
indian bureaucracy
आशीष शर्मा लेखक रानी दुर्गावती विवि, जबलपुर में प्रोफेसर हैं
देश की नौकरशाही, जो अंग्रेजों के शासनकाल से हमारी प्रशासनिक व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण अंग रही है, आज एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन और पुनर्विचार के दौर से गुजर रही है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 1950 के दशक में, जब भारत ने राष्ट्र-निर्माण का कार्य प्रारंभ किया, तब हमारे सामने प्रशासनिक व्यवस्था को संचालित करने के लिए अंग्रेजों द्वारा विकसित नौकरशाही ही एकमात्र संगठित ढांचा उपलब्ध था। उस समय परिस्थितियां ऐसी थीं कि तत्काल पूर्णत: भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप नई व्यवस्था विकसित करना संभव नहीं था। इसलिए उस प्रशासनिक ढांचे को स्वीकार करना उस समय की आवश्यकता और व्यावहारिकता, दोनों था।
पारंपरिक नौकरशाही मॉडल में सुधार की आवश्यकता
इसी नौकरशाही ने देश के प्रशासन को स्थिरता प्रदान की, विकास योजनाओं को लागू किया तथा शासन प्रणाली को संगठित रूप दिया। संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा प्रणाली तथा प्रशिक्षण व्यवस्था को विश्व की सबसे पारदर्शी और निष्पक्ष चयन प्रणालियों में माना गया। इस व्यवस्था ने देश को अनेक योग्य और प्रतिभाशाली प्रशासक दिए, जिन्होंने विभिन्न स्तरों पर राष्ट्र-निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। किंतु वर्तमान समय में परिस्थितियां अत्यंत बदल चुकी हैं। आज लाखों युवा सिविल सेवा परीक्षाओं में सम्मिलित होते हैं, परंतु उनमें से केवल कुछ सौ अभ्यर्थियों का ही चयन हो पाता है। दूसरी ओर, देश की सामाजिक, आर्थिक, तकनीकी और वैश्विक चुनौतियां पहले की तुलना में कहीं अधिक जटिल हो गई हैं। इसलिए 1950 के दशक की प्रशासनिक संरचना को आज के भारत की आवश्यकताओं के अनुरूप मान लेना उचित नहीं होगा। अब यह स्पष्ट रूप से अनुभव किया जा रहा है कि पारंपरिक नौकरशाही मॉडल में व्यापक सुधार की आवश्यकता है।
नौकरशाही को समय के साथ विकास-केंद्रित बनाया
विश्व के अन्य देशों के प्रशासनिक मॉडलों का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होता है कि कई विकसित देशों ने अपनी नौकरशाही को समय के साथ विकास-केंद्रित बनाया है। उदाहरण के लिए, सिंगापुर में प्रशासनिक अधिकारियों का चयन सार्वजनिक सेवा आयोग के माध्यम से होता है, किंतु उनकी कार्यप्रणाली पूर्णत: विकास और प्रदर्शन आधारित है। वहां प्रशासनिक तंत्र बाजारोन्मुख दृष्टिकोण के साथ कार्य करता है तथा अधिकारियों का मूल्यांकन उनके परिणामों और कार्यक्षमता के आधार पर किया जाता है। इसी प्रकार जर्मनी में प्रशासनिक सेवाओं में चयन विश्वविद्यालयीय विशेषज्ञता और कठोर प्रशिक्षण के आधार पर होता है। वहां प्रशासनिक प्रणाली में विषय-विशेषज्ञता को अत्यधिक महत्त्व दिया जाता है। जर्मनी की नौकरशाही कई मामलों में भारत की पारंपरिक प्रशासनिक अवधारणाओं के निकट है, जबकि सिंगापुर का मॉडल पूर्णत: विकासवादी दृष्टिकोण को प्राथमिकता देता है।
विकासवादी नौकरशाही’ की आवश्यकता
