7 जुलाई 2026,

मंगलवार

Patrika Logo
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

जिसने खेत संभाला, उसे अब मिला किसान होने का सम्मान

खेत में खड़ी वह महिला केवल फसल नहीं उगाती। वह परिवार की आशा बोती है, समाज का विश्वास सींचती है और राष्ट्र की खाद्य सुरक्षा का भविष्य तैयार करती है। उसकी हथेलियों की लकीरों में केवल मिट्टी नहीं, बल्कि भारत की समृद्धि का इतिहास लिखा है। इसलिए उसे केवल 'किसान की पत्नी' कहना उसके योगदान को सीमित करना है। उसका वास्तविक परिचय केवल एक ही है-वह किसान है।
6 min read
Google source verification

भारत

image

Opinion Desk

Jul 07, 2026

WomenFarmers

WomenFarmers

विजया रहाटकर
अध्यक्ष, राष्ट्रीय महिला आयोग

सुबह का पहला उजाला जब खेतों पर उतरता है, तब सबसे पहले जिस चेहरे पर दिन की चिंता और उम्मीद साथ-साथ दिखाई देती है, वह अक्सर किसी महिला का होता है। वह बीज चुनती है, खेत तैयार करती है, निराई-गुड़ाई करती है, पशुओं की देखभाल करती है, फसल काटती है और घर की जिम्मेदारियां भी निभाती है। खेत की हर मेड़, हर मौसम और हर फसल में उसका श्रम दर्ज होता है। लेकिन विडंबना देखिए कि जिस महिला के हाथों ने पीढिय़ों तक भारत की खाद्य सुरक्षा को मजबूत किया, उसी महिला को कानून ने किसान मानने में दशकों लगा दिए। यही भारतीय कृषि व्यवस्था का सबसे बड़ा विरोधाभास था। जिसने खेत संभाला, वही किसान नहीं कहलाया। जिसने धरती को अन्न से भर दिया, वही अधिकारों से वंचित रही। जिसने खेती की, उसकी पहचान सरकारी अभिलेखों में अक्सर केवल 'किसान की पत्नी' या 'परिवार के सदस्य' तक सीमित रही। उसके श्रम को स्वीकार किया गया, लेकिन उसके अस्तित्व को नहीं; उसके योगदान को सराहा गया, लेकिन उसके अधिकारों को मान्यता नहीं मिली।

एक कानून जिसने सोच बदलने की शुरुआत की

कभी-कभी इतिहास ऐसे मोड़ पर खड़ा होता है, जहां एक कानून केवल नियम नहीं बदलता, बल्कि समाज की सोच भी बदल देता है। महाराष्ट्र सरकार द्वारा पारित 'महिला किसान सशक्तीकरण अधिनियम, 2026' ऐसा ही एक ऐतिहासिक कदम है। यह कानून केवल महिलाओं को नया दर्जा देने का प्रयास नहीं है, बल्कि भारतीय कृषि व्यवस्था में वर्षों से चली आ रही उस विसंगति का न्यायपूर्ण समाधान है, जिसने खेती करने वाली लाखों महिलाओं को उनकी वास्तविक पहचान से वंचित रखा। यह कानून साफ संदेश देता है कि खेती केवल भूमि के स्वामित्व का विषय नहीं है; खेती श्रम, जिम्मेदारी, अनुभव और निरंतर सहभागिता का नाम है। खेत को जीवन देने वाला हर हाथ किसान है, चाहे उसके नाम पर जमीन हो या न हो।

