असमर्थ है, जिसके चलते पशु चारक समुदाय हाशिए पर आते जा रहे हैं और सरकारी नीतियों में भी उनके हितों की ओर उपयुक्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है।  भारत में लगभग 13 मिलियन पशुपालक हैं, जो गुज्जर, बकरवाल, रेबारी, रायका, कुरुबा और मालधारी सहित 46 समूहों में विभाजित हैं। हालांकि, देश में लगभग ढाई करोड़ लोग पूर्णत: पशुपालन पर आजीविका के लिए निर्भर करते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे भू-मालिकों की दो तिहाई आबादी को पशुपालन से 16 फीसदी आजीविका का आधार प्राप्त होता है। भारत में कुल पशु संख्या 53 करोड़ से ज्यादा है, जिसमें से गाय, भैंस, मिथुन और याक 30 करोड़ से ज्यादा हैं। बाकी सूअर, घोड़ा, भेड़, बकरी आदि हैं। लेकिन चारागाह भूमियों के भूमि उपयोग में बदलाव, भूमि कटाव आदि से नुकसान के अलावा खरपतवार आक्रमण से भी चारागाह भूमियों को भारी नुकसान पहुंचा है। खरपतवार चारागाहों की उत्पादकता को 90 फीसदी तक नष्ट कर देते हैं। भारतीय घास-चारा अनुसंधान परिषद के एक अध्ययन में पाया गया कि देश में हरे चारे की आपूर्ति और सूखे चारे की उपलब्धता में लगातार कमी आ रही है। वहीं दूसरी तरफ, जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों जैसे अनियमित वर्षा, लंबे समय तक सूखा और बढ़ते तापमान ने मक्का, ज्वार और बरसीम जैसी महत्वपूर्ण चारा फसलों की वृद्धि और पोषण मूल्य को काफी हद तक बाधित कर दिया है। इसी कारण लोग पशुपालन से मुंह मोड़ रहे हैं। जबकि संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोकथाम की रिपोर्ट में चारागाहों और चरवाहों के बारे में साफ कहा गया है कि भारत में लाखों चारवाहों को उनके अधिकारों की बेहतर मान्यता और बाजारों तक पहुंच की आवश्यकता है।


चरवाहों के अधिकार और आजीविका
हालांकि, जलवायु परिवर्तन, जनसंख्या वृद्धि, भूमि उपयोग परिवर्तन और बढ़ती कृषि भूमि के कारण विश्व की लगभग आधी चारागाह भूमि क्षीण हो गई है। चारागाह प्रबंधन न केवल चारे के उत्पादन से जुड़ा है, बल्कि यह पशुओं के स्वास्थ्य, उत्पादकता और परजीवी नियंत्रण के लिए भी बहुत जरूरी है। चारागाह प्रबंधन कोई एक बार का काम नहीं, बल्कि नियमित योजना और निगरानी की प्रक्रिया है, जिससे किसान कम लागत में ज्यादा लाभ और स्वस्थ पशु पा सकते हैं। विश्व में हमारा स्थान बकरियों की संख्या में दूसरा,भेड़ों की संख्या में तीसरा और कुक्कुट संख्या में सातवां है। कम खर्चे में, कम स्थान और कम मेहनत से ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए छोटे पशुओं का अहम योगदान है। अगर इनसे संबंधित उपलब्ध नवीनतम तकनीकियों का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाए तो नि:संदेह ये छोटे पशु गरीबों के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।


नीतियों में समग्र दृष्टिकोण की जरूरत
 भारत की बढ़ती जनसंख्या भूमि संसाधनों पर दबाव डाल रही है। जो भूमि कभी चारागाह के लिए उपलब्ध थी, उसे अब कृषि या विकास परियोजनाओं हेतु उपयोग किया जा रहा है। चारागाह भूमि का यह विखंडन पारंपरिक प्रवास मार्गों को बाधित करता है और पशुओं के लिए भोजन की उपलब्धता को सीमित करता है। वहीं, सरकारी नीतियां कभी-कभी चरवाहों को एक ही स्थान पर बसने के लिए प्रोत्साहित करती हैं। हालांकि, यह सामाजिक सेवाओं तक पहुंच प्रदान करने के लिए लाभकारी लग सकता है, लेकिन पारंपरिक प्रवासी पैटर्न को बाधित कर सकता है और उनके पशुधन प्रबंधन की दक्षता को कम कर सकता है। कुल मिलाकर भारत का पशुधन क्षेत्र एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है, जो चारे की कमी, पर्यावरण क्षरण और जलवायु भेद्यता की बढ़ती चुनौतियों का सामना कर रहा है। गुणवत्तापूर्ण चारे की मांग और आपूर्ति के बीच लगातार अंतर पशुधन उत्पादकता, किसानों की आय और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा को सीधे तौर पर खतरे में डालता है। इस अंतर को पाटने के लिए एक समग्र और रणनीतिक दृष्टिकोण की आवश्यकता है।

Updated on:
19 Aug 2026 07:16 pm
Published on:
19 Aug 2026 06:09 pm