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संपादकीय: अपनी सोच में बेटियों के हक को करें शामिल

धारणा यह भी बनने लगती है कि बेटी की शादी होने के बाद वह अपने पति के परिवार की सदस्य बन जाती हैं इसलिए अपने पीहर पक्ष की पैतृक संपत्ति से उसका नाता टूट सा गया है।
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daughters right

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कानूनी प्रावधान होने के बावजूद हमारे यहां बेटियों के संपत्ति अधिकारों को लेकर कानूनी लड़ाइयां बढ़ती जा रही हैं। आए दिन ऐसे मामले अदालतों में पहुंंचने लगे हैं जहां बेटियों को पैतृक संपत्ति में उनके अधिकार से वंचित किया जा रहा है। ऐसे ही एक विवाद में आंध्रप्रदेश हाईकोर्ट ने बेटियों के पक्ष में एक अहम फैसला देते हुए कहा है कि पिता पैतृक संपत्ति में बेटी के हिस्से को उसकी सहमति के बिना किसी अन्य को हस्तांतरित नहीं कर सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पिता त्यागपत्र (रिलिंक्विशमेंट डीड) पर हस्ताक्षर कर अपनी बेटी के पुश्तैनी संपत्ति में हिस्से को उसके भाई के नाम नहीं कर सकता।

हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम २००५ के तहत बेटियों को पैतृक संपत्ति में बेटों के समान ही बराबर के अधिकार दिए गए हैं। बेटियां जन्म से ही इसकी हकदार होती हैं और विवाह के उपरांत भी उन्हें इस हक से वंचित नहीं किया जा सकता। दरअसल, बेटियों को संपत्ति का अधिकार देने व इससे वंचित रखने का मुद्दा कानूनी प्रावधानों से भी ज्यादा सामाजिक सोच से जुड़ा है। यह ऐसी सोच है जिसमें बेटियों को पराया धन कहा जाता रहा है। पारिवारिक विवाद न हो, इसे देखते हुए आज भी सामाजिक रूप से बेटियां अपने पिता के घर से जुड़ीं पैतृक संपत्ति के बंटवारे के अपने अधिकारों को लेकर दावा करने में संकोच करती हैं। इसीलिए अधिकांश मामलों में बंटवारे की स्थिति में भी वे अपना हक छोडऩे की सहमति भी दे देती हैं। दूसरी तरफ परिवारों में भी बेटियों को लेकर यह अपेक्षा की जाने लगी है कि विवाह में उपहार आदि देने के बाद वे स्वाभाविक रूप से अपना हक छोड़ देंगी। धारणा यह भी बनने लगती है कि बेटी की शादी होने के बाद वह अपने पति के परिवार की सदस्य बन जाती हैं इसलिए अपने पीहर पक्ष की पैतृक संपत्ति से उसका नाता टूट सा गया है। सच तो यह भी है कि हमारे समाज में कभी बेटियों के इस हक की चिंता को गंभीरता से लेने पर विचार ही नहीं किया गया। आज भी अदालतों में ऐसे वे ही विवाद पहुंचते हैं जहां किसी न किसी वजह से पारिवारिक रिश्तोंं में खटास आना शुरू होती है। अदालतों तक ऐसे विवाद पहुंचना और बेटियों को उनके हक से वंचित करना सचमुच चिंताजनक है।

कानून ने जब बराबरी का हक दिया है तो बेटियों को उनका यह हक मिले इसकी चिंता परिवारों में करनी ही होगी। बेटी के जन्म के साथ ही सोच रखनी होगी कि वह पैतृक संपत्ति में बराबरी का हक लेकर आई है। पिता हो या भाई सबको कानून के साथ-साथ भावनात्मक रूप से भी बेटी व बहन से जुड़ाव महसूस करना होगा। बेटियों को उनके अधिकार देने में हिचक को दूर करने की जरूरत है। सही मायने में बेटियों को उनका हक भी पूरी तरह से तब ही मिल पाएगा जब कानून के साथ-साथ सामाजिक रूप से भी बेटियों को पैतृक संपत्ति में बराबर का हकदार अनिवार्य रूप से बनाया जाए।