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लगातार छठे वर्ष देश भर में कई अपराध के मामलों में राजस्थान का नाम शीर्ष पर होना सचमुच शर्मनाक है। सोचनीय तथ्य यह भी है कि इस अपराध में न्याय की सबसे अहम कड़ी डीएनए जांच खुद संदेह, सुस्ती और अव्यवस्था की शिकार हो चुकी है। जाहिर है, जब वैज्ञानिक प्रमाण समय पर अदालत तक नहीं पहुंचते, तब पीड़िता को न्याय दिलाने की प्रक्रिया ही बाधित होने के साथ कमजोर पड़ जाती है। ऐसे में अपराधियों का बच निकलना आसान हो जाता है। 15 हजार से अधिक डीएनए सैंपलों का लंबित होना केवल एक आंकड़ा नहीं है। यह उन हजारों पीड़िताओं का दर्द है, जो वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा में अदालतों, पुलिस थानों और सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रही हैं।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस देरी के फेर में कई सैंपल जांच योग्य ही नहीं रह जाते। मेडिकल प्रक्रिया के दौरान लापरवाही, सैंपलों का सही संरक्षण नहीं होना, प्रशिक्षित कर्मचारियों की कमी और 'चेन ऑफ कस्टडी' का टूटना सीधे तौर पर न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करता है। जब वैज्ञानिक साक्ष्य दूषित हो जाते हैं, तब अदालतों में संदेह का लाभ आरोपी को ही मिलता है। राज्य की सात फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं में से केवल तीन में डीएनए परीक्षण होना भी गंभीर विषय है।
हर महीने लगभग 700 नए मामले आने के बावजूद संसाधनों का विस्तार नहीं होना प्रशासनिक प्राथमिकताओं पर सवाल खड़ा करता है। इस संकट को और गहरा करता है हाल ही में सामने आया डीएनए किट खरीद घोटाला। जब संवेदनशील मामलों की जांच में इस्तेमाल होने वाली किट कथित रूप से 11 गुना अधिक कीमत पर खरीदी जाएं तब जनता का विश्वास केवल संस्थाओं से नहीं, बल्कि पूरी न्याय प्रक्रिया से डगमगाने लगता है। सरकार को फॉरेंसिक ढांचे का विस्तार, प्रशिक्षित मानव संसाधन, सैंपल संग्रह की मानकीकृत प्रक्रिया, जवाबदेही और समयबद्ध जांच को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। आवश्यकता स्थायी वैज्ञानिकों, आधुनिक उपकरणों और जिला स्तर तक सुदृढ़ फॉरेंसिक नेटवर्क की भी है।
आशीष जोशी: ashish.joshi@in.patrika.com
Updated on:
14 Jul 2026 02:31 pm
Published on:
11 Jul 2026 06:30 am
