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आईना: बद से बदतर !

सोचिए, आप समय पर घर से निकले हैं, लेकिन आपकी मंजिल तक पहुंचना अब आपके हाथ में नहीं है। आपका रास्ता, आपका समय और आपकी पूरी दिनचर्या किसी और के फैसले की बंधक हो कर रह गई है।
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jaipur lawyer protest jam

वकीलों के विरोध प्रदर्शन और जाम का फोटो: पत्रिका

सोचिए, आप समय पर घर से निकले हैं, लेकिन आपकी मंजिल तक पहुंचना अब आपके हाथ में नहीं है। आपका रास्ता, आपका समय और आपकी पूरी दिनचर्या किसी और के फैसले की बंधक हो कर रह गई है। मंगलवार को जयपुर में हजारों लोगों के साथ यही हुआ। साढ़े दस घंटे तक आधा शहर थमा रहा, रेंगता रहा। किसी की ट्रेन छूटी, किसी की बस। बच्चे स्कूल बसों में उमस और पसीने से बेहाल होते रहे और घरों में मां-बाप उनके लौटने का इंतजार करते रहे।

दरअसल, बद से बदतर होता जा रहा है जयपुर। वकीलों और पुलिस के बीच विवाद था। वकीलों को अपनी मांगों के लिए विरोध करने का पूरा अधिकार है। लेकिन विरोध की कीमत उस आम आदमी को क्यों चुकानी पड़े, जिसका इस विवाद से कोई लेना-देना नहीं? अपनी बात मजबूती से रखिए, लेकिन ऐसा रास्ता भी होना चाहिए जिसमें शहर की जिंदगी बंधक न बने। किसी बच्चे की परेशानी, किसी यात्री की छूटी ट्रेन या किसी मरीज के इलाज में देरी उस विवाद का हिस्सा क्यों बने?

बड़ा सवाल पुलिस-प्रशासन से है। सोमवार शाम को ही साफ चेतावनी मिल चुकी थी कि मांगें नहीं मानी गईं तो मंगलवार को सड़क रोकी जाएगी। फिर भी न पर्याप्त डायवर्जन, न वैकल्पिक मार्गों की तैयारी और न समय रहते वरिष्ठ अधिकारियों की तैनाती। क्या प्रशासन को जाम लगने का इंतजार था ? जाम लगने के बाद ट्रैफिक मोड़ना व्यवस्था नहीं, मजबूरी है। प्रशासन की परीक्षा संकट के बाद नहीं, संकट से पहले होती है।

कलक्ट्रेट से कमिश्नरेट तक सड़कें ठप थीं। कोर्ट परिसर में नारेबाजी थी। दूसरी ओर टोंक रोड पर डिग्गी पदयात्रा का दबाव था। शहर की अलग-अलग नसों पर एक साथ दबाव पड़ा और पूरा ट्रैफिक सिस्टम चरमरा गया। प्रश्न है… क्या जयपुर के पास कोई समग्र ट्रैफिक प्लान है? या हर बार शहर को किसी आंदोलन, जुलूस या पदयात्रा के बाद नए रास्ते खोजकर ही चलना है? और इस सात घंटे के जाम का हिसाब कौन देगा? कितने लोग कितने घंटे सड़कों पर फंसे रहे? कितने मानव-घंटे बर्बाद हुए? कितना पेट्रोल-डीजल बेवजह जला? कितने लोगों का काम, कारोबार और जरूरी समय इस जाम की भेंट चढ़ गया? पहले से चेतावनी के बावजूद तैयारी नहीं हुई तो इस नुकसान की जिम्मेदारी किसकी है?

किसी का जुलूस हो, पदयात्रा हो, प्रदर्शन हो या वीआइपी मूवमेंट हो… सबसे पहले आम आदमी की राह रुकती है। यह अब अपवाद नहीं, पैटर्न बनता जा रहा है। आम आदमी के पास न लालबत्ती है, न पायलट गाड़ी। उसके पास सिर्फ अपना समय है और जयपुर में सबसे ज्यादा उससे उसका समय ही छीना जा रहा है।

अब शहर की योजना पर भी नए सिरे से सोचना होगा। कलक्ट्रेट और जिला न्यायालय जैसे बड़े संस्थान शहर के बीचोंबीच हैं। रोज हजारों लोग आते-जाते हैं और किसी विवाद या प्रदर्शन का असर कई किलोमीटर तक फैल जाता है। क्यों न भविष्य की जरूरतों को देखते हुए कलक्ट्रेट और जिला अदालत के लिए शहर के बाहरी हिस्से में बड़ा, सुनियोजित प्रशासनिक न्यायिक परिसर विकसित करने पर विचार हो?

चौड़ी सड़कें, पर्याप्त पार्किंग, सार्वजनिक परिवहन और ऐसी व्यवस्था कि एक परिसर की गतिविधि से पूरा जयपुर बंधक न बने।

जयपुर फैल चुका है, लेकिन हमारी ट्रैफिक सोच अब भी पुराने शहर की सीमाओं में अटकी है। आबादी बढ़ी, वाहन बढ़े, आवाजाही बढ़ी, लेकिन व्यवस्था उस गति से नहीं बढ़ी। समस्या बड़ी होती गई और समाधान छोटा पड़ता गया। चुनाव सामने हैं। इस बार नेताओं से सिर्फ सड़क, फ्लाईओवर और घोषणाओं के सवाल नहीं होने चाहिए। पूछा जाए कि जयपुर का ट्रैफिक प्लान क्या है? हर बड़े आयोजन के लिए वैकल्पिक व्यवस्था क्या होगी? अचानक सड़क बंद होने पर डायवर्जन कितनी जल्दी लागू होगा? स्कूल बसों और एम्बुलेंस को प्राथमिकता कैसे मिलेगी? अब जनता को तय करना होगा कि चुनाव में ट्रैफिक सिर्फ एक समस्या होगी या चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा !!!

veejay.chaudhary@in.patrika.com
twitter/veejaypress