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Patrika Podcast: शिशु ही भगवान

सृष्टि की ओर उन्मुख जीव अविद्या के गर्भ में विद्या भाव को साथ लेकर पैदा होता है। वही पुन: जब मुक्तिसाक्षी भाव में आता हैं, तब उसके अविद्या के आवरण हट जाते हैं और विद्या भाव प्रस्फुटित हो जाता है। ब्रह्माण्ड शृंखला में सुनें पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी का यह विशेष लेख- शिशु ही भगवान
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भारत

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Opinion Desk

Aug 14, 2026

sharir hi brahmand

sharir hi brahmand

Gulab Kothari Article शरीर ही ब्रह्माण्ड:ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:- कृष्ण का यह उद्घोष प्रमाण है कि सभी प्राणियों में ईश्वर का अंश विद्यमान है। इस दृष्टि से सभी ईश्वर है। सृष्टि में यह ईश्वरांश कब किस प्राणी में कैसे प्रस्फुटित होगा, यह भी ईश्वर की ही महिमा होती है। अव्यय-अक्षर व क्षर के साथ परात्पर की अद्र्धमात्रा से युक्त ईश्वरांश में विद्या और अविद्या दोनों भाव साथ ही रहते हैं।

पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी की बहुचर्चित आलेखमाला है - शरीर ही ब्रह्माण्ड। इसमें विभिन्न बिंदुओं/विषयों की आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से व्याख्या प्रस्तुत की जाती है। गुलाब कोठारी को वैदिक अध्ययन में उनके योगदान के लिए जाना जाता है। उन्हें 2002 में नीदरलैन्ड के इन्टर्कल्चर विश्वविद्यालय ने फिलोसोफी में डी.लिट की उपाधि से सम्मानित किया था। उन्हें 2011 में उनकी पुस्तक मैं ही राधा, मैं ही कृष्ण के लिए मूर्ति देवी पुरस्कार और वर्ष 2009 में राष्ट्रीय शरद जोशी सम्मान से सम्मानित किया गया था। 'शरीर ही ब्रह्माण्ड' शृंखला में प्रकाशित विशेष लेख पढ़ने के लिए क्लिक करें नीचे दिए लिंक्स पर-


शरीर ही ब्रह्माण्ड:मां है भगवती


आत्मप्रकाश ही भगवत्ता


श्रद्धा है माया का प्रतिबिम्ब


शरीर ही ब्रह्माण्ड:भिन्न है ईश्वर और जीव की कामना


शरीर ही ब्रह्माण्ड:माया: ब्रह्म की संचालक