
ProgressiveSociety
हर युग अपनी पहचान कुछ विचारों और कुछ शब्दों से बनाता है। हमारे समय के सबसे चर्चित शब्द हैं- समता, समानता और स्वतंत्रता। यह सुखद संकेत है कि आज का युवा समाज अपने अधिकारों के प्रति पहले से कहीं अधिक जागरूक है। विशेष रूप से युवतियां शिक्षा, रोजगार, नेतृत्व और निर्णय-निर्माण के प्रत्येक क्षेत्र में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। यह परिवर्तन उत्साहवर्धक अवश्य है, किंतु इसके साथ कुछ वैचारिक चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं। सबसे बड़ी चुनौती शायद यह है कि नई पीढ़ी समता और समानता, तथा स्वतंत्रता और स्वच्छंदता के बीच की उस महीन रेखा को पहचानने में चूक रही है, जो किसी भी सभ्य समाज की आत्मा होती है।
समानता और समता में अंतर समझना जरूरी
समानता का अर्थ है- समान अधिकार, समान अवसर और समान सम्मान। यह प्रत्येक लोकतांत्रिक व्यवस्था की आधारशिला है। किंतु समता केवल समानता का दूसरा नाम नहीं है। समता का अर्थ है- ऐसी न्यायपूर्ण व्यवस्था, जो व्यक्ति, परिस्थिति और सामाजिक यथार्थ को समझते हुए निर्णय करे। समानता सबको एक जैसा देखने का आग्रह करती है, जबकि समता सबके साथ न्याय करने का। दुर्भाग्य से आज समानता की व्याख्या कई बार इस रूप में होने लगी है कि यदि पुरुष कोई व्यवहार कर सकते हैं, तो स्त्रियों को भी वही करना चाहिए। प्रश्न यह नहीं पूछा जाता कि वह व्यवहार उचित भी है या नहीं। यहीं स्वतंत्रता और स्वच्छंदता के बीच का अंतर समझना आवश्यक हो जाता है।
स्वतंत्रता अधिकार है, स्वच्छंदता नहीं
स्वतंत्रता मनुष्य को अधिकार देती है, पर साथ ही उत्तरदायित्व भी सौंपती है। स्वच्छंदता केवल इच्छा को सर्वोच्च मानती है। स्वतंत्रता विवेक से संचालित होती है, स्वच्छंदता आवेग से। स्वतंत्रता समाज का निर्माण करती है, जबकि स्वच्छंदता धीरे-धीरे सामाजिक मर्यादाओं का क्षरण करती है। आज यदि कोई युवक नशे को आधुनिकता का प्रतीक मानता है, सार्वजनिक जीवन में अपशब्दों का प्रयोग करता है या अभद्र व्यवहार को निर्भीकता समझता है, तो क्या वही आचरण किसी युवती द्वारा अपनाया जाना समानता कहलाएगा? क्या किसी अवगुण में बराबरी सामाजिक प्रगति का संकेत हो सकती है? मुझे लगता है, इसका उत्तर स्पष्ट है-नहीं। नशा स्त्री और पुरुष में भेद नहीं करता। वह दोनों की चेतना को समान रूप से क्षीण करता है। अभद्र भाषा किसी पुरुष के व्यक्तित्व को भी छोटा करती है और किसी स्त्री की गरिमा को भी। उच्छृंखल व्यवहार किसी एक वर्ग का नहीं, पूरे समाज के सांस्कृतिक वातावरण का अवमूल्यन करता है। इसलिए स्वच्छंदता पुरुष हो या स्त्री-दोनों के लिए समान रूप से घातक है।
बराबरी अवगुणों में नहीं, श्रेष्ठताओं में हो
यहां एक और प्रश्न विचारणीय है। क्या समता का अर्थ यह है कि हम पुरुषों की प्रत्येक आदत को स्त्रियों का अधिकार घोषित कर दें? यदि कोई प्रवृत्ति स्वयं पुरुषों के लिए भी अनुकरणीय नहीं है, तो उसे समानता के नाम पर स्वीकार कर लेना समता नहीं, बल्कि मानकों को नीचे ले जाना है। समता का उद्देश्य उत्कृष्टता में साझेदारी है, अवगुणों में नहीं। किसी समाज की प्रगति इस बात से तय नहीं होती कि उसमें कितने लोग गलत आदतों को अपनाने के लिए स्वतंत्र हैं, बल्कि इससे होती है कि कितने लोग बेहतर मूल्यों को अपनाने के लिए समान अवसर प्राप्त कर रहे हैं।
अधिकारों के साथ जिम्मेदारी भी जरूरी
भारतीय चिंतन ने स्वतंत्रता को कभी मर्यादा से अलग करके नहीं देखा। हमारे यहां अधिकारों के साथ कर्तव्य, स्वतंत्रता के साथ आत्मसंयम और शक्ति के साथ उत्तरदायित्व की चर्चा समान रूप से की गई है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में स्वतंत्रता का सर्वोच्च रूप आत्मानुशासन माना गया है। इसका अर्थ यह नहीं कि बेटियों के अधिकार सीमित किए जाएं। उन्हें शिक्षा, अवसर, निर्णय, संपत्ति, नेतृत्व और सार्वजनिक जीवन में पूर्ण सम्मान और समान भागीदारी मिलनी ही चाहिए। साथ ही, बेटों को भी यह सीखना होगा कि सम्मान, संवेदनशीलता और संयम ही वास्तविक पुरुषार्थ हैं। एक सुरक्षित समाज केवल कानून से नहीं, बल्कि संस्कारों से निर्मित होता है।
विवेकपूर्ण स्वतंत्रता ही सभ्य समाज की पहचान
नई पीढ़ी से अपेक्षा यह नहीं कि वह प्रश्न पूछना छोड़ दे। प्रश्न पूछना प्रगति का संकेत है। अपेक्षा केवल इतनी है कि वह यह भी पूछे- जिस व्यवहार को मैं अपना अधिकार मान रहा हूं, क्या वह वास्तव में मेरे व्यक्तित्व को ऊंचा उठाता है? सभ्यता का विकास अधिकारों के विस्तार से जितना होता है, उतना ही आत्मसंयम के विस्तार से भी होता है। इसलिए आज आवश्यकता केवल समानता की नहीं, बल्कि समता की है; केवल स्वतंत्रता की नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण स्वतंत्रता की है। क्योंकि समानता का अर्थ एक-दूसरे की कमजोरियों की नकल करना नहीं, बल्कि एक-दूसरे की श्रेष्ठताओं तक पहुंचने का समान अवसर प्राप्त करना है। यही समता का सार है, यही स्वतंत्रता की गरिमा है और यही किसी भी सभ्य समाज की वास्तविक पहचान है।
Updated on:
14 Aug 2026 06:53 pm
Published on:
14 Aug 2026 06:52 pm
