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के.एस. तोमर(सामरिक मामलों के स्तंभकार और वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक)
इतिहास हमेशा युद्धों या संधियों से नहीं बदलता। कई बार उसका रुख तब बदलता है, जब राष्ट्र आने वाले संकटों को समय रहते पहचानकर अपने संबंधों को नई दिशा देते हैं। भारत और जापान के बीच संपन्न 16वां वार्षिक शिखर सम्मेलन भी ऐसा ही अवसर है। यह तेजी से बदलती वैश्विक राजनीति के बीच एशिया की दो लोकतांत्रिक शक्तियों का साझा रणनीतिक संकल्प है। विश्व व्यवस्था इस समय संक्रमण के दौर से गुजर रही है। अमरीका में राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की वापसी के बाद उसकी वैश्विक प्रतिबद्धताओं को लेकर नए प्रश्न उठे हैं। चीन सैन्य, आर्थिक और समुद्री क्षेत्रों में अपना प्रभाव लगातार बढ़ा रहा है, जबकि यूरोपीय संघ भी भारत के साथ संबंधों को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का इच्छुक है। ऐसे समय में नई दिल्ली और टोक्यो ने स्पष्ट संदेश दिया है कि भविष्य की चुनौतियों का सामना केवल मजबूत और भरोसेमंद साझेदारियों के माध्यम से ही किया जा सकता है।
इस शिखर सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि रक्षा सहयोग को नई गति देना रही। दोनों देशों ने हिंद महासागर में संयुक्त नौसैनिक अभ्यास बढ़ाने, समुद्री सुरक्षा सहयोग मजबूत करने, युद्धपोतों के रखरखाव तथा 'यूनिकॉर्न' जैसी उन्नत रक्षा तकनीक के हस्तांतरण पर सहमति व्यक्त की। यह संकेत है कि दोनों देश अब केवल राजनीतिक सहयोग तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि अपनी सुरक्षा साझेदारी को भी संस्थागत और दीर्घकालिक स्वरूप देना चाहते हैं। आर्थिक क्षेत्र में भी सम्मेलन सफल रहा। जापानी प्रधानमंत्री के साथ आए 150 से अधिक उद्योगपतियों की उपस्थिति में लगभग 120 व्यावसायिक समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। इनमें सेमीकंडक्टर, महत्त्वपूर्ण खनिज, हरित प्रौद्योगिकी, वैज्ञानिक अनुसंधान और मजबूत आपूर्ति शृंखलाओं पर विशेष बल दिया गया। वैश्विक व्यापार की अनिश्चितताओं के बीच यह सहयोग दोनों देशों की आर्थिक सुरक्षा को मजबूती देगा। दोनों नेताओं ने आतंकवाद की कड़ी निंदा करते हुए स्वतंत्र, मुक्त और नियम-आधारित हिंद-प्रशांत क्षेत्र के प्रति अपनी प्रतिबद्धता भी दोहराई। भारत के लिए यह साझेदारी उच्च प्रौद्योगिकी, उन्नत विनिर्माण और दीर्घकालिक निवेश का विश्वसनीय आधार है। 'मेक इन इंडिया' और आत्मनिर्भर भारत को जापानी पूंजी और तकनीकी विशेषज्ञता नई गति दे सकती है।
वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में आई बाधाओं ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता रणनीतिक जोखिम बन सकती है। जापान के साथ सहयोग भारत को वैकल्पिक औद्योगिक ढांचा विकसित करने में मदद करेगा। रक्षा क्षेत्र में जापान की समुद्री निगरानी क्षमता और उन्नत नौसैनिक तकनीक भारत की हिंद महासागर में सुरक्षा भूमिका को और सुदृढ़ बनाएगी। साथ ही यह साझेदारी भारत की विश्वसनीय रणनीतिक साझेदार की छवि को भी मजबूत करती है। इस साझेदारी से जापान को भी समान रूप से लाभ होगा। अमरीका उसका सबसे बड़ा सुरक्षा सहयोगी बना रहेगा, लेकिन बदलती अमरीकी प्राथमिकताओं के कारण भारत उसके लिए एक महत्त्वपूर्ण अतिरिक्त रणनीतिक साझेदार बनकर उभरा है। दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था होने के कारण भारत जापानी कंपनियों के लिए विशाल बाजार और विश्वसनीय विनिर्माण केंद्र प्रदान करता है। इससे जापान को चीन पर अपनी औद्योगिक निर्भरता कम करने का अवसर मिलेगा। भारत की भौगोलिक स्थिति भी जापान के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। हिंद महासागर से होकर गुजरने वाले समुद्री व्यापार मार्ग जापान की ऊर्जा और व्यापारिक सुरक्षा की जीवनरेखा हैं।
सम्मेलन के बाद यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठा कि क्या जापान अमरीका की अनिश्चित नीतियों के कारण भारत को उसका विकल्प मान रहा है? उत्तर स्पष्ट है- विकल्प नहीं, बल्कि अतिरिक्त रणनीतिक सहारा। जापान के लिए अमरीका के साथ सुरक्षा गठबंधन अपरिहार्य बना रहेगा, लेकिन वह अब अपनी पूरी रणनीतिक व्यवस्था को केवल एक स्तंभ पर टिकाकर नहीं रखना चाहता। भारत के साथ गहरे होते संबंध इसी दीर्घकालिक रणनीतिक सोच का हिस्सा हैं। दूसरी ओर भारत भी बहुध्रुवीय कूटनीति को आगे बढ़ाते हुए अमरीका, यूरोपीय संघ, फ्रांस, जर्मनी, इटली, ऑस्ट्रेलिया और अन्य समान विचार वाले देशों के साथ रक्षा, प्रौद्योगिकी और व्यापारिक सहयोग का विस्तार कर अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को और मजबूत कर रहा है। भारत-जापान साझेदारी का असर पूरे एशिया पर पड़ेगा। चीन निश्चित रूप से इस बढ़ते सहयोग पर नजर रखेगा। हालांकि दोनों देशों का उद्देेश्य किसी के विरुद्ध मोर्चा बनाना नहीं है, लेकिन मजबूत समुद्री सहयोग, सुरक्षित आपूर्ति शृंखलाएं और हिंद-प्रशांत में बढ़ता समन्वय क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन को प्रभावित करेंगे। छोटे एशियाई देशों के लिए भी यह संदेश महत्त्वपूर्ण है कि क्षेत्रीय स्थिरता केवल महाशक्तियों पर निर्भर नहीं है। लोकतांत्रिक और जिम्मेदार क्षेत्रीय शक्तियां भी सहयोग, निवेश और नियम-आधारित व्यवस्था के माध्यम से शांति और समृद्धि सुनिश्चित कर सकती हैं।
अब चुनौती इन समझौतों को धरातल पर उतारने की होगी। यदि निवेश उद्योगों में बदले, रक्षा सहयोग संयुक्त उत्पादन तक पहुंचे और तकनीकी साझेदारी वास्तविक नवाचार का आधार बने, तो भारत-जापान संबंध केवल द्विपक्षीय सहयोग तक सीमित नहीं रहेंगे। वे हिंद-प्रशांत की नई रणनीतिक संरचना के प्रमुख स्तंभ बन सकते हैं। बदलती विश्व व्यवस्था में नई दिल्ली और टोक्यो की यह निकटता किसी तीसरे देश के विरुद्ध नहीं, बल्कि स्थिर, संतुलित और नियम-आधारित एशिया के निर्माण की दिशा में एक दूरदर्शी निवेश है।
Updated on:
07 Jul 2026 05:20 pm
Published on:
07 Jul 2026 05:20 pm
