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संपादकीय: स्थायी तकनीकी उपायों से ही थमेगी मानसून से जुड़ी त्रासदी

यदि वैश्विक परिप्रेक्ष्य को देखें, तो अमरीका और ब्रिटेन जैसे देशों ने इस दिशा में दूरगामी सोच के साथ प्रयास किए हैं। वहां 'लिडार' जैसी अत्याधुनिक लेजर मैपिंग तकनीक से पहाड़ों की सूक्ष्म हलचल को ट्रैक किया जाता है और 'रॉकफॉल बैरियर्स' के जरिए चट्टानों को हाईवे पर आने से रोका जाता है।
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मानसून की शुरुआती दस्तक ने एक बार फिर देश के बुनियादी ढांचे की रीढ़ को झकझोर कर रख दिया है। मुंबई-पुणे एक्सप्रेस-वे के 'मिसिंग लिंक' सेक्शन में खंडाला एग्जिट के पास हुआ भूस्खलन और रेलवे पटरियों पर यातायात का ठप होना महज एक भौगोलिक घटना नहीं है। यह हमारी विकासवादी सोच पर भी गंभीर सवालिया निशान है। यह त्रासदी तब और विकराल रूप ले लेती है जब हम पाते हैं कि आधुनिक मौसम विज्ञान में सटीक पूर्वानुमान की क्षमता होने के बावजूद, हम हर साल प्रकृति के ऐसे रौद्र रूप के सामने बेबस खड़े नजर आते हैं। पूरा मानसून अभी बाकी है, लेकिन शुरुआत ने ही भविष्य की भयावहता का अहसास करा दिया है।

दरअसल, मानसून से जुड़ी ऐसी सालाना त्रासदी जल प्रबंधन की प्रशासनिक विफलता और अनियोजित शहरीकरण का सीधा परिणाम है। मानसून से पूर्व पहाडिय़ों की कमजोर सतह का वैज्ञानिक आकलन करने और ढलानों पर समुचित 'ड्रेनेज चैनल्स' बनाने में हमारे इंजीनियर विफल रहे हैं। यही कहानी हमारे तमाम शहरों की भी है, जहां साल भर तक बरसाती नाले गाद से पटे रहते हैं। इतना ही नहीं प्राकृतिक जल निकासी के रास्तों पर कंक्रीट की अवैध कॉलोनियां खड़ी कर दी गई हैं। आधुनिकीकरण के नाम पर अनियोजित विकास ने हमारे शहरों को पहली तेज बारिश में ही जलाशयों में तब्दील करने का काम किया है। यदि वैश्विक परिप्रेक्ष्य को देखें, तो अमरीका और ब्रिटेन जैसे देशों ने इस दिशा में दूरगामी सोच के साथ प्रयास किए हैं। वहां 'लिडार' जैसी अत्याधुनिक लेजर मैपिंग तकनीक से पहाड़ों की सूक्ष्म हलचल को ट्रैक किया जाता है और 'रॉकफॉल बैरियर्स' के जरिए चट्टानों को हाईवे पर आने से रोका जाता है। ब्रिटेन में रेल सुरक्षा के लिए सेंसर-आधारित 'वेदर मॉनिटरिंग सिस्टम' है, जो खतरा भांपते ही सेवाओं को स्वत: नियंत्रित कर देता है। इसके विपरीत, वल्र्ड बैंक के आंकड़ों के अनुसार भारत को इस वर्षाजनित विफलता के कारण प्रतिवर्ष लगभग 80,000 करोड़ से 1,20,000 करोड़ रुपए का भारी-भरकम आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता है, जिसमें अमूल्य मानवीय जीवन की क्षति भी शामिल है। अब समय आ चुका है कि हम 'आपदा के बाद राहत' की नीति को छोड़कर 'आपदा से पूर्व सुरक्षा' का दृष्टिकोण अपनाएं। नीति-नियंताओं को भूवैज्ञानिकों के समन्वय से 'डिजिटल ड्रेनेज ऑडिट' और 'स्पंज सिटी' जैसे सस्टेनेबल मॉडल्स को अनिवार्य बनाना होगा।
प्रकृति को वश में करना असंभव है, लेकिन अपनी प्रशासनिक ईमानदारी और वैज्ञानिक इंजीनियरिंग के सामंजस्य से इसके नुकसान को न्यूनतम करना निश्चित रूप से हमारे हाथ में है। व्यवस्था को अब कागजी सफाई से बाहर निकालकर धरातल पर कड़े कदम उठाने ही होंगे। तभी ऐसी सालाना त्रासदियों से बचा जा सकता है।