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शरीर ही ब्रह्माण्ड : माया : ब्रह्म की संचालक

माया कामना है- कामना ही अंधकार है। माया भी अंधकार है। अंधकार में सारे भेद ढक जाते है। माया के अंधकार से कामना ही इच्छित वस्तु लेकर आती है। प्राण हमारा ब्रह्म है- श्वास कामना है। असुर रात के राजा हैं, प्रकाश में नहीं रह सकते।
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जयपुर

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Gulab Kothari

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गुलाब कोठारी

Jul 11, 2026

Sharir Hi Brahmand July Article

फोटो: पत्रिका

यह कोरी कल्पना ही हो सकती है कि सृष्टि के आरंभ में ब्रह्म अकेला था। सिद्धान्त कहता है कि अग्नि और सोम दोनों एक-दूसरे के बिना प्रतिष्ठा नहीं पा सकते। भले ही ब्रह्म हो। ब्रह्म आग्नेय पुरुष है। बिना खुराक के अस्तित्व ही कहां टिकेगा? सोम था- वही माया रूप था क्योंकि चारों ओर अंधकार था। सोम काला होता है। अग्नि का अन्न भी है और अग्नि को घेरकर भी रहता है। सोम ही सृष्टि का प्रवर्तक है। अत: विष्णु को सृष्टि का जनक भी कहते हैं और पोषक भी।


दूसरी बात यह है कि वह सत भी है- प्राण रूप है। असत भी है क्योंकि प्राण में दूसरा प्राण नहीं होता। प्रलयकाल में भी सृष्टि के सारे तत्त्व तो उपलब्ध रहते ही हैं। स्वयं क्षीर सागर के अधिष्ठाता विष्णु, अग्नि प्राण रूप वहां शयन करते हैं। सोम उनका ही शुक्र रूप सृष्टि बीज है। ऋताग्नि में मातरिश्वा वायु द्वारा ऋत सोम की आहुति से ही प्रथम सत्य- ब्रह्मा का निर्माण कहा है। ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र (महेश) तो विष्णु के हृदय रूप में वहां प्रतिष्ठित हैं ही।


जल है, जलों का राजा वरुण है। असुरों का साम्राज्य है। वरुण असुरों के राजा भी हैं। महिष वाक् भी है। दुर्गा सप्तशती में देवी का सारा युद्ध प्रपंच इस अंधकार रूप असुर प्रांत का ही है। गर्भकाल में भी जीव की यही स्थिति रहती है। वही विष्णु ही गर्भ में होता है। 'ममैवांशो जीवलोके..।' विष्णु हैं तो लक्ष्मी भी होगी। ब्रह्मा-महेश के साथ सरस्वती और काली (हृद-प्राण) भी होगी। जब तक शिशु भूमि पर नहीं आ जाता, असुरों के आतंक का डर बना ही रहता है। इसके लिए कितने संस्कार/अनुष्ठान किए जाते हैं। योगमाया के लिए रात्रि जागरण तक किया जाता है।


माया कामना है- कामना ही अंधकार है। माया भी अंधकार है। अंधकार में सारे भेद ढक जाते है। माया के अंधकार से कामना ही इच्छित वस्तु लेकर आती है। प्राण हमारा ब्रह्म है- श्वास कामना है। असुर रात के राजा हैं, प्रकाश में नहीं रह सकते। ज्ञान के प्रकाश में अविद्या नष्ट हो जाती है। माया के आवरण में ब्रह्म भी ढका रहता है। इसी को द्वैत कहा जाता है। आप चाहें तो अद्वैत कह लें। दोनों एक साथ तो कभी दिखाई नहीं देते।


यह द्वैत भाव ही सृष्टि की इकाई है। इसी को अद्र्धनारीश्वर कहा जाता है। पुरुष भी आधी स्त्री और स्त्री भी आधा पुरुष। दोनों अभेद हैं। केवल पार्थिव धरातल पर आकृति भेद है। पुरुष रूप वर्षा-जल है और स्त्री रूपा पृथ्वी। सारे पुरुष, सारी स्त्रियां समान दिखाई देते हैं। पृथ्वी पर इनकी संतानें भिन्न-भिन्न आकृति लिए होती हैं। जीव रूप में अव्यय पुरुष का मन-श्वोवसीयस मन- भी सबका एक रूप है। इसके केन्द्र में भी परात्पर रूप में ब्रह्म-माया का युगल ही है।


ब्रह्म-माया का यह युगल ही सम्पूर्ण जीवात्मा रूप सृष्टि का केन्द्र होता है। युगल सृष्टि में ब्रह्म पुरुष शरीर में चला जाता है। स्त्री शरीर में माया की प्रधानता रहती है। अव्यय ब्रह्म-माया का स्थान है। अक्षर महामाया अथवा परा प्रकृति का तथा क्षर शरीर प्रकृति (अपरा) का क्षेत्र है। अव्यय मात्र आलम्बन है। अक्षर रूप जीवात्मा ही जीवन का आधार बनता है। हृदय रूप-ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र की तीनों शक्तियां क्रमश: सरस्वती, लक्ष्मी और काली भी साथ प्रतिष्ठित रहते हैं। स्थूल शरीर में मन-बुद्धि-अहंकार रहते हैं।


