
plastic problems
डॉ. रिपुन्जय सिंह पूर्व सदस्य, (राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड)
प्लास्टिक प्रदूषण पृथ्वी, मानव स्वास्थ्य, जैव विविधता और जलवायु के लिए गंभीर संकट बन चुका है। प्लास्टिक ने जीवन आसान बनाया, लेकिन इसका अत्यधिक उपयोग अब पर्यावरणीय चुनौती बन गया है। आज विज्ञान और तकनीक के विकास के बावजूद पृथ्वी पर प्रतिवर्ष 40 करोड़ टन से अधिक प्लास्टिक का उत्पादन हो रहा है। इसका बड़ा हिस्सा कचरे में बदलकर नदियों, महासागरों, खेतों, भूजल और मानव शरीर तक माइक्रोप्लास्टिक के रूप में पहुंच रहा है।
वर्तमान वैश्विक व्यवस्था को 'वैश्विक प्लास्टिक खेल' कहना गलत नहीं होगा। यह ऐसा खेल है जिसमें विकसित देश उपभोग करते हैं, कचरा पैदा करते हैं, फिर उसे दूसरे देशों को निर्यात कर स्वयं को स्वच्छ घोषित कर देते हैं। प्रदूषण का वास्तविक बोझ उन देशों पर डाल दिया जाता है जिनकी पर्यावरणीय और प्रशासनिक क्षमता अपेक्षाकृत सीमित है। यह व्यवस्था न केवल पर्यावरणीय अन्याय है, बल्कि वैश्विक उत्तरदायित्व की अवधारणा के भी विपरीत है।
अमरीका प्रति व्यक्ति प्लास्टिक कचरा उत्पन्न करने वाले देशों में अग्रणी है। यूनाइटेड किंगडम हर वर्ष लगभग 6.75 लाख टन प्लास्टिक कचरे का निर्यात करता है। तुर्किये और मलेशिया जैसे देश विदेशी प्लास्टिक कचरे के बड़े आयातक हैं, जहां सीमित पुनर्चक्रण क्षमता के कारण प्रदूषण बढ़ा है। वहीं स्वीडन ने कचरे से ऊर्जा उत्पादन की प्रभावी व्यवस्था विकसित की है। बांग्लादेश ने 1998 की बाढ़ के बाद प्लास्टिक थैलियों से जल निकासी प्रभावित होने पर वर्ष 2002 में पतली प्लास्टिक थैलियों पर प्रतिबंध लगाया। भारत का सिक्किम भी 1998 में प्लास्टिक प्रतिबंध लागू करने वाले अग्रणी राज्यों में शामिल था। ये उदाहरण बताते हैं कि पर्यावरण संरक्षण के लिए दूरदर्शी नीतियां जरूरी हैं। प्लास्टिक प्रदूषण केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं है, बल्कि यह स्वास्थ्य, जल सुरक्षा, कृषि, खाद्य सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन से भी जुड़ा है। इसके समाधान के लिए नई तकनीकें उम्मीद जगाती हैं। आयरलैंड ने चुंबकीय द्रव प्रणाली विकसित की है, जो पानी से लगभग 88 प्रतिशत तक माइक्रोप्लास्टिक हटाने में सक्षम है।
हमारी पीढ़ी ने कचरे की विरासत छोड़ी है, लेकिन नई पीढ़ी रचनात्मक सोच से समाधान खोज रही है। भारत के तीन किशोरों ने इमली के बीजों से तैयार प्राकृतिक पाउडर द्वारा माइक्रोप्लास्टिक हटाने की तकनीक विकसित कर वैश्विक अर्थ प्राइज प्राप्त किया। इन उपलब्धियों ने सिद्ध कर दिया कि समाधान केवल बड़ी प्रयोगशालाओं में ही नहीं, बल्कि विद्यालयों और युवा मस्तिष्कों में भी जन्म लेते हैं। इस संकट के समाधान के लिए शुरुआत प्लास्टिक के उपयोग को कम करने से होगी। कपड़े के थैले, स्टील की बोतलें, पुन: भरने योग्य कंटेनर और जैव-अवक्रमणीय विकल्प अपनाने होंगे। घरों, कार्यालयों और संस्थानों में गीले और सूखे कचरे का पृथक्करण आवश्यक है। साथ ही, विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व व्यवस्था को प्रभावी बनाना जरूरी है, जिसमें कंपनियों को अपने पैकेजिंग कचरे की जिम्मेदारी उठानी होगी। इसके लिए डिजिटल निगरानी, स्वतंत्र ऑडिट और कठोर कार्रवाई आवश्यक है। अवैध प्लास्टिक उत्पादन और एकल-उपयोग प्लास्टिक पर सख्ती, उत्पादकों की जवाबदेही और स्थानीय निकायों को पर्याप्त संसाधन देना होगा। आवश्यकता यह है कि नीति, प्रौद्योगिकी, उद्योग और नागरिक सुविधाएं साझा राष्ट्रीय संकल्प के साथ आगे बढ़ें।
प्लास्टिक मुक्ति पर हमें केवल कपड़े का थैला लेकर घर से निकलने का संकल्प ही नहीं लेना है, बल्कि एक व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा बनाना है। भविष्य उन देशों का नहीं होगा जो अपना कचरा दूसरों के यहां भेज देंगे, बल्कि उन देशों का होगा जो न्यूनतम कचरा उत्पन्न करेंगे, अधिकतम पुन: उपयोग करेंगे और नवाचार को प्रदूषण पर विजय का माध्यम बनाएंगे। सरकार कठोर कानून लागू करे, उद्योग अपनी जवाबदेही स्वीकार करें, वैज्ञानिक नई तकनीक विकसित करें, शैक्षणिक संस्थान नवाचार को बढ़ावा दें और नागरिक अपनी जीवनशैली में परिवर्तन लाएं।
Updated on:
10 Jul 2026 05:01 pm
Published on:
10 Jul 2026 05:01 pm