भारतीय कृषि की अदृश्य आधारशिला हैं महिलाएं

भारतीय कृषि की कल्पना महिलाओं के बिना अधूरी है। खेत की बुवाई से लेकर निराई-गुड़ाई, सिंचाई, फसल कटाई, बीज संरक्षण, पशुपालन, दुग्ध उत्पादन तथा कृषि आधारित अनेक गतिविधियों तक महिलाओं की भूमिका हर स्तर पर दिखाई देती है। वे केवल खेतिहर श्रमिक नहीं हैं, बल्कि कृषि व्यवस्था की जीवनरेखा हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था की निरंतरता में उनका योगदान उतना ही महत्त्वपूर्ण है, जितना किसी भूमि स्वामी या परंपरागत किसान का। अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार भारत में कृषि कार्यों में महिलाओं की भागीदारी लगभग 65 से 75 प्रतिशत तक है। महाराष्ट्र जैसे राज्यों में यह भागीदारी 80 प्रतिशत से भी अधिक मानी जाती है। लेकिन जब भूमि के स्वामित्व की बात आती है, तो तस्वीर बिल्कुल बदल जाती है। कृषि भूमि के स्वामित्व में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल 13 से 14 प्रतिशत के आसपास है।

श्रम उनका, अधिकार किसी और के

यही वह असमानता थी, जिसने वर्षों तक महिला किसानों को अधिकारों से दूर रखा। खेत में सबसे अधिक श्रम करने वाली महिला सरकारी अभिलेखों में किसान नहीं मानी गई। परिणामस्वरूप किसान क्रेडिट कार्ड, फसल बीमा, कृषि ऋण, सरकारी अनुदान, आधुनिक कृषि प्रशिक्षण तथा अनेक कल्याणकारी योजनाओं के लाभ तक उसकी सीधी पहुंच नहीं बन सकी। जिसने खेत को सींचा, वही अधिकारों से वंचित रही। पहचान केवल सम्मान नहीं देती, अधिकारों के द्वार भी खोलती है। यही वह सोच है, जिसे महाराष्ट्र ने कानून का स्वरूप दिया है।

स्वामित्व नहीं, वास्तविक खेती बनेगी पहचान

इस अधिनियम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि पहली बार भूमि के स्वामित्व और किसान होने की परिभाषा को अलग किया गया है। अब केवल भूमि का मालिक ही किसान नहीं होगा, बल्कि वास्तविक रूप से खेती करने वाली महिला भी किसान मानी जाएगी। यह परिवर्तन सुनने में जितना सरल लगता है, व्यवहार में उतना ही क्रांतिकारी है, क्योंकि इससे किसान होने की अवधारणा पहली बार स्वामित्व से आगे बढक़र वास्तविक श्रम और कृषि योगदान से जुड़ती है। इसी दृष्टि से अधिनियम के तहत भूमिहीन महिला कृषक, बटाईदार, खेतिहर मजदूर, मौसमी प्रवासी महिला श्रमिक, पशुपालन, डेयरी, मत्स्य पालन तथा कृषि-वनीकरण से जुड़ी महिलाओं को भी महिला किसान के रूप में विधिक मान्यता प्रदान की गई है। यह भारतीय कृषि इतिहास में पहली बार इतनी व्यापक और समावेशी परिभाषा प्रस्तुत करता है।

पहचान से खुलेंगे अधिकारों के द्वार

किसी भी अधिकार की पहली शर्त पहचान होती है। जब तक व्यक्ति की पहचान स्थापित नहीं होती, तब तक अधिकार केवल कागजों में सीमित रहते हैं। यही इस कानून की आत्मा है। इसी उद्देश्य से महिलाओं को ग्रामसभा अथवा शहरी स्थानीय निकायों के माध्यम से 'महिला किसान प्रमाणपत्र' प्रदान किए जाने का प्रावधान किया गया है। यह प्रमाणपत्र केवल एक प्रशासनिक दस्तावेज नहीं होगा, बल्कि महिला किसानों के लिए अधिकारों का प्रवेश-द्वार बनेगा।