स्थूल शरीर पशुवत कार्य करता है। अन्नमय कोश है। विवाह पूर्व- ब्रह्मचर्याश्रम-स्थूल शरीर ही प्रधानता लिए रहता है। यही अपरा प्रकृति का कार्य क्षेत्र है। इसका सम्बन्ध परा से रहता है। कामना मन का अदृश्य क्षेत्र है। मन की कामना के अनुसार प्राण गतिमान होकर शरीर को कर्म में लगाते हैं। इस काल में व्यक्ति निर्माण करता है। शरीर को पुष्ट करता है, ज्ञानार्जन करता है तथा स्वयं पर ही केन्द्रित रहता है। विद्या-अविद्या दोनों काम करते हैं। साधारण स्थिति में पुरुष अपने प्रकृति भाव को पुष्ट करने का प्रयास नहीं करता। स्त्री दोनों भावों का विकास करती है। वह ईश्वर से प्रार्थना रूप में अपने अक्षर भाव के साथ जोड़े रखती है। उसकी एक आंख भावी जीवन पर भी रहती है। उसे ज्ञान है कि विवाह के बाद अन्य पुरुष के लिए जीना पड़ेगा। उसका माया भाव सदा जाग्रत रहता है। मानस रूप से सदा ब्रह्म का विवर्त बनाना ही उसकी प्राथमिकता है।


उसका यही संकल्प उसके जीवन को भीतर से प्रेरित करता रहता है। विवाह के समय उसकी सौम्य काया के साथ-साथ संकल्पित पौरुष जाता है। अत: वह अपने पौरुष रूप में पति के सौम्य भाव के साथ जीना चाहती है। उसका प्रेम चाहती है। अब उसका चित्त शरीर पर नहीं, विवर्त पर होता है। अक्षर शरीर के सूक्ष्म धरातल से माया के घोड़े दौड़ पड़ते हैं। शब्द ठहर जाते हैं। जीवात्मा से तो दोनों एकाकार ही हैं, किन्तु कामना स्त्री की प्रबल होती है।

माया का उद्देश्य अपनी भूमिका का निभाना है। उसके अन्तर्रात्मा में यह संकल्प प्रज्वलित रहता है। अत: उसकी भोग दृष्टि नहीं रहती। शिक्षित समाज में जीवात्मा का कोई अस्तित्व नहीं होता। अत: शुद्ध पशुभाव में ही साथ रहता है। पशुवत भीतर आत्मा सम्पूर्ण क्रिया में सुप्त रहता है। स्थूल क्रिया परिणाम शून्य रह जाती है। देरी से विवाह करना भी दूसरा बड़ा कारण बन जाता है। अनिच्छा से माया सुप्त ही रहती है। दोनों की सहमति पहली शर्त है।


ब्रह्म का संचालन माया के हाथ है, परा-अपरा प्रकृति नहीं कर सकती। अत: पूर्ण मनोयोग अनिवार्य है। यहां स्त्री की भूमिका प्रधान हो जाती है। इस भूमिका के लिए तो यहां आई है। ईश्वर (अव्यय) से मांगती है, जीवात्मा से (पति) भी मांगती है। स्वयं प्रयास करती है, पति की सम्पूर्ण आकृति एकत्र करने का, शुक्र के साथ आत्मा के अंश प्राप्ति का, जिसमें पितृ संस्था समाहित रहती है। भीतर माया भाव से ब्रह्मांश लाने का। तीनों शरीरों का सम्पूर्ण यात्राक्रम पूरा करके ब्रह्मांश को स्वयं के भीतर प्रतिष्ठित करती है। यह एकपक्षीय कार्य है।


दूसरे पक्ष में पुन: ब्रह्मांश पर चढ़े सारे आवरण हटाना है। भीतर शुक्र से शुक्राणुओं की शोणिताग्नि में आहुति, शेष शुक्राणु (एक-दो) को आगे मार्ग प्रदान करना। अन्तिम चरण में पुन: ब्रह्मांश (पुंभ्रूण) और स्त्री भ्रूण (डिंब) की युक्ति, जहां परात्पर रूप ब्रह्म-माया अद्वैत भाव में आकर नई सृष्टि के निर्माण की ओर अग्रसर होते हैं।


योनि कोई भी हो- युगल सृष्टि का सिद्धान्त वही है। परात्पर रूप ब्रह्म-माया ही सारी योनियों के मूल में रहते हैं। न बीज बदलता है, न ही धरती। माया ही ब्रह्म का स्थानान्तरण संचालित करती है।

क्रमश: gulabkothari@epatrika.com