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शुल्क से यूपीआइ ही नहीं, बैंकिंग को भी खतरा

यूपीआई ने बैंक खाते को करोड़ों भारतीयों के रोजमर्रा के आर्थिक जीवन से जोड़ दिया है, इसलिए इसकी लागत का समाधान सोच-समझकर करना होगा। छोटे डिजिटल भुगतानों को शुल्क से मुक्त रखते हुए बैंकिंग व्यवस्था में ग्राहकों की भागीदारी बढ़ाना ही संतुलित रास्ता होगा।
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जयपुर

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Opinion Desk

Aug 18, 2026

upi

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भारतकी डिजिटल भुगतान क्रांति को केवल तकनीकी उपलब्धि मानना उसके वास्तविक महत्व को छोटा कर देना होगा। यह उस व्यापक परिवर्तन का परिणाम है जिसमें पहले करोड़ों लोगों को औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ा गया, फिर सरकारी सहायता और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण ने बैंक खातों को सक्रिय आर्थिक माध्यम बनाया और अंतत: यूपीआइ ने उसी बैंक खाते को आम नागरिक के दैनिक जीवन का हिस्सा बना दिया। आज यूपीआइ पर हर महीने 23 अरब से अधिक लेन-देन हो रहे हैं और लगभग 30 लाख करोड़ रुपए की राशि इससे गुजर रही है। इसी संदर्भ में यूपीआइ की लागत और उस पर संभावित शुल्क की चर्चा महत्वपूर्ण हो जाती है। एक संसदीय समिति के अनुसार यूपीआइ व्यवस्था की वार्षिक परिचालन लागत लगभग 20,700 करोड़ रुपए है, जबकि इसके लिए केंद्र सरकार की सहायता करीब 2,000 करोड़ रुपए है इसलिए भविष्य में इसकी लागत को किस प्रकार वहन किया जाए, यह प्रश्न स्वाभाविक है।

हालिया विधायी बदलावों ने कुछ डिजिटल भुगतानों पर व्यापारी शुल्क की संभावित व्यवस्था का रास्ता खोला है, लेकिन इसे सीधे तौर पर यूपीआइ पर कर कहना उचित नहीं होगा और अभी सामान्य यूपीआइ भुगतान पर कोई शुल्क लागू नहीं हुआ है। असली प्रश्न यह है कि क्या यूपीआइ जैसी व्यवस्था की लागत पूरी करने के लिए ऐसी शुल्क व्यवस्था बनाई जाए जो छोटे भुगतान को प्रभावित करे। यदि ऐसा हुआ तो व्यापारी पर बढ़ी लागत का कुछ हिस्सा वस्तुओं और सेवाओं की कीमत में पहुंच सकता है और छोटे दुकानदार तथा ग्राहक दोनों प्रभावित हो सकते हैं। इससे भी बड़ा खतरा यह है कि यदि डिजिटल भुगतान महंगा महसूस होने लगा तो लोग छोटे लेन-देन में फिर नकदी का इस्तेमाल बढ़ा सकते हैं। इसी कारण भविष्य की कर व्यवस्था में सामान्य नागरिक के छोटे भुगतान और रोजमर्रा के लेन-देन को शुल्क से मुक्त रखना अधिक विवेकपूर्ण होगा। यदि राजस्व जुटाना आवश्यक हो तो उच्च मूल्य वाले चुनिंदा वाणिज्यिक भुगतानों पर सीमित शुल्क की व्यवस्था पर विचार किया जा सकता है, लेकिन छोटे भुगतानों को उससे अलग रखना जरूरी होगा। यूपीआइ की लागत का समाधान ऐसा होना चाहिए जो उसकी वित्तीय स्थिरता बनाए रखे, लेकिन उसकी सबसे बड़ी ताकत, सहज और कम लागत वाला भुगतान, समाप्त न करे। यह भी ध्यान रखना होगा कि यूपीआइ को केवल एक भुगतान सुविधा के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह करोड़ों लोगों के दैनिक आर्थिक व्यवहार का माध्यम बन चुका है। इसलिए इसकी कर व्यवस्था का उद्देश्य केवल राजस्व जुटाना नहीं, बल्कि इस व्यवस्था की पहुंच और निरंतरता को बनाए रखना भी होना चाहिए। इसका संबंध सीधे भारतीय बैंकों के भविष्य से भी है। यदि शुल्क या कर के कारण लोग छोटे भुगतानों के लिए फिर नकदी की ओर लौटते हैं तो यह केवल यूपीआइ के लिए नुकसान नहीं होगा।

