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जिसने खेत संभाला, उसे अब मिला किसान होने का सम्मान

खेत की बुवाई से लेकर निराई-गुड़ाई, सिंचाई, फसल कटाई, बीज संरक्षण, पशुपालन, दुग्ध उत्पादन तथा कृषि आधारित अनेक गतिविधियों तक महिलाओं की भूमिका हर स्तर पर दिखाई देती है। वे कृषि व्यवस्था की जीवनरेखा हैं।
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जयपुर

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Opinion Desk

Jul 08, 2026

'महिला किसान सशक्तीकरण अधिनियम-2026'

'महिला किसान सशक्तीकरण अधिनियम-2026'

विजया रहाटकर,(अध्यक्ष, राष्ट्रीय महिला आयोग)

सुबह का पहला उजाला जब खेतों पर उतरता है, तब सबसे पहले जिस चेहरे पर दिन की चिंता और उम्मीद साथ-साथ दिखाई देती है, वह अक्सर किसी महिला का होता है। वे बीज चुनने, खेती करने, पशुपालन और फसल कटाई से लेकर घर की जिम्मेदारियां भी निभाती हैं, लेकिन लंबे समय तक उन्हें किसान के रूप में मान्यता नहीं मिली। यही भारतीय कृषि व्यवस्था का सबसे बड़ा विरोधाभास था। जिसने खेत संभाला, वही किसान नहीं कहलाया। जिसने धरती को अन्न से भर दिया, वही अधिकारों से वंचित रही। जिसने खेती की, उसकी पहचान सरकारी अभिलेखों में अक्सर केवल 'किसान की पत्नी' या 'परिवार के सदस्य' तक सीमित रही। उसके श्रम को स्वीकार किया गया, लेकिन उसके अस्तित्व को नहीं, उसके योगदान को सराहा गया, लेकिन उसके अधिकारों को मान्यता नहीं मिली। कभी-कभी इतिहास ऐसे मोड़ पर खड़ा होता है, जहां एक कानून केवल नियम नहीं बदलता, बल्कि समाज की सोच भी बदल देता है।

महाराष्ट्र सरकार द्वारा पारित 'महिला किसान सशक्तीकरण अधिनियम-2026' ऐसा ही एक ऐतिहासिक कदम है। यह कानून केवल महिलाओं को नया दर्जा देने का प्रयास नहीं है, बल्कि भारतीय कृषि व्यवस्था में वर्षों से चली आ रही उस विसंगति का न्यायपूर्ण समाधान है, जिसने खेती करने वाली लाखों महिलाओं को उनकी वास्तविक पहचान से वंचित रखा। भारतीय कृषि की कल्पना महिलाओं के बिना अधूरी है। खेत की बुवाई से लेकर निराई-गुड़ाई, सिंचाई, फसल कटाई, बीज संरक्षण, पशुपालन, दुग्ध उत्पादन तथा कृषि आधारित अनेक गतिविधियों तक महिलाओं की भूमिका हर स्तर पर दिखाई देती है। वे कृषि व्यवस्था की जीवनरेखा हैं। अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार भारत में कृषि कार्यों में महिलाओं की भागीदारी लगभग 65 से 75 प्रतिशत तक है। लेकिन कृषि भूमि के स्वामित्व में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल 13 से 14 प्रतिशत के आसपास है।

यही वह असमानता थी, जिसने वर्षों तक महिला किसानों को अधिकारों से दूर रखा। खेत में सबसे अधिक श्रम करने वाली महिला सरकारी अभिलेखों में किसान नहीं मानी गई। परिणामस्वरूप किसान क्रेडिट कार्ड, फसल बीमा, कृषि ऋण, सरकारी अनुदान, आधुनिक कृषि प्रशिक्षण तथा अनेक कल्याणकारी योजनाओं के लाभ तक उसकी सीधी पहुंच नहीं बन सकी। जिसने खेत को सींचा, वही अधिकारों से वंचित रही। पहचान केवल सम्मान नहीं देती, अधिकारों के द्वार भी खोलती है, यही वह सोच है, जिसे महाराष्ट्र ने कानून का स्वरूप दिया है। इस अधिनियम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि पहली बार भूमि के स्वामित्व और किसान होने की परिभाषा को अलग किया गया है। अब केवल भूमि मालिक ही नहीं, बल्कि खेती करने वाली महिला भी किसान मानी जाएगी। इस कानून के तहत भूमिहीन महिला कृषक, बटाईदार, खेतिहर मजदूर, पशुपालन, डेयरी, मत्स्य पालन और कृषि-वनीकरण से जुड़ी महिलाओं को भी किसान की विधिक मान्यता दी गई है। महिलाओं को 'महिला किसान प्रमाणपत्रÓ मिलने से वे कृषि ऋण, बीमा, बीज, अनुदान और सरकारी योजनाओं का लाभ अपनी पहचान के आधार पर ले सकेंगी। 'महिला किसान प्रमाणपत्र' के माध्यम से वे कृषि ऋण, किसान क्रेडिट कार्ड, बीज, उर्वरक, फसल बीमा, सरकारी अनुदान तथा अन्य कृषि योजनाओं तक अपनी स्वतंत्र पहचान के आधार पर पहुंच बना सकेंगी।

यह परिवर्तन केवल दस्तावेजों में दर्ज एक नए नाम का नहीं है, यह उस महिला की पहचान को स्वीकार करने का निर्णय है, जिसने सदियों से खेती की, लेकिन पहली बार कानून ने उसे उसके वास्तविक नाम से पुकारा है। महिलाओं को भूमि, ऋण, तकनीक और कृषि संसाधनों तक समान पहुंच मिलने से कृषि उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। कानूनी रूप से किसान का दर्जा मिलने से महिला केवल श्रमिक नहीं, बल्कि कृषि व्यवस्था की महत्त्वपूर्ण भागीदार बनेंगी। बैंक, सहकारी संस्थाओं, कृषि विभाग और स्थानीय प्रशासन में उनकी भागीदारी मजबूत होगी। ग्राम स्तर पर उनकी निर्णय क्षमता और नेतृत्व भूमिका भी बढ़ेगी। यह परिवर्तन प्रशासनिक कम और सामाजिक अधिक है, क्योंकि यह उस मानसिकता को बदलने का प्रयास है, जिसने वर्षों तक खेती को केवल पुरुषों का क्षेत्र मानकर देखा। हालांकि, किसी भी कानून की वास्तविक सफलता उसके प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। यह कानून तभी सफल माना जाएगा, जब उसका लाभ उस अंतिम महिला तक पहुंचे, जिसके लिए यह बनाया गया है।


दरअसल, यह कानून केवल महिलाओं के सम्मान का सवाल नहीं है। खेत में खड़ी महिला केवल फसल नहीं उगाती। वह परिवार की आशा बोती है, समाज का विश्वास सींचती है और राष्ट्र की खाद्य सुरक्षा का भविष्य तैयार करती है। उसकी हथेलियों की लकीरों में केवल मिट्टी नहीं, बल्कि भारत की समृद्धि का इतिहास लिखा है। महाराष्ट्र ने इस सत्य को कानून के माध्यम से स्वीकार कर भारतीय कृषि इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा है जो अन्य राज्यों को भी प्रेरित करेगी।