इसके माध्यम से वे कृषि ऋण, किसान क्रेडिट कार्ड, बीज, उर्वरक, फसल बीमा, सरकारी अनुदान तथा अन्य कृषि योजनाओं तक अपनी स्वतंत्र पहचान के आधार पर पहुंच बना सकेंगी। पहली बार महिला किसी और की पहचान के सहारे नहीं, बल्कि स्वयं अपने अधिकार से सरकारी योजनाओं की पात्र बनेगी। यह परिवर्तन केवल दस्तावेजों में दर्ज एक नए नाम का नहीं है, यह उस महिला की पहचान को स्वीकार करने का निर्णय है, जिसने सदियों से खेती की, लेकिन पहली बार कानून ने उसे उसके वास्तविक नाम से पुकारा है।

आर्थिक सशक्तीकरण की नई राह

महिलाओं को किसान का दर्जा मिलने का सबसे व्यापक प्रभाव उनकी आर्थिक स्वतंत्रता पर पड़ेगा। कृषि केवल उत्पादन का माध्यम नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। जो व्यक्ति कृषि संसाधनों तक पहुंच रखता है, वही निर्णय लेने, निवेश करने और अपने भविष्य को दिशा देने में सक्षम होता है। अब तक अधिकांश महिला कृषक इस अधिकार से वंचित थीं। वे खेत में बराबर की भागीदार थीं, लेकिन आर्थिक व्यवस्था में उनकी पहचान गौण थी।

अनेक अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों से यह सिद्ध हुआ है कि यदि महिलाओं को पुरुषों के समान भूमि, ऋण, आधुनिक तकनीक और कृषि संसाधनों तक समान पहुंच मिले, तो कृषि उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। इससे केवल महिलाओं की आय ही नहीं बढ़ेगी, बल्कि पूरे परिवार का पोषण स्तर, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी अधिक मजबूत होगी।

अर्थशास्त्रियों का भी मानना है कि महिलाओं के हाथों में आर्थिक संसाधनों की उपलब्धता का लाभ केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। इसका सकारात्मक प्रभाव पूरे परिवार और समाज पर पड़ता है। जब महिला आर्थिक रूप से सशक्त होती है, तब वह केवल अपना जीवन नहीं बदलती, बल्कि अगली पीढ़ी के अवसरों को भी विस्तृत करती है। इसलिए महिला किसान को अधिकार देना केवल एक व्यक्ति को सशक्त करना नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत के भविष्य को सशक्त करना है।

सामाजिक सोच में भी आएगा बदलाव

ग्रामीण भारत में भूमि केवल संपत्ति नहीं होती, वह सामाजिक प्रतिष्ठा, निर्णय क्षमता और अधिकार का भी प्रतीक होती है। लंबे समय तक कृषि में महिलाओं की भूमिका श्रम तक सीमित मानी गई, जबकि निर्णय लेने का अधिकार प्राय: पुरुषों के पास रहा। अब जब किसी महिला को कानूनी रूप से किसान का दर्जा मिलेगा, तब वह केवल खेत में काम करने वाली श्रमिक नहीं रहेगी, बल्कि कृषि संबंधी निर्णयों में भी उसकी भूमिका अधिक प्रभावशाली होगी।

बैंक, सहकारी संस्थाएं, कृषि विभाग तथा स्थानीय प्रशासन जब किसी महिला को स्वतंत्र किसान के रूप में स्वीकार करेंगे, तब उसकी संस्थागत पहचान भी मजबूत होगी। इससे केवल सरकारी योजनाओं तक पहुंच आसान नहीं होगी, बल्कि ग्राम स्तर पर महिलाओं की नेतृत्व क्षमता, सामाजिक भागीदारी और निर्णय प्रक्रिया में उनकी भूमिका भी सुदृढ़ होगी। यह परिवर्तन प्रशासनिक कम और सामाजिक अधिक है, क्योंकि यह उस मानसिकता को बदलने का प्रयास है, जिसने वर्षों तक खेती को केवल पुरुषों का क्षेत्र मानकर देखा।