आज आवश्यकता एक ऐसी ‘विकासवादी नौकरशाही’ की है, जो केवल नियमों और प्रक्रियाओं के पालन तक सीमित न रहकर परिणामोन्मुख, जनहितकारी तथा विकास-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाए। वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि प्रशासनिक अधिकारियों का सेवाकाल विभिन्न विभागों में स्थानांतरण के साथ बीतता है, जबकि उन विभागों के उद्देश्य और कार्य-दृष्टि अनेक बार एक-दूसरे से भिन्न, बल्कि परस्पर विरोधी भी होते हैं। उदाहरण के लिए, यदि कोई अधिकारी लोक निर्माण विभाग अथवा आवास विभाग में कार्यरत है, तो उसका प्रमुख उद्देश्य विकास परियोजनाओं को शीघ्रता से क्रियान्वित करना, आधारभूत संरचना का विस्तार करना तथा जनहित के कार्यों को गति देना होता है। इसके विपरीत, उसी बैच का कोई अन्य अधिकारी नगर निगम, पर्यावरण, नियामक संस्था अथवा अन्य अनुमोदन प्रदान करने वाले विभाग में कार्यरत होकर उन्हीं परियोजनाओं का परीक्षण नियमों, प्रक्रियाओं, तकनीकी मानकों तथा वैधानिक प्रावधानों के आधार पर करता है। इस प्रकार एक ही विकास परियोजना का मूल्यांकन विभिन्न विभाग अपने-अपने दृष्टिकोण से करते हैं। कोई विभाग उसकी जन-उपयोगिता, सामाजिक आवश्यकता तथा विकासात्मक प्रभाव को प्राथमिकता देता है, जबकि दूसरा विभाग उसके तकनीकी, पर्यावरणीय, वित्तीय अथवा कानूनी पक्षों का विश्लेषण करता है और उन्हीं आधारों पर यह निर्णय देता है कि परियोजना को स्वीकृति दी जाए अथवा नहीं। परिणामस्वरूप, एक ही परियोजना पर अलग-अलग विभागों के दृष्टिकोण में भिन्नता दिखाई देती है।
कार्यगत अंतर करें निर्धारित
यही स्थिति प्रशासनिक अधिकारियों के साथ भी होती है। अपने सेवाकाल के दौरान वही अधिकारी कभी ऐसे विभाग में कार्य करता है, जहाँ उसे विकास कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए कानूनों और नियमों का सकारात्मक एवं व्यावहारिक उपयोग करना पड़ता है, तो कभी ऐसे विभाग में, जहां उसे उन्हीं परियोजनाओं का तकनीकी, विधिक और प्रक्रियात्मक परीक्षण करते हुए अन्य नियमों एवं अधिनियमों के आधार पर उनकी समीक्षा करनी होती है। इस निरंतर बदलती भूमिका के कारण प्रशासनिक सोच स्वाभाविक रूप से विकासोन्मुख होने के बजाय प्रक्रिया-प्रधान बन जाती है।
फलस्वरूप, निर्णय लेने की गति धीमी पड़ जाती है, अनावश्यक औपचारिकताएं बढ़ जाती हैं, विभागों के बीच समन्वय की कमी दिखाई देती है तथा विकास परियोजनाएं विलंब, जटिलताओं और प्रशासनिक बाधाओं का सामना करती हैं। इसलिए समय की माँग है कि नौकरशाही की कार्यप्रणाली में ऐसा परिवर्तन लाया जाए, जिसमें नियमों का पालन करते हुए भी अंतिम लक्ष्य जनहित, विकास और परिणामों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। यही वास्तविक अर्थों में एक विकासवादी, उत्तरदायी और प्रभावी प्रशासनिक व्यवस्था की पहचान होगी।
अब समय आ गया है कि भारत भी अपनी प्रशासनिक संरचना में स्पष्ट विभाजन स्थापित करे। देश में ‘राजस्व सेवा नौकरशाही’ और ‘विकासवादी नौकरशाही’ के बीच कार्यगत अंतर निर्धारित किया जाना चाहिए। चयन प्रक्रिया लोक सेवा आयोग के माध्यम से ही जारी रह सकती है, किंतु चयन के पश्चात अधिकारियों से यह विकल्प लिया जाना चाहिए कि वे राजस्व एवं नियामक सेवाओं में जाना चाहते हैं अथवा विकासवादी प्रशासनिक सेवाओं में।
वर्तमान व्यवस्था में भी सुधार आवश्यक
राजस्व सेवा से जुड़े अधिकारी मुख्यत: कर-संग्रह, नियंत्रण और नियामक कार्यों तक सीमित रहें, जबकि विकासवादी नौकरशाही विभिन्न मंत्रालयों, अधोसंरचना परियोजनाओं, उद्योग, तकनीक, शिक्षा, स्वास्थ्य और नवाचार जैसे क्षेत्रों में कार्य करे। दोनों सेवाओं के स्तर, सम्मान, अधिकार और सुविधाओं में कोई अंतर नहीं होना चाहिए।
