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ज्ञान, संवाद और सकारात्मक बदलाव का भी साधन इंटरनेट

युवाओं को यह समझना होगा कि इंटरनेट पर मौजूद हर बात सही नहीं होती। किसी भी पोस्ट, वीडियो या संदेश को स्वीकार करने या आगे बढ़ाने से पहले उसके स्रोत, पृष्ठभूमि और उद्देश्य का आकलन करना आवश्यक है। हालांकि, इस समस्या का अंतिम समाधान केवल तकनीकी नहीं, बल्कि वैचारिक और नैतिक भी है।
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भारत

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Opinion Desk

Jul 09, 2026

FightRadicalization

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फिरदौस जाकिर मिंडा
विधि विशेषज्ञ, राजस्थान हाई कोर्ट

डिजिटल दुनिया, इंटरनेट, सोशल मीडिया और आधुनिक संचार प्रौद्योगिकी का एक ऐसा विशाल नेटवर्क है, जिसने वैश्विक स्तर पर सूचनाओं के आदान-प्रदान को बेहद आसान बना दिया है। यह एक ऐसा प्लेटफॉर्म है, जहां दुनिया भर के लोग एक क्लिक पर आपस में जुड़ जाते हैं। हालांकि, यह दुनिया काफी हद तक अवास्तविक है। यहां प्रस्तुत की जाने वाली जिंदगियां, खबरें और तस्वीरें आमतौर पर फिल्टर और कृत्रिमता का शिकार होती हैं, जो जमीनी हकीकत और वास्तविक जीवन से कोसों दूर एक काल्पनिक मृगतृष्णा प्रस्तुत करती हैं। इस अवास्तविक दुनिया में मौजूद अप्रमाणित सामग्री युवाओं को तेजी से नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रही है। सोशल मीडिया की लत उनमें बेचैनी, हीन भावना और समय की बर्बादी का कारण बन रही है।

धार्मिक और वैचारिक चुनौती

धार्मिक और वैचारिक दृष्टिकोण से भी यह एक कठिन चुनौती है। इंटरनेट पर मौजूद भ्रामक सामग्री और गलत विचारधाराएं अपरिपक्व दिमाग वाले युवाओं को आसानी से अपना शिकार बना लेती हैं, जिससे उनकी सही मान्यताओं और नैतिक मूल्यों के आहत होने का गंभीर खतरा बना रहता है। 21वीं सदी में चरमपंथ की प्रकृति तेजी से बदल चुकी है। अतीत में चरमपंथी विचारधाराएं सीमित हलकों, गुप्त बैठकों या प्रतिबंधित साहित्य के माध्यम से फैलाई जाती थीं, लेकिन अब इंटरनेट और सोशल मीडिया ने इस प्रक्रिया को वैश्विक और त्वरित बना दिया है। आज मोबाइल फोन की स्क्रीनें भी वैचारिक संघर्ष का हिस्सा बन चुकी हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म ऐसे माध्यम बन गए हैं, जहां भड़काऊ विचार, धार्मिक कट्टरपंथ और नफरत पर आधारित दुष्प्रचार युवाओं तक बहुत तेजी से पहुंचता है। भारत जैसे बहुधार्मिक और विविधतापूर्ण समाज में यह मुद्दा और भी संवेदनशील हो जाता है। इसीलिए ऑनलाइन फैलने वाले चरमपंथी नैरेटिव को समझना केवल सुरक्षा का मामला नहीं है, बल्कि एक वैचारिक और सामाजिक जिम्मेदारी भी है।

इको चैंबर और दुष्प्रचार का जाल

डिजिटल प्लेटफॉर्मों की एक बड़ी विशेषता यह है कि वे उपयोगकर्ता की रुचि के अनुसार सामग्री प्रस्तुत करते हैं। यही प्रणाली कभी-कभी ‘इको चैंबर्स’ या सीमित वैचारिक दायरों का रूप ले लेती है। यदि कोई व्यक्ति किसी विशेष प्रकार की राजनीतिक या धार्मिक सामग्री को बार-बार देखता है, तो एल्गोरिदम उसी प्रकार की और पोस्ट तथा वीडियो उसके सामने लाते रहते हैं। धीरे-धीरे उसका संपर्क भिन्न विचारों से कम हो जाता है और वह केवल एक ही दृष्टिकोण के दायरे में सीमित होने लगता है। यही स्थिति चरमपंथी सोच को मजबूत कर सकती है।

चरमपंथी समूह अक्सर वास्तविक सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं को भावनात्मक तरीके से प्रस्तुत करते हैं। आज फर्जी वीडियो, संपादित तस्वीरें और संदर्भ से काटकर निकाले गए बयानों को सोशल मीडिया पर इस तरह प्रस्तुत किया जाता है कि न केवल भावनाएं भड़कें, बल्कि तत्काल प्रतिक्रिया भी उत्पन्न हो। वैश्विक स्तर पर कई संस्थान और संगठन अपने गुप्त एजेंडे को पूरा करने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्मों का हथियार के रूप में उपयोग कर रहे हैं।

डिजिटल साक्षरता का महत्व

इन खतरों से सुरक्षित रहने के लिए डिजिटल साक्षरता समय की सबसे महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है। युवाओं को चाहिए कि वे इंटरनेट पर मिलने वाली हर जानकारी की प्रामाणिक स्रोतों से पुष्टि करें, अपने स्क्रीन टाइम को सीमित रखें और वास्तविक जीवन के रिश्तों को महत्त्व दें। जागरूकता और आलोचनात्मक सोच को अपनाकर ही इस दोधारी तलवार का उपयोग विनाश के बजाय सकारात्मक और रचनात्मक उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है।

सकारात्मक दिशा की ओर

युवाओं को यह समझना होगा कि इंटरनेट पर मौजूद हर बात सही नहीं होती। किसी भी पोस्ट, वीडियो या संदेश को स्वीकार करने या आगे बढ़ाने से पहले उसके स्रोत, पृष्ठभूमि और उद्देश्य का आकलन करना आवश्यक है। हालांकि, इस समस्या का अंतिम समाधान केवल तकनीकी नहीं, बल्कि वैचारिक और नैतिक भी है। इंटरनेट वही माध्यम है, जो नफरत फैला सकता है, लेकिन यही ज्ञान, संवाद और सहानुभूति को भी बढ़ावा दे सकता है। यदि युवा पीढ़ी आलोचनात्मक सोच, सामाजिक जिम्मेदारी और संतुलित धार्मिक समझ के साथ डिजिटल दुनिया में भाग ले, तो चरमपंथी विचारधाराओं की नींव अपने आप कमजोर पड़ सकती है।