सफलता की असली कसौटी होगा प्रभावी क्रियान्वयन

हालांकि, किसी भी कानून की वास्तविक सफलता उसके प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। महिला किसान प्रमाणपत्रों के वितरण की प्रक्रिया पारदर्शी और सरल हो, डिजिटल डेटाबेस नियमित रूप से अद्यतन किया जाए, बैंक तथा कृषि विभाग इस प्रमाणपत्र को तत्काल मान्यता दें, व्यापक जनजागरण अभियान चलाया जाए तथा पर्याप्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराए जाएं—इन सभी पहलुओं पर गंभीरता से कार्य करना आवश्यक होगा। कानून तभी सफल माना जाएगा, जब उसका लाभ उस अंतिम महिला तक पहुंचे, जिसके लिए यह बनाया गया है।

देश के लिए बन सकता है आदर्श मॉडल

यदि इन सभी बिंदुओं पर प्रभावी ढंग से अमल किया गया, तो महाराष्ट्र का यह कानून केवल एक राज्य की उपलब्धि नहीं रहेगा, बल्कि पूरे देश के लिए एक आदर्श मॉडल सिद्ध होगा। भारत के अन्य राज्यों के सामने भी यह अवसर है कि वे कृषि में महिलाओं के वास्तविक योगदान को स्वीकार करते हुए उन्हें विधिक पहचान और समान अधिकार प्रदान करें। इससे न केवल कृषि क्षेत्र अधिक समावेशी बनेगा, बल्कि महिला सशक्तीकरण को भी नई दिशा मिलेगी।

दरअसल, यह कानून केवल महिलाओं के सम्मान का सवाल नहीं है। यह कृषि न्याय, आर्थिक समानता और सामाजिक परिवर्तन की ऐसी आधारशिला है, जिस पर भविष्य का अधिक न्यायपूर्ण और समावेशी भारत निर्मित हो सकता है। यह उस सोच को बदलने का प्रयास है, जिसमें किसान की पहचान केवल भूमि के स्वामित्व से तय होती थी। अब यह स्पष्ट संदेश दिया गया है कि खेती का वास्तविक आधार श्रम, समर्पण और सहभागिता है।

अब उसे उसके वास्तविक नाम से पुकारने का समय

खेत में खड़ी वह महिला केवल फसल नहीं उगाती। वह परिवार की आशा बोती है, समाज का विश्वास सींचती है और राष्ट्र की खाद्य सुरक्षा का भविष्य तैयार करती है। उसकी हथेलियों की लकीरों में केवल मिट्टी नहीं, बल्कि भारत की समृद्धि का इतिहास लिखा है। इसलिए उसे केवल 'किसान की पत्नी' कहना उसके योगदान को सीमित करना है। उसका वास्तविक परिचय केवल एक ही है-वह किसान है।

महाराष्ट्र ने इस सत्य को कानून के माध्यम से स्वीकार कर भारतीय कृषि इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा है। यह केवल एक प्रशासनिक उपलब्धि नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, लैंगिक समानता और समावेशी विकास के प्रति दृढ़ प्रतिबद्धता का परिचायक है। इस ऐतिहासिक पहल के लिए माननीय मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस तथा महाराष्ट्र सरकार हार्दिक बधाई के पात्र हैं। महिला किसानों को विधिक पहचान प्रदान करने का यह निर्णय आने वाले वर्षों में लाखों महिलाओं के आत्मसम्मान, अधिकार और आर्थिक सशक्तीकरण का आधार बनेगा।

विश्वास है कि महाराष्ट्र की यह ऐतिहासिक पहल अन्य राज्यों को भी प्रेरित करेगी और भारत की कृषि व्यवस्था को अधिक न्यायपूर्ण, अधिक समावेशी और अधिक संवेदनशील बनाने की दिशा में एक नए युग का सूत्रपात करेगी। क्योंकि जिसने सदियों से खेत संभाला, उसे किसान कहलाने का सम्मान मिलना कोई उपकार नहीं, बल्कि न्याय है—और न्याय जितना शीघ्र मिले, उतना ही इतिहास के प्रति हमारा ऋण कम होता है।