साथ ही, पदोन्नति की वर्तमान व्यवस्था में भी सुधार आवश्यक है। केवल प्रारंभिक परीक्षा में प्राप्त मेरिट के आधार पर संपूर्ण सेवाकाल निर्धारित नहीं होना चाहिए। पदोन्नति अधिकारियों के वास्तविक कार्य-प्रदर्शन, नवाचार, परियोजना-प्रबंधन क्षमता और परिणामों के आधार पर होनी चाहिए। इसके लिए एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति अथवा पूर्णत: पारदर्शी ऑनलाइन मूल्यांकन प्रणाली विकसित की जा सकती है।
विभागीय नौकरशाही और केंद्रीय सेवाओं के अधिकारियों के बीच अवसरों की समानता भी सुनिश्चित की जानी चाहिए। विभागीय अधिकारियों को भी वही प्रशिक्षण, नेतृत्व विकास और उन्नति के अवसर मिलने चाहिए, जो केंद्रीय सेवाओं के अधिकारियों को प्राप्त होते हैं। इसके अतिरिक्त, आधुनिक शासन व्यवस्था में तकनीकी विशेषज्ञों, प्रबंधन विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों, अर्थशास्त्रियों तथा विभिन्न क्षेत्रों के पेशेवरों को भी प्रशासनिक ढाँचे में प्रवेश का अवसर दिया जाना चाहिए। डॉ. मनमोहन सिंह और अश्विनी वैष्णव जैसे उदाहरण यह सिद्ध करते हैं कि विषय-विशेषज्ञता रखने वाले व्यक्ति प्रशासनिक और नीतिगत स्तर पर अत्यंत प्रभावी योगदान दे सकते हैं।
‘विकासवादी नौकरशाही’ की ओर कदम बढ़ाने की जरूरत
अत: पारंपरिक यूपीएससी प्रणाली के साथ-साथ विशेषज्ञों के लिए भी सिविल सेवा में प्रवेश का एक पारदर्शी और निष्पक्ष तंत्र विकसित किया जाना चाहिए। उन्हें वही अधिकार, सम्मान और अवसर मिलने चाहिए, जो पारंपरिक प्रशासनिक अधिकारियों को प्राप्त होते हैं। आवश्यकता पडऩे पर आयु-सीमा और अन्य पात्रता शर्तों में भी व्यावहारिक छूट दी जा सकती है। यह परिवर्तन प्रारंभ में केंद्रीय स्तर पर लागू किया जा सकता है और उसके बाद धीरे-धीरे राज्यों तक विस्तारित किया जा सकता है। इससे शासन व्यवस्था में नई सोच, नवाचार और व्यावसायिक दक्षता का समावेश होगा। कई ऐसे विषय, जो पारंपरिक प्रशासनिक दृष्टिकोण से अनदेखे रह जाते हैं, उन पर विशेषज्ञ वर्ग नई दिशा प्रदान कर सकता है।
सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि ऐसे विशेषज्ञ तैयार करने वाले विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों को अनावश्यक नौकरशाही नियंत्रण और दबाव से मुक्त किया जाए। उन्हें अधिक स्वायत्त, नवोन्मेषी और परिणामोन्मुख बनाना समय की आवश्यकता है।
भारत आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां केवल प्रक्रिया-आधारित प्रशासन पर्याप्त नहीं रह गया है। विकसित राष्ट्रों की प्रतिस्पर्धा, तीव्र आर्थिक परिवर्तन, तकनीकी प्रगति और वैश्विक चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए भारत को अपनी नौकरशाही का पुनर्गठन करना ही होगा। अब समय आ गया है कि देश ‘प्रक्रियात्मक नौकरशाही’ से आगे बढक़र ‘विकासवादी नौकरशाही’ की ओर कदम बढ़ाए। इस विषय पर व्यापक राष्ट्रीय बहस, विशेषज्ञ विमर्श और संस्थागत सुधारों के माध्यम से एक नए प्रशासनिक मॉडल का निर्माण किया जाना चाहिए, जो भारत को आने वाले दशकों में अधिक सक्षम, प्रभावी और विकासोन्मुख राष्ट्र बनाने में सहायक हो।
Updated on:
09 Jul 2026 06:51 pm
Published on:
09 Jul 2026 06:51 pm