बैंकिंग व्यवस्था भी उस ग्राहक से दूर हो सकती है जिसे वर्षों की कोशिश से औपचारिक वित्तीय तंत्र में लाया गया है। नकदी में लौटने वाला ग्राहक फिर अपने दैनिक आर्थिक व्यवहार को बैंक खाते और डिजिटल माध्यम से कम जोड़ सकता है। पिछले कुछ सालों में एक बड़ा बदलाव यह हुआ है कि बैंक के पास ग्राहक का पैसा है, पर ग्राहक का दैनिक भुगतान व्यवहार बैंक के बजाय यूपीआइ मंचों के साथ जुड़ गया है। भारतीय स्टेट बैंक के अध्यक्ष सी.एस. शेट्टी की यह स्वीकारोक्ति कि बैंक ने डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण अवसर गंवाया और अब 'योनोÓ के माध्यम से 'फोनपेÓ तथा 'गूगल पेÓ जैसे मंचों से मुकाबला करने की कोशिश कर रहा है, इसी बदलाव को सामने रखती है। यह केवल एक बैंक की रणनीतिक चूक नहीं, बल्कि पूरे बैंकिंग क्षेत्र के लिए आत्ममंथन का विषय है।

इस परिवर्तन की जड़ें वर्ष 2014 के बाद की वित्तीय यात्रा में हैं। प्रधानमंत्री जन-धन योजना ने करोड़ों लोगों को औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ा। जुलाई 2026 तक जन-धन खातों की संख्या 58.77 करोड़ से अधिक हो चुकी थी और इनमें 3.12 लाख करोड़ रुपए से अधिक जमा थे। प्रत्यक्ष लाभ अंतरण ने इन खातों को सक्रिय किया और यूपीआइ ने उन्हें रोजमर्रा के भुगतान से जोड़ दिया। दिहाड़ी मजदूर की आय खाते में आती है, उसी खाते से किराना, चाय, ऑटो, बच्चों की फीस और दूसरी जरूरतों का भुगतान होता है। बैंक इस पूरी प्रक्रिया की आधारभूत व्यवस्था में मौजूद है, लेकिन ग्राहक की नजर में सामने यूपीआइ का मंच है। जून 2026 में 'फोनपेÓ की यूपीआइ लेन-देन में हिस्सेदारी लगभग 46 प्रतिशत, 'गूगल पेÓ की करीब 33 प्रतिशत और 'पेटीएमÓ की लगभग 8 प्रतिशत थी। दो प्रमुख मंचों के पास लगभग 79 प्रतिशत लेन-देन होना यह बताता है कि ग्राहक की डिजिटल आदत कितनी तेजी से कुछ मंचों पर केंद्रित हो गई है। बैंकिंग के लिए चुनौती अब केवल भुगतान वापस पाने की नहीं, बल्कि ग्राहक के दैनिक आर्थिक व्यवहार में अपनी उपस्थिति वापस स्थापित करने की भी है। बैंकिंग की वास्तविक वापसी केवल अपना भुगतान अनुप्रयोग विकसित करने से नहीं होगी। उसे ग्राहक के रोजमर्रा के वित्तीय जीवन में फिर उपयोगी, सरल और भरोसेमंद बनना होगा। भुगतान के साथ बचत, निवेश, ऋण, बीमा और अन्य वित्तीय सेवाओं को एक सहज डिजिटल अनुभव में जोडऩा होगा। यदि यूपीआइ पर शुल्क लगता है तो बैंकों के सामने दोहरी चुनौती होगी। एक ओर उन्हें यूपीआइ के साथ अपनी खोई हुई भूमिका वापस लेनी होगी और दूसरी ओर उन ग्राहकों को फिर डिजिटल वित्तीय व्यवहार की ओर लाना होगा जो सुविधा या लागत के कारण नकदी को बेहतर विकल्प मानने लगेंगे।

यूपीआइ की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं है कि उसने भुगतान को तेज कर दिया, उसकी असली उपलब्धि यह है कि उसने बैंक खाते को आम भारतीय के दैनिक आर्थिक जीवन का हिस्सा बना दिया। इसलिए इसकी लागत का समाधान ऐसी कर व्यवस्था से नहीं होना चाहिए जो इसी उपलब्धि को कमजोर कर दे। भारत को ऐसा रास्ता चुनना होगा जिसमें यूपीआइ की आर्थिक स्थिरता भी बनी रहे, छोटे भुगतान सामान्य नागरिक के लिए नि:शुल्क रहें और बैंकिंग संस्थाएं ग्राहक के डिजिटल आर्थिक जीवन में अपनी खोई हुई जगह फिर हासिल करें। आवश्यकता इस बात की है कि वापस नकदी की ओर जाने के बजाय अगला कदम बैंकिंग और डिजिटल वित्तीय व्यवहार को और गहरा करने की दिशा में